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संपादकीय

नक्सल समस्या से भी देश मुक्त हो

नक्सल प्रभावित राज्यों के मुख्यमन्त्रियों व पुलिस महानिदेशकों के सम्मेलन को बुला कर नये गृहमन्त्री श्री अमित शाह ने इस समस्या से निजात पाने का निश्चय दोहराया है। नक्सल समस्या देश की आन्तरिक सुरक्षा व्यवस्था से जुड़ी हुई ऐसी पेचीदा व्यथा है जिसके सामाजिक-आर्थिक व आपराधिक आयाम हैं। अतः इसके निराकरण के लिए भी बहुआयामी कदमों की जरूरत है। फिलहाल यह सबसे ज्यादा झारखंड व छत्तीसगढ़ में हैं और दोनों ही राज्य आदिवासी बहुल हैं। यह स्वयं में एक चिन्ता का विषय हो सकता है कि आर्थिक रूप से पिछड़े राज्यों में ही यह समस्या सर्वाधिक भयावह क्यों है? इसके साथ ही यह भी कम गंभीर मामला नहीं है कि इन दोनों ही राज्यों को प्रकृति ने अपनी जल-जंगल औऱ जमीन जैसी सौगात से नवाजा है जिसकी वजह से यहां की धरती को ‘अमीर’ कहा जाता है मगर यहां के लोग सबसे ज्यादा ‘गरीब’ हैं। 

विरोधाभास हमें कहीं न कहीं यहां की सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों का आकलन करने को मजबूर करता है परन्तु छत्तीसगढ़ समेत अन्य राज्यों में जिस तरह नक्सली पुलिस औऱ प्रशासन को अपना दुश्मन नम्बर एक मान कर हिंसा का रास्ता अपनाते हैं उससे यह सिद्ध होता है कि उनका लक्ष्य केवल आदिवासियों के जायज अधिकार पाना नहीं है बल्कि समाज में दहशत फैला कर जंगल राज कायम करना है और लोकतान्त्रिक व्यवस्था को चुनौती देना है। नक्सली तरीके से आज तक दुनिया की न कोई समस्या हल हुई है और न ही भविष्य में कभी हो सकती है क्योंकि इनका उद्देश्य ‘अन्याय को अन्याय’ से खत्म करना है। हत्या औऱ लूटपाट कभी किसी  समाज में न्याय की स्थापना नहीं कर सकते। 

इसी वजह से 2001 के करीब वाजपेयी सरकार के गृहमन्त्री श्री लालकृष्ण आडवाणी ने इस समस्या को समाप्त करने के लिए सभी नक्सल प्रभावित राज्यों के पुलिस महानिदेशकों व गृह सचिवों की बैठक बुला कर साझा रणनीति बनाने की शुरूआत की थी। क्योंकि इससे पूर्व प्रत्येक प्रभावित राज्य अपने तरीके से नक्सलियों द्वारा पैदा की गई कानून-व्यवस्था से निपटने की रणनीति तैयार करता था जिसका फायदा नक्सली गिरोह बहुत आसानी के साथ एक राज्य से दूसरे राज्य की सीमाओं में प्रवेश करके उठाते थे। अतः नक्सल विरोधी साझा कार्य दल गठन करने की अवधारणा वहीं से पैदा हुई। इसके बाद इसमें लगातार संशोधन होते रहे और 2004 में केन्द्र में मनमोहन सरकार गठित होने पर गृहमन्त्री बने श्री शिवराज पाटिल ने इस समस्या को  सामाजिक आधार पर हल करने का प्रयास किया। 

मगर उन्होंने श्री अडवानी की नीति से हट कर यह उदार नीति शुरू की थी जिसके अपेक्षानुरूप परिणाम नहीं निकले और नक्सली अपनी गतिविधियां चालू रखे रहे। इसकी वजह यही थी कि इस रास्ते के अपानने वाले लोगों का लोकतन्त्र में विश्वास न होकर हिंसा पर विश्वास था और और वे अपने प्रभाव वाले इलाकों में बन्दूक के बल पर अपना समानान्तर शासन स्थापित करना चाहते थे। इस लोकतन्त्र विरोधी  कार्यप्रणाली को समर्थन देने के लिए कुछ ऐसे कथित बुद्धिजीवी संगठन व व्यक्ति भी मैदान में उतरते रहे जो बौद्धिक तौर पर नक्सली आन्दोलन को आर्थिक न्याय की लड़ाई के रूप में पेश करने से पीछे नहीं हटे परन्तु यह  लोगों द्वारा चुनी गई सरकारों के खिलाफ कोई युद्ध नहीं था बल्कि  बल्कि उन्हीं लोगों के खिलाफ ही युद्ध था जिनके नाम पर नक्सली खुद को उनका खैरख्वाह दिखाते थे क्योंकि नक्सल प्रभावित इलाकों में नक्सलियों ने किसी प्रकार की विकास गतिविधियों को नहीं होने दिया और डाकखानों से लेकर स्कूलों तक को अपना अड्डा बना डाला और नई पीढि़यों के हाथ में हथियार देकर उन्हें अपनी मुहीम में शामिल करना शुरू कर दिया।

इसकी वजह यही है कि नक्सली विकास को अपने कार्य में अवरोधक मानते हैं और लोगों को पिछड़ा ही बने रहने देना चाहते हैं जिससे उन्हें बौद्धिक रूप से समर्थन देने वाले विद्वानों की भूमिका भी रक्तरंजित हो जाती है। भारतीय संविधान के अनुसार हथियार उठा कर सत्ता परिवर्तन करने का रास्ता चुनने वाले को देशद्रोही की संज्ञा में ही डाला जायेगा क्योंकि वह अहिंसा के रास्ते से ही सत्ता परिवर्तन के वचन के विरुद्ध जाकर राजद्रोह का कार्य करता है परन्तु वर्तमान परिस्थितियों में हमें नक्सलियों से निपटने के आधुनिक तरीके खोजने होंगे। जब श्री पी. चिदम्बरम गृहमन्त्री थे तो यह विचार भी उपजा था कि नक्सलियों को समाप्त करने के लिए सेना का प्रयोग किया जाये परन्तु यह विचार भी स्वयं में लोकतन्त्र विरोधी था क्योंकि आन्तरिक सुरक्षा व कानून-व्यवस्था कायम करने के लिए सेना का उपयोग अत्यन्त अनियन्त्रित गंभीर परिस्थिति में ही किया जाना चाहिए। 

इसके साथ ही पुलिस बलों के मनोबल का भी इससे सीधा सम्बन्ध होता है, परन्तु सबसे महत्वपूर्ण राजनैतिक इच्छा शक्ति भी होती है और पुलिस बलों को आधुनिकतम मुकाबला करने के हथियारों से लैस करने का सम्बन्ध भी होता है। दुर्गम नक्सली क्षेत्रों में हेलीकाफ्टर भेजने तक के लिए जिस तरह की प्रशासनिक औपचारिकताओं को पूरा करना पड़ता है उसमें ही घंटों निकल जाते हैं। मगर इसके साथ यह भी हमें ध्यान रखना होगा कि प. बंगाल की मुख्यमन्त्री ममता दी ने अपने राज्य के जंगल महल क्षेत्र से नक्सली राज किस तरह समाप्त किया। इसी प्रकार उनसे पहले आन्ध्रप्रदेश के मुख्यमन्त्री स्व. वाई.एस.आर. रेड्डी ने प्रमुख नक्सली गुटों से हथियार रखवाने में सफलता प्राप्त की थी। 

पूर्व प्रधानमन्त्री डा. मनमोहन सिंह ने नक्सली समस्या को अपने शासन के दौरान देश की सबसे बड़ी आतंकवादी समस्या तक कहा था मगर इसके पनपने के कारणों पर उन्होंने गौर नहीं किया था। हकीकत तो यह भी है कि यह समस्या आर्थिक उदारीकरण और निजीकरण का दौर चलने के बाद ही ज्यादा फैली और उन्हीं राज्यों में भयावह हुई  जहां खनिज व प्राकृतिक सम्पदा के भंडार हैं। बाद में अन्य राज्यों में इसका विस्तार राजनैतिक कारणों से भी हुआ। अतः नये गृहमन्त्री को सभी कोणों में अपनी पैनी नजर जमाते हुए समस्या का समाधान खोजना होगा। श्री शाह से यह अपेक्षा की जाती है क्योंकि उन्होंने कश्मीर समस्या को जड़ से समाप्त करने का जो अभूतपूर्व फैसला किया है उससे नक्सली गुटों और संगठनों में दहशत का माहौल तो होना ही चाहिए।