राज्यपालों पर वाद-विवाद


सर्वोच्च न्यायालय ने राज्यपाल के कार्यालय को सूचना के अधिकार के तहत लाने की जरूरत बताते हुए खुद मुख्य न्यायाधीश को भी इसके तहत लाने की आवश्यकता बताई है। न्यायालय के इस विचार का स्वागत किया जना चाहिए क्योंकि देश में राज्यपालों की भूमिका को लेकर साठ के दशक से ही विवाद रहा है। विवाद इस मुद्दे पर भी रहा है कि पूर्व नौकरशाहों को संविधान के पोषक के इस पद पर नहीं बिठाया जाना चाहिए मगर राजनीतिक लोगों को बिठाये जाने पर भी खासा विवाद रहा है। इसकी वजह यह रही कि राजनीतिक लोग राज्यपाल बनने पर अपने राजनीतिक आग्रह नहीं छोड़ पाते हैं और किसी भी राज्य में अपने संवैधानिक दायित्व का निर्वाह निरपेक्ष भाव से करने से चूक जाते हैं मगर ऐसे उदाहरण निश्चित रूप से ज्यादा हैं जहां राजनीतिज्ञों ने राज्यपाल बनने पर अपने पद की गरिमा और मर्यादा को सम्मानजनक रूप से निभाया है जबकि नौकरशाह किसी नौकरी की तरह यह काम भी करने की आदत से मजबूर रहते हैं मगर तब क्या किया जाए जब राजनीतिक लोग राज्यपाल पद पर बैठकर उस राज्य की चुनी हुई संविधान सम्मत सरकारों को अपने राजनीतिक नजरिये के ताबेदार बनाने की कोशिश करने लगे। सबसे पहले यह समझा जाना जरूरी है कि राज्यपाल का पद पूरी तरह गैर-राजनीतिक होता है और उसके अधिकार क्षेत्र में केवल इतना ही आता है कि राज्य में कानून का शासन लागू रहे और संवैधानिक व्यवस्था किसी भी कीमत पर चरमराए नहीं।

राज्यपाल के पद को रखने के लिए देश की संविधान सभा में लम्बी बहस चली थी और उसका निचोड़ यह निकला था कि इस पद को बनाए रखने की जरूरत इसलिए है जिससे केन्द्र व राज्य के बीच मजबूत पुल बना रहे और लोकतंत्र में जनता की इच्छा को सर्वोपरि रखने की निगरानी संवैधानिक दायरे में होती रहे। इसके साथ ही यह भी समझा जाना चाहिए कि राज्यपाल कोई चुना हुआ व्यक्ति नहीं होता कि वह राज्य की जनता और चुनी हुई सरकार के बीच पुल का काम करे बल्कि वह राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त एक व्यक्ति होता है जिससे वह संविधान के संरक्षक राष्ट्रपति को उस राज्य की संवैधानिक स्थिति के बारे में अवगत कराता रहे। एक समय ऐसा भी था जब कुछ लोग यह मांग उठाते रहते थे कि राज्यपाल के पद को ही समाप्त कर दिया जाना चाहिए। उस पर लाखों रुपए फूंकने का क्या लाभ है? दूसरी तरफ ऐसे राजनीतिक दल भी थे जो कहते थे कि राज्यों में चुनी हुई सरकारों की क्या जरूरत है। किसी भी प्रदेश का शासन राज्यपाल की मार्फत ही चलाया जा सकता है। दोनों ही प्रकार के लोग भारत के महान लोकतंत्र की भावना का अनादर करते थे और दोनों ही तानाशाही के दो रूपों की वकालत करते थे। दोनों ही इस हकीकत को नजरंदाज करते थे कि भारत राज्यों का एक संघ है जिसमें प्रत्येक राज्य की राष्ट्रपति के माध्यम से जवाबदेह स्वतंत्र सत्ता है।

इस खूबसूरत व्यवस्था के चलते ही राज्यपाल के पद के सृजन की सिफारिश संविधान सभा ने की थी जिसका पालन केन्द्र की विभिन्न राजनीतिक दलों की सरकारें करती रही हैं मगर बीच-बीच में इसमें विकार भी देखे गए हैं। पहला मौका 1967 में तब आया जब राजस्थान के राज्यपाल के रूप में स्व. सरदार हुकम सिंह ने उस वर्ष हुए विधानसभा के चुनाव परिणामों में कांग्रेस का बहुमत समाप्त होने पर स्वतंत्र पार्टी के नेता स्व. महारावल लक्ष्मण सिंह के नेतृत्व में गैर कांग्रेसी सरकार के गठन को रोका हालांकि तब देश के नौ राज्यों में गैर-कांग्रेसी सरकारों का गठन आसानी से विभिन्न राज्यपालों ने कर दिया था। इसके बाद स्व. राजीव गांधी के शासनकाल में तत्कालीन राज्यपाल स्व. राम लाल ने चुनी हुई स्व. एन.टी. रामाराव की सरकार को बर्खास्त कर डाला और बाद में वही सरकार पुन: स्थापित हुई। यह राज्यपाल द्वारा अपने पद की मर्यादा को तोडऩे के प्रारम्भिक मामले थे जो पक्षपात को दर्शाते थे मगर इसके बाद बिहार में स्व. सुन्दर सिंह भंडारी ने राज्यपाल पद पर रहते हुए और भी बड़ा नाटक कर डाला और अपने राजनीतिक दुराग्रह का परिचय बहुत ही भौंडेपन से दिया लेकिन वर्तमान दौर की समस्या बदल गई है। इसका उदाहरण हमने असम में देखा था जब विधानसभा स्थल की गरिमा को ही मिटाने का काम किया गया। इससे पहले नब्बे के दशक में ऐसा ही काम रमेश भंडारी ने किया था और 18 घंटे के लिए इस राज्य को दो-दो मुख्यमंत्री दे दिए थे। इसके साथ ही वर्तमान दौर में राज्यपालों में सार्वजनिक रूप से अपने मत को प्रकट करने का चलन बढ़ रहा है।

यह सरासर गलत है। राज्यपाल किसी भी राज्य में केन्द्र का नियुक्त संवैधानिक प्रमुख होता है, जनता का नुमाइंदा नहीं। अगर राज्यपाल किसी समारोह में जाकर उपस्थित जनसमूह से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तर्ज पर तीन बार भारत माता की जय कहलाने लगेगा तो देश के लोकतंत्र में जनता द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों की अस्मिता पर हमले के अलावा और कुछ नहीं होगा क्योंकि वह जनभावनाओं का प्रतीक किसी भी सूरत में नहीं हो सकता। जनता से संवाद करने का उसका अधिकार केवल संविधान के संदर्भ तक ही सीमित है। यह स्पष्ट लक्ष्मण रेखा है जिसे राज्यपालों को समझना ही होगा। वह मुख्यमंत्री के सार्वजनिक अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप नहीं कर सकता। ऐसी गलती कभी गुजरात के राज्यपालों ने भी श्री नरेन्द्र मोदी के उस राज्य के मुख्यमंत्री रहते की थी। राज्यपाल केवल वह पुल है जिससे गुजर कर जनादेश सत्ता पर विराजता है, इससे आगे उसकी भूमिका तभी बनती है जब राज्य में संवैधानिक ढांचा चरमराने लगे। अत: राज्यपाल से संबंधित सभी विवादों को हमें इस चश्मे से देखना होगा और सुनिश्चित करना होगा कि राज्यपाल के चश्मे पर किसी भी राजनीतिक दल का पानी न चढ़ा हुआ हो। इस पद के लिए हमें ‘वीतरागी’ राजनीतिज्ञों की जरूरत होगी क्योंकि नौकरशाहों के बूते पर यह जिम्मेदारी नहीं छोड़ी जा सकती है। मुझे अच्छी तरह याद है कि 1970 में उत्तर प्रदेश के राज्यपाल स्व. विश्वनाथ दास अपने पद से त्यागपत्र देकर ओडिशा में स्वतंत्र पार्टी के नेतृत्व में चलने वाली सांझा सरकार के मुख्यमंत्री बन गए थे मगर राज्यपाल के रूप में उन पर यह कोई आरोप नहीं लगा सका था कि वह किसी राजनीतिक दल से बावस्ता हैं।