क्या भारत कूड़ेदान में तबदील होता जा रहा है? देश के महानगरों से लेकर छोटे शहरों में लगे कूड़े के ढेर देखकर यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है। आज दुनिया की आधी आबादी शहरों में बसती है। भविष्य में भी शहरों की जनसंख्या में वृद्धि होती जाएगी। शहरी जिन्दगी आज की जरूरत है, मजबूरी है और दिन-प्रतिदिन बढ़ती हुई आबादी की नियति। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि आम शहरी को स्वच्छ, स्वास्थ्यपूर्ण, सुविधायुक्त अच्छे पर्यावरण में जीने का अधिकार है तो हमें इसके रास्ते भी तलाश करने होंगे। अब और देरी करना ठीक नहीं होगा क्योंकि हमारे शहर नरक में परिवर्तित हो रहे हैं। शहरों में कचरा बढ़ता जा रहा है, परन्तु इसके निस्तारण की सुविधाएं नहीं बढ़ रहीं। जब आबादी कम थी तो उपभोक्तावाद के अभाव में कचरा फैलाने वाली वस्तुएं भी कम थीं। जो कूड़ा-कर्कट निकलता था, उसका लोग कई तरीकों से पुनः उपयोग कर लेते थे। आज आबादी बहुत बढ़ चुकी है।

उपभोक्तावाद चरम पर है। लिहाजा कचरा संस्कृति भी ज्यादा है। इस वर्ष केन्द्रीय शहरी विकास मंत्रालय ने 4203 शहरों में स्वच्छता सर्वेक्षण कराया तो परिणाम सबके सामने आया। चंद शहरों को छोड़ बाकी की सड़ांध विचलित कर देने वाली कहा। कचरा प्रबंधन स्थानीय निकायों के लिए समस्या बनता जा रहा है। किसी की समझ में नहीं आ रहा कि कचरे से निजात कैसे पाई जाए। कचरे का सही नियोजन ही नहीं हो रहा। जिस प्लास्टिक को वैज्ञानिकों ने मानव जाति की सुविधा के लिए ईजाद किया था, वह भस्मासुर बनकर समूचे पर्यावरण के विनाश का कारण बनती जा रही है। प्लास्टिक की खतरनाक बात यह है कि यह नष्ट नहीं होती। इसके चलते हमारी धरती से लेकर समुद्र तक हर तरफ प्लास्टिक ही प्लास्टिक है। हमारी नदियां प्लास्टिक की बोतलों से भरी पड़ी हैं, हमारे समुद्र में प्लास्टिक कचरा फैला हुआ है। अगर पानी अमृत है तो इस अमृत को भी प्लास्टिक जहरीला बना रहा है। दुनिया में सबसे ज्यादा इलैक्ट्रोनिक कचरा पैदा करने वाले शीर्ष पांच देशों में भारत भी शामिल हो चुका है।

इस सूची में चीन, अमेरिका, जापान और जर्मनी हैं। मोबाइल, कम्प्यूटर, लैपटाप, टेलीविजन इत्यादि जब भी खराब होते हैं तो हम उसे कबाड़ में बेच देते हैं लेकिन अक्तूबर 2016 में अधिसूचित ई-कचरा प्रबंधन नियमों के अनुसार बिजली और इलैक्ट्रोनिक उपकरण निर्माताओं को कलैक्शन सुविधा प्रदान करना अनिवार्य है। इसके बाद कचरा जमा करने वाले अधिकृत रिसाइकलर्स को देने का प्रावधान है।
एक तरफ हम नारा तो प्लास्टिक मुक्त भारत का लगाते हैं आैर दूसरी तरफ हम प्लास्टिक का धड़ल्ले से इस्तेमाल करते हैं। भारत हर रोज 1,09,589 टन अपशिष्ट उत्पन्न करता है। दिलचस्प बात यह है कि शहरी अमरीकी हर रोज 6,24,700 टन कचरा पैदा करता है जो दुनिया में सबसे ज्यादा है। वर्तमान में भारत के लोग हर वर्ष 62 मिलियन टन ठोस कचरा उत्पन्न करते हैं इसमें से 45 मिलियन टन कचरा छोड़ दिया जाता है और नागरिक एजैंसियों द्वारा इसका निपटारा गैर-कानूनी ढंग से किया जाता है। हालात इस तरह के हो गए हैं कि हमारे देश में कचरे के डं​पिंग मैदानों की भी कमी होने लगी है। कचरे की केवल एक प्रतिशत मात्रा को ही रिसाइकिल किया जाता है। कचरा निपटान मामले में हमें स्वीडन का माडल अपनाना होगा। स्वीडन ने अपने क्षेत्रों में 47 प्रतिशत कचरे का पुनः उपयोग के साथ ऊर्जा उत्पादन के लिए ईंधन के रूप में इस्तेमाल किया है। केवल 3 प्रतिशत कचरे को ही छोड़ा जाता है।

स्वीडन में कचरा एकत्र करने और उसका निपटारा करने की जिम्मेदारी इस तरह से सौंपी जाती है कि बहाने की कोई गुंजाइश ही नहीं बचती। यह काम अपशिष्ट उत्पादन उद्योग, व्यापारिक घरानों, नगरपालिकाओं और निजी उद्यमों के बीच विभाजित है। कई देश अपना कूड़ा दूसरे देशों में धकेलने की कोशिश करते हैं जबकि स्वीडन यूरोप के अन्य देशों से कूड़ा आयात करता है और उससे ऊर्जा उत्पादन करता है। जब स्वीडन में कचरे को आय का साधन बनाया जा सकता है तो भारत क्यों नहीं कर सकता। हमारी जिम्मेदारी केवल घर को साफ रखने की नहीं है। हमें घर के बाहर को भी साफ रखना होगा इसलिए हमें अपने दृष्टिकोण को बदलने की जरूरत है। प्लास्टिक रिसाइक्लिंग व्यवसाय उपयोग करके फैंके गए प्लास्टिक कचरे के कूड़े के ढेर या सड़क से बीनने से आरम्भ होता है। अलग-अलग प्रकार की प्लास्टिक को अलग करके उसे रिसाइक्लिंग तक पहुंचाने की लंबी चेन से करोड़ों लोग अपनी आजीविका कमा रहे हैं। आज छोटे ग्रामों से लेकर महानगरों तक कचरा निस्तारण एक बड़ी समस्या बनी हुई है।

यदि कचरे से प्लास्टिक, कागज, लोहा आैर अन्य धातुएं इत्यादि न निकाली जाएं तो कूड़े का ढेर कितना विशाल हो जाएगा, पर्यावरण को कितनी क्षति होगी, राष्ट्रीय सम्पत्ति का कितना विनाश होगा, इसकी सहज ही कल्पना की जा सकती है। अपने को खपाकर पर्यावरण की रक्षा के साथ देश के सामान्यजन को सस्ते प्लास्टिक उत्पाद उपलब्ध कराकर कचरे को कंचन बना रहे रिसाइक्लिंग उद्योग में लगे करोड़ों लोगों के प्रति प्रशासन को कृतज्ञता ज्ञापित करनी चाहिए थी, लेकिन दुुर्भाग्य से आज प्रशासन इन लोगों को प्रताड़ित कर रहा है। बिना विषय की जानकारी के प्लास्टिक रिसाइक्लिंग व्यवसाय के विरुद्ध एकतरफा अभियान चलाया जा रहा है। माननीय सुप्रीम कोर्ट भी अपने एक निर्णय में प्लास्टिक की अधिकतम रिसाइक्लिंग की आवश्यकता जता चुका है।

7 जून, 2018 को विश्व पर्यावरण दिवस पर प्रधानमंत्री जी की उपस्थिति में उपभोक्ता वस्तुएं बनाने वाले बड़े उद्योगपतियों ने भविष्य में रिसाइक्लिंग हो सकने वाली पैकेजिंग करने का वचन दिया है। प्रदूषण नियंत्रण कमेटी भी प्लास्टिक रिसाइक्लिंग को वैध कार्य मानते हुए इसके लिए अनुमति पत्र देती है। फिर भी न जाने कहां से अंतर्ज्ञान पाए प्रशासनिक अधिकारी प्लास्टिक रिसाइक्लिंग में लगे पर्यावरण मित्रों के साथ आतंकियों जैसा व्यवहार करने पर तुले हैं? अब समय आ गया है कि सरकार स्थिति स्पष्ट करे। यदि प्लास्टिक रिसाइक्लिंग पर्यावरण को क्षति पहुंचाने वाला व्यवसाय है तो तत्काल प्रभाव से इसे अवैध घोषित करे आैर प्लास्टिक कचरे के अम्बार से निपटे।