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संपादकीय

बेरोजगारी घटाना पहला लक्ष्य हो

मोदी सरकार ने अपनी दूसरी पारी में अर्थव्यवस्था और बढ़ती बेरोजगारी को वरीयता देते हुए इन दोनों समस्याओं के हल के लिए जो दो उच्च स्तरीय मन्त्रिमंडल समितियां गठित की हैं उनका सन्दर्भ क्षेत्र सीमित नहीं होना चाहिए क्योंकि दोनों का ही सम्बन्ध देश के सकल और समानुवेशी विकास से है। दरअसल लोकसभा चुनावों के दौरान ये दोनों ही विषय प्रमुखता के साथ विपक्षी दलों द्वारा उठाये गये थे मगर राष्ट्रवाद के विमर्श के समक्ष सभी विषय हल्के पड़ गये। 

ये आंकड़े चुनावों से पहले ही आ चुके थे कि देश में बेरोजगारी की दर 6.1 प्रतिशत पर पिछले 45 वर्षों में सर्वाधिक है। इसमें भी स्तरीय नौकरियों का अकाल बताता था कि देश में पढ़े-लिखे व दीक्षित युवकों की संख्या लगातार रोजगार पाने में विफल हो रही है। इस सन्दर्भ में सबसे पहला कार्य यह होना चाहिए कि केन्द्र सरकार की खाली पड़ी 23 लाख से अधिक नौकरियों को तुरन्त भरा जाना चाहिए और विभिन्न राज्य सरकारों को इससे भी ज्यादा खाली पड़ी संख्या के पदों को भरना चाहिए। 

आर्थिक उदारीकरण के चलते जिस प्रकार सरकारी नौकरियों में कटौती का अभियान चला है उसकी तार्किक स्तर पर समीक्षा किये जाने की जरूरत है। रेलवे जैसे मन्त्रालय में भी यदि लाखों पद खाली रहते हैं तो इस विभाग की कार्यदक्षता में वृद्धि किस प्रकार हो सकती है। इसी प्रकार शिक्षा विभाग में भी हजारों पद खाली पड़े हुए हैं। सबसे दुखद यह है कि नवरत्न कही जाने वाली सरकारी कम्पनियों की हालत भी बदतर हो रही है और इनके कर्मचारियों का मनोबल लगातार गिरता जा रहा है। इनमें सबसे बड़ा उदाहरण भारत संचार निगम लि. या बीएसएनएल का है जो देश में संचार क्रान्ति के बाद शानदार मुनाफा कमाने वाली कम्पनी रही है। 

हकीकत यह है कि प्रशिक्षित व विशेष अफसरों और कर्मचारियों की सरकारी कम्पनियों के पास कभी कमी नहीं रही है मगर निजीकरण के चलते उनकी योग्यता का लाभ निजी कम्पनियों ने उठाया। इसके लिए उन्होंने सभी प्रकार के हथकंडों का इस्तेमाल किया। अतः लगातार सुस्त होती अर्थव्यवस्था में तेजी लाने के उपाय ढूंढने में प्रधानमन्त्री ने जो उच्च स्तरीय समिति गठित की है उसका पहला लक्ष्य निजी क्षेत्र में उत्पादन की रफ्तार को बढ़ाना होना चाहिए जो बाजार से आने वाली मांग पर निर्भर करता है। भारत की अर्थव्यवस्था घरेलू मांग पर ही निर्भर करती है। इसका निर्यात कारोबार में ज्यादा हिस्सा नहीं है। 

निर्यात के मोर्चे पर इसमें उठान आने का नाम ही नहीं ले रहा है जिसकी वजह से घरेलू मांग घटने पर अर्थव्यवस्था सुस्त पड़ती जा रही है और निजी क्षेत्र में स्थापित उत्पादन क्षमता का अधिकतम उपयोग 80 प्रतिशत से भी नीचे पहुंच गया है। इसके साथ ही वित्त क्षेत्र में संकट गहराया है। यह बैंकिंग क्षेत्र में अराजकता जैसी स्थिति पैदा होने से हुआ है। बैंकों द्वारा दिये गये 14 लाख करोड़ रुपये के ऋण बट्टे खाते में चले गये हैं। बैंकिंग क्षेत्र व वित्तीय क्षेत्र की हालत का अंदाजा इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि भारत में घरेलू बचत की दर अब 21 प्रतिशत तक नीचे आ गई है जबकि यह 36 प्रतिशत के आसपास रहा करती थी। घरेलू बचत किसी भी देश की अर्थव्यवस्था के विकास की रीढ़ मानी जाती है। यह आम  लोगों के अर्थव्यवस्था में विश्वास का पैमाना होती है। 

इसमें अविश्वास होने से घरेलू बचत मुर्दा या जड़ अवयवों की किस्म में होने लगती है जिसमें सोना सर्वप्रमुख होता है। वित्तीय मोर्चे पर वाणिज्य ऋणों में कमी का होना बताता है कि उत्पादनशील गतिविधियों में धन की मांग इस प्रकार घट रही है कि नये उद्योग-धन्धे लगाने में उत्साह घट रहा है जिसका असर रोजगार पर पड़े बिना नहीं रह सकता। समाप्त वित्त वर्ष की आखिरी तिमाही में जिस प्रकार सकल विकास वृद्धि दर नीचे गिरकर 5.8 प्रतिशत रही है उससे पिछले वर्ष की औसत वृद्धि दर 6.8 प्रतिशत रह गई है। 

यह चिन्तनीय इसलिए है कि इतनी वृद्धि दर भारत में ‘विश्व आर्थिक मन्दी’ के दौर 2009-10 में रही थी मगर उस दौर में भी भारत का बैंकिंग क्षेत्र सीना तानकर खड़ा रहा था और आम लोगों का विश्वास बैंकिंग प्रणाली में तत्कालीन वित्त मन्त्री पूर्व राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी ने जमाये रखा था जबकि हकीकत यह भी है कि पिछले पांच वर्षों में सरकार को अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की गिरती कीमतों से जबर्दस्त सहारा मिला और इसका लाभ उपभोक्ताओं को आनुपातिक रूप से नहीं दिया गया जबकि अब तेल के भाव पल्टी मारने की मुद्रा में आते दिखाई पड़ रहे हैं मगर हाल ही में मोटर वाहनों की बिक्री खासकर दुपहिया वाहनों की बिक्री में जो कमी दर्ज हुई है उससे निम्न मध्यम वर्ग की घटती आर्थिक क्रय क्षमता का जायजा लिया जा सकता है। 

इसका सम्बन्ध सीधे वित्त क्षेत्र से होता है जिससे भारत की सकल ग्रामीण अर्थव्यवस्था के कमजोर होने का नतीजा निकाला जा सकता है। अतः उपभोक्ता खासकर टिकाऊ सामग्री के उठान में कमी दर्ज होना सीधे औद्योगिक इकाइयों की उत्पादन क्षमता उपयोग को घटाता है। इसका सम्बन्ध बेरोजगारी से जाकर सीधे बैठता है जो बताता है कि क्रय क्षमता में कमी से उपयुक्त रोजगार साधन घट रहे हैं और पारंपरिक रोजगार में लगे लोगों की लाभप्रदता घट रही है। इस स्थिति से उबरने के लिए युद्ध स्तर पर कदम उठाने आवश्यक हैं। दरअसल बाजार मूलक अर्थव्यवस्था में हर अवयव एक-दूसरे से बन्ध कर चलता है। 

उदाहरण के रूप में अगर पेट्रोलियम कच्चा तेल किफायती बनाये रखना है तो रुपये के मुकाबले डालर के भाव को देखना होगा और डालर की आवक तभी होगी जब अर्थव्यवस्था के मानक मजबूत होंगे। अर्थव्यवस्था तभी मजबूत होगी जब बाजार में माल की मांग में वृद्धि होगी। मांग में तभी वृद्धि होगी जब औसत आदमी की क्रय क्षमता में बढ़ोत्तरी होगी। यह वृद्धि तभी होगी जब उसकी रोजगारी व व्यापार में लाभप्रदता बढे़गी। यह चक्र घूमता ही रहता है जिसे हम बाजार की शक्तियां कह देते हैं।