भारत छोड़ो पर बहस?


‘अंग्रेजो भारत छोड़ो’ आन्दोलन की 75वीं वर्षगांठ 2017 में मनाने की प्रासंगिकता इसलिए है क्योंकि कुछ तत्व इस देश को उस अंधकारपूर्ण रास्ते पर पलटकर ले जाना चाहते हैं जिस पर यह 8 अगस्त 1942 को खड़ा हुआ था। सवाल यह नहीं है कि आजादी की लड़ाई में किन खास लोगों या संगठन ने हिस्सा लिया या नहीं लिया बल्कि सवाल यह है कि उस वक्त भारत के आम आदमी की इस आन्दोलन में शिरकत किस सीमा तक थी। इतिहास साक्षी है कि खेतों में काम करने वाले किसानों से लेकर फैक्टरियों और कारखानों में काम करने वाले मजदूरों तक ने इस आन्दोलन में हिस्सा लिया था और अपने सीने पर अंग्रेजों की लाठियां खाई थीं और जुल्म सहे थे। उस समय कांग्रेस पार्टी इस देश के मजलूम लोगों से लेकर पढ़े-लिखे नौजवानों की आवाज थी अत: यह आन्दोलन इसी के नेतृत्व में चला था। इसके पीछे जो जज्बा था वह स्वराज का था और अंग्रेज के हाथों से सत्ता लेकर इस देश के लोगों के हाथ में सौंपने का था। यह जन आन्दोलन था जो पूरे एशिया महाद्वीप में आत्मनिर्णय के अधिकार की हुंकार जगा रहा था।
महात्मा गांधी इसके केन्द्र बिन्दु थे और पं. जवाहर लाल नेहरू उनके सबसे बड़े सिपहसालार थे जबकि नेताजी सुभाष चन्द्र बोस विदेशों में रहकर फौजी तौर-तरीकों से अंग्रेजों को परास्त करने के रास्ते पर चल पड़े थे। स्वयं नेताजी ने भारत छोड़ो आन्दोलन को देश की आजादी की जद्दोजहद में ऐतिहासिक क्षण माना था। हालांकि यह लड़ाई पूरी तरह अहिंसक थी मगर इसका लक्ष्य पूर्ण स्वतन्त्रता था। दुनिया के इतिहास का यह पहला ऐसा जन आन्दोलन था जिसके सभी नेता जेलों में ठूंस दिये गये थे और जनता ने स्वयं आगे बढ़कर आन्दोलन की कमान संभाल ली थी। आम जनता में आजादी के जज्बे को भरने का कार्य महात्मा गांधी ने इस कदर कर दिया था कि मुस्लिम लीग के वजूद में होने के बावजूद हिन्दू-मुसलमानों ने कन्धे से कन्धा मिलाकर अंग्रेजों को भारत से खदेडऩे की कसम उठा ली थी। तीन-तीन महीने तक मिलों में हड़ताल रही थी। अनाज मंडियों में किसानों के डेरे गड़ गये थे। स्कूल-कालेजों में छुट्टियां होने लगी थीं, विश्वविद्यालयों में हड़ताल हो गई थी, सरकारी दफ्तरों के बाहर अवज्ञा आन्दोलन होने लगे थे। सभी क्षेत्रों के लोग अंग्रेजों की जेलें भरने लगे थे।
फौज में भर्ती होने से भारतीय युवा मना करने लगे थे क्योंकि द्वितीय विश्व युद्ध के चलते उन्हें फौज के सिपाही के रूप में ब्रिटिश सम्राट के प्रति वफादारी की कसम खानी थी। बजाय फौज में जाने के नवयुवक कांग्रेस पार्टी की सदस्यता लेकर जेल जाना बेहतर समझने लगे थे मगर तब देशी राजे-रजवाड़े अंग्रेजों का समर्थन कर रहे थे और कांग्रेस पार्टी के खिलाफ अपना अलग युद्ध छेड़े हुए थे। यह वह दौर था जब भारत को अंग्रेजों ने द्वितीय विश्व युद्ध के चलते कंगाल करने की नीतियों पर चलना शुरू कर दिया था। महात्मा गांधी ने भारतीयों की नब्ज को पहचान कर ही इस आन्दोलन का आह्वान किया था। इस आह्वान को सुनकर जो लोग साथ चल पड़े वे आजादी के परवाने हो गये और जो अनसुना कर गये उनको इस मुल्क के लोगों ने अनदेखा करके हाशिये पर फैंक दिया। संसद में इस आन्दोलन की वर्षगांठ को लेकर जो भाषणबाजी हुई है उसका सबब इतना सा ही है कि हम अपनी विरासत के स्वर्णिम अध्याय को कभी न भूलें और इस मुल्क में जनता की ताकत को सबसे ऊपरी खाने में रखकर देखें। 1942 में यह जनता ही थी जिसने अंग्रेजों का दम फुला दिया था जबकि पूरा प्रशासन तन्त्र उनके हाथ में था। यहां तक कि किसी जिले का कलेक्टर तक अंग्रेज अफसर ही होता था मगर गांधी ने जो पाठ पढ़ाया वह यह था कि जनशक्ति के समक्ष बड़ी से बड़ी ताकत को भी झुकना पड़ेगा क्योंकि महात्मा भारत में लोकतन्त्र स्थापित करने को लेकर प्रतिबद्ध थे जिसकी तसदीक ब्रिटिश संसद ने 1936 में ही कर दी थी। इसका विरोध तब यदि किसी ने मुखर होकर किया तो यहां के देशी राजे-रजवाड़ों ने किया और उनकी जेबी संस्थाओं ने किया।
मुस्लिम लीग और हिन्दू महासभा भी इसके विरोध में थे। जब भारतीय नागरिक अंग्रेज सरकार के पदों को ठोकर मारकर आन्दोलन में शामिल हो रहे थे तो ये दोनों संस्थाएं मुसलमानों और हिन्दुओं से अपील कर रही थीं कि वे अपने पदों पर बने रहें और फौज में भर्ती हों। देशी राजे-रजवाड़ों का इन्हें पूरा समर्थन प्राप्त था और उन्हीं से इन्हें वित्तीय मदद भी मिलती थी परन्तु भारत के लोगों ने युवा जवाहर लाल नेहरू के इस वाक्य को कस कर पकड़ लिया कि ”भारत का भविष्य अंग्रेज तय नहीं कर सकते बल्कि हम खुद तय करेंगे।’ यही वह दौर था जब हिन्दी समेत सभी भारतीय भाषाओं में आजादी की प्रेरणा देने के लिए रचनाएं लिखी जा रही थीं, जिन्हें पढ़-पढ़कर लोग अंग्रेजों से मुक्ति पाने के लिए दीवाने हो रहे थे। आदिवासी क्षेत्रों से लेकर सुदूर पहाड़ी क्षेत्रों तक में महात्मा गांधी के नाम का डंका बज रहा था। ब्रिटिश प्रधानमन्त्री चर्चिल तब घबरा रहा था और ज्यादा से ज्यादा जुल्म ढहाने के आदेश दे रहा था मगर यह भारत की जनता थी जो हर शहर के नुक्कड़ पर आवाज लगा रही थी कि आजादी लेकर रहेंगे और अन्त में 1947 को इस मुल्क को आजादी मिली मगर अंग्रेजों की साजिश भी कामयाब हुई और भारत के दो टुकड़े हो गये।