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उत्तर प्रदेश की दलित राजनीति

उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलित जातियों की महत्वपूर्ण भूमिका है। राज्य की सियासत में 1950 से 1990 तक दलित राजनीति कई दौर से गुजरी। दलितों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण मिला और राजनीतिक संस्थाओं में आरक्षण मिला। भूमि सुधारों और कल्याणकारी कार्यक्रमों से दलित जातियां लाभान्वित हुईं और दलित जातियों के आर्थिक उत्थान ने उन्हें राजनीतिक रूप से सशक्त बना दिया। उत्तर प्रदेश की दलित जातियों में पारंपरिक रूप से राजनीति में भागीदारी और राजनीतिक जागरूकता काफी कम रही। उपनिवेशवादी काल में प्रदेश में दक्षिण और पश्चिम भारत की तरह ब्राह्मण विरोधी आंदोलन नहीं हुआ। आजादी के तुरंत बाद दलितों के एक अभिजात्य वर्ग ने बाबा साहेब अम्बेडकर के विचारों से प्रभावित होकर रिपब्लिकन पार्टी के नेतृत्व में थोड़े समय के लिए दलितों को प्रेरित किया। समुदाय के अभिजात्य वर्ग को छोड़कर आर्थिक सुधारों का लाभ आजादी के बाद दलितों तक नहीं पहुंचा।

1980 के दशक के मध्य से जाति आधारित ध्रुवीकरण बहुजन समाज पार्टी के नेतृत्व में आरंभ हुआ। इसकी स्थापना कांशी राम ने की थी। उत्तर प्रदेश में 1993 में पहली बार बसपा ने संविद सरकार बनाई फिर 1995 और 1997 में बसपा ने अपनी सरकार बनाई। 1995 में बसपा नेत्री सुश्री मायावती ने मुख्यमंत्री पद संभाला था। उत्तर प्रदेश की राजनीति में मायावती एक मजबूत स्तम्भ के रूप में स्थापित हो चुकी थी। 1997 में वह फिर मुख्यमंत्री बनी लेकिन उनकी सरकार 6 माह तक ही चली। मई 2002 में वह फिर मुख्यमंत्री बनीं लेकिन सरकार अगस्त 2003 तक चली। फिर 13 मई 2007 को मायावती स्पष्ट बहुमत के साथ सत्ता में आई और सरकार 2012 तक चली। इस दौरान उत्तर प्रदेश की राजनीति में न केवल चौंकाने वाले घटनाक्रम सामने आये बल्कि राजनीति में व्यापक बदलाव भी आया। उत्तर प्रदेश की दलित जातियों में राजनीतिक चेतना जुड़ाव और पृथकता के दौर से गुजरी है। जुड़ाव का अर्थ कांग्रेस प्रभुत्व वाले दल से जुड़ना अथवा समर्थन देना स्वीकार करना और समझौता करना जैसे तत्व भी मौजूद रहे। दलित चेतना बढ़ती गई तो दलितों ने ब्राह्मणवादी या अभिजात्य पार्टियों के विरुद्ध अपनी पार्टी बना ली। 

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद दलितों ने कांग्रेस का साथ दिया और रिपब्लिकन पार्टी आफ इंडिया नाम से अपनी पार्टी बनाई। 1977 तक दलितों ने कांग्रेस काे समर्थन दिया क्योंकि इंदिरा गांधी के नेतृत्व में गरीबी हटाओ जैसे क्रांतिकारी नारे खूब लगे और उपाय किए गये। 1980 के आरंभ में दलित आंदोलन विद्रोह की ओर बढ़ा और बहुजन समाज पार्टी का उदय हुआ। अलग पार्टी, अलग विचारधारा और अलग पहचान बनाने के लिए उग्र नारे अपनाये गये। पहले यह पार्टी ब्राह्मण विरोधी मानी जाती रही लेकिन मायावती ने सोशल इंजीनियरिंग का तरीका अपनाया जो काफी कामयाब रहा। सामाजिक आंदोलन अब विशुद्ध राजनीति हो गया। बसपा ने कांग्रेस से उसका परम्परागत वोट बैंक ऐसा छीना कि उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में कांग्रेस आज तक उठ नहीं सकी। हालांकि दिग्गज समाजवादी नेता मुलायम सिंह ने भी जाति आधारित राजनीति करते हुए समाजवादी पार्टी को सशक्त बनाया और कई बार सत्ता संभाली। जिस सोशल इंजीनियरिंग के दम पर मायावती सत्ता में आ बैठी थी, अब वह बिखर चुकी है। 2017 के विधानसभा चुनाव में बसपा की हालत बेहद खराब हो गई थी, उसे महज 17 सीटें ही मिली थीं। नरेन्द्र मोदी की आंधी ने उत्तर प्रदेश में चुनावों का गणित ही बदल कर रख दिया था।

अब तक आंदोलन तक सीमित रहे भीम आर्मी के चीफ चंद्रशेखर  आजाद ने कांशी राम की जयंती पर आजाद समाज पार्टी के नाम से नई पार्टी बनाने का ऐलान कर दिया है। चंद्रशेखर आजाद रावण के नाम से भी लोकप्रिय हैं। उनके सक्रिय राजनीति में आने के ऐलान के बाद इस बात का विश्लेषण किया जा रहा है कि इससे अन्य राजनीतिक पार्टियों को कितना नफा-नुकसान हो सकता है। ऐसा माना जा रहा है कि चन्द्रशेखर की पार्टी के अस्तित्व में आ जाने से मायावती की बहुजन समाज पार्टी को नुकसान हो सकता है। बसपा में खलबली मच गई है और इस खलबली का एकमात्र कारण उत्तर प्रदेश की दलित राजनीति पर बसपा का एकाधिकार टूटने का खतरा उत्पन्न होना है। युवाओं के बीच चन्द्रशेखर का काफी क्रेज है। दरअसल चंद्रशेखर भी उसी जाटव समाज से हैं जिस समाज से मायावती हैं। चन्द्रशेखर  फिलहाल बसपा की जगह तो नहीं ले पाएंगे लेकिन अपनी अलग पहचान से बसपा काे नुकसान जरूर पहुंचाएंगे। मौजूदा दौर में मायावती की राजनीतिक साख गिरती जा रही है। दलित राजनीति में एक खालीपन अभी भी बना हुआ है।

चंद्रशेखर आजाद उर्फ रावण सहारनपुर में दलित और ठाकुरों के टकराव के बाद चर्चा में आये थे। इसके बाद वह लगातार केन्द्र की मोदी सरकार और उत्तर प्रदेश में योगी सरकार को चुनौती देते आ रहे हैं। 2019 आते-आते लोकसभा और विधानसभा में सीटों के लिहाज से बसपा काफी सिमट चुकी है। फिर भी उत्तर प्रदेश में उसका 20 फीसदी वोट बैंक बचा हुआ है। चन्द्रशेखर के उदय से मायावती को दलितों के बंटवारे का डर सताने लगा है इसलिए वह चन्द्रशेखर का विरोध कर रही है। कांशीराम और मायावती के करीबी नेता एक-एक करके पार्टी छोड़ रहे हैं।  मायावती और उनकी पार्टी के अन्य नेताओं पर टिकट बेचने और पैसा वसूलने के तमाम तरह के आरोप लगते रहे हैं लेकिन इन आरोपों का कोई असर मायावती पर दिखाई नहीं देता। फिलहाल चंद्रशेखर आजाद केवल पश्चिम उत्तर प्रदेश तक ही सीमित हैं। यह भविष्य ही बताएगा कि वह उत्तर प्रदेश की दलित राजनीति में खालीपन को कितना भर सकेंगे क्योंकि आंदोलन करना अलग बात है और सियासत चलाना अलग बात है।