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संपादकीय

उड़ता पंजाब बनती दिल्ली

जब भी नशे की लत की चर्चा छिड़ती है तो सबसे पहले पंजाब का नाम आता है। पंजाब में ड्रग्स के सेवन से जवानी खत्म हो रही है। चुनाव विधानसभा के हों या लोकसभा के, पंजाब में ड्रग्स एक बड़ा चुनावी मुद्दा रहता है। ड्रग्स को लेकर ‘उड़ता पंजाब’ जैसी फिल्म भी बन चुकी है। युवा वर्ग में बढ़ती नशा प्रवृति गंभीर चिंता का विषय है। पंजाब में राज्य सरकार कार्रवाई तो कर रही है लेकिन छोटी मछलियां तो गिरफ्त में आ रही हैं लेकिन बड़े मगरमच्छों को काबू नहीं किया जा रहा। वे कौन लोग थे जिन्होंने पंजाब को नशे की दलदल में फंसा दिया। 

ड्रग्स पैडलर तो जेलों में ठूंस दिये जाते हैं ​लेकिन ड्रग्स के स्रोत को बंद नहीं किया जाता। पंजाब में बड़ी मात्रा में ‘चिट्टा’ बिकता है, आखिर वो आता कहां से है? अब बात करते हैं ​दिल्ली की। क्या दिल्ली भी उड़ता पंजाब तो नहीं बन चुकी? दिल्ली और एनसीआर में एक के बाद एक पकड़ी जा रही रेव पार्टियों से स्पष्ट है कि दिल्ली का युवा वर्ग नशे की चपेट में आ चुका है। पहले उत्तर प्रदेश के नोएडा में एक फार्म हाउस में चल रही रेव पार्टी पर छापा मारा गया था, तब 192 लोगों को गिरफ्तार किया गया था जिनमें 31 युवतियां भी शामिल थीं। अब दिल्ली के छतरपुर में एक कम्पाउंड में रेव पार्टी पर छापेमारी की गई। दिल्ली पुलिस और एक्साईज डिपार्टमेंट की कार्रवाई में नाबालिग लड़कों और लड़कियों समेत एक हजार लोगों को पकड़ा गया। भारी मात्रा में शराब और नशीले पदार्थ पकड़े गये हैं। 

रेव पार्टियों पर छापेपारी की खबरें अखबारों और टीवी चैनलों की हैडलाइन्स बनती हैं, कुछ दिनों बाद लोग भूल जाते हैं क्योंकि कोई गंभीरता से नहीं सोचता, दिल्ली में सब चलता है कहकर लोग आगे बढ़ जाते हैं। दिल्ली में हर वीकेंड पर महफिलें सजती हैं। इन महफिलों में आने वाले लोगों को पूरी रात डांस, म्यूजिक, ड्रग्स और सैक्स का काकटेल मिलता है। रात भर एंज्वाय करने के बाद छात्र-छात्रायें अपनी चमचमाती गाड़ियों में घर लौट जाते हैं। इन महफिलों की सूचना भी खास-खास लोगों को सोशल मीडिया पर दी जाती है। समाज में नशीले पदा​र्थों के एजेंट सक्रिय हैं जो युवा पीढ़ी को ऐसी पार्टियों के लिये आकर्षित करते हैं। 

रेव पार्टियों में पकड़े जाने वाले लोगों में स्कूल जाने वाले छात्र-छात्राओं से लेकर बड़े बिजनेसमैन, राजनीतिज्ञों और अफसरों के बच्चे तक शामिल हैं। ऐसी पार्टियों में ऊंची पहुंच वाले और पैसे वाले ही जा सकते हैं। जब युवक-युवतियां पकड़े जाते हैं तो रातभर पुलिस अफसरों के फोन घनघनाते हैं। आयोजक न केवल एक ही रात में लाखों कमाते हैं बल्कि जो लड़के-लड़कियां अपने ज्यादा दोस्तों को लाते हैं, उन्हें भी मोटी कमीशन दी जाती है। क्या ऐसी रेव पार्टियां ‘उड़ता पंजाब’ से कम हैं। क्या ऐसी पार्टियां बिना स्थानीय पुलिस की मिलीभगत के हो सकती हैं? यह सब कुछ पुलिस और ड्रग्स का धंधा करने वालों की सांठगांठ से ही होता है। 

आयोजक हर पार्टी से पहले पुलिस को मोटा चढ़ावा चढ़ाते हैं। बड़े लोगों की पार्टी होती है और मामले दब जाते हैं। आखिर नशीले पदार्थ इन पार्टियों में कैसे पहुंचते हैं, इनके पीछे कौन-कौन लोग हैं, जो देश के युवाओं को बर्बाद कर रहे हैं, उन पर हाथ डालने के लिये कुछ नहीं होता। गोवा, पुणे, खंडाला, पुष्कर, मनाली से चली रेव पार्टियों ने अब दिल्ली और आसपास के शहरों में जगह बना ली है। ड्रग्स का धंधा करने वालों के लिये यह पार्टियां फायदे का धंधा बन गई हैं। अब तो लड़कियों ने भी लड़कों को पीछे छोड़ना शुरू कर दिया है। राजधानी दिल्ली की ​बस्तियों में नजर डालें तो आपको पार्कों में, सड़कों के किनारे नशा करते लोग दिखाई दे जायेंगे। पुनर्वास कालोनियों में तो 80 फीसदी बच्चे ड्रग्स के आदी हो चुके हैं। कबाड़ बीन कर रोजाना तीन सौ रुपये कमाने वाले लोग अपना पैसा ड्रग्स पर खर्च कर रहे हैं। 

नशा और नशे का कारोबार अपनी सीमायें पार कर रहा है। अमीर वर्ग महंगे ड्रग्स की दलदल में फंसा है तो गरीब वर्ग सिंथेटिक कैमिकल नशों की गिरफ्त में है। पानी सिर के ऊपर बहने लगा है। जब तक ड्रग्स सप्लाई की चेन नहीं टूटेगी तब तक नशे का खात्मा करना मुश्किल है, भले ही कानून कितने ही सख्त क्यों न हों। हर बार पुरानी कहानी दोहराई जाती है कि सीमा पार से ड्रग्स की सप्लाई होती है, यह भी सही है कि करोड़ों की ड्रग्स पकड़ी जा रही है फिर भी हर जगह ड्रग्स उपलब्ध है। किसी भी सरकार के लिये नशे के शिकार हर व्यक्ति को नशा मुक्ति केन्द्रों में डालकर इलाज कराना संभव नहीं है। एनडीपीएस एक्ट 1985 में 1989 से ही मौत की सजा का प्रावधान है। 

30 साल से मौत की सजा के प्रावधान के बावजूद नशा तस्करी और इनके खपतकारों में कोई कमी नहीं आई है। बढ़ती नशा प्रवृति के चलते महिलाओं के प्रति अपराध बढ़ रहे हैं। हैरानी की बात तो यह है कि दिल्ली में नशा कभी चुनावी मुद्दा नहीं बना। राजधानी ने बड़े-बड़े राजनीतिक आन्दोलन देखे हैं लेकिन इस समय जरूरत है ​एक सामाजिक आन्दोलन की। नशे की जड़ को समाप्त करना है और स्वस्थ समाज का वातावरण बनाना है तो समाज को जागना होगा और राजनीतिक दलों को भी। 

भावी पीढ़ी को बचाना है तो राजनीतिक दलों और समाज को मिलकर नशे के विरुद्ध अभियान चलाना होगा और पुलिस को भी युवाओं को मौत की ओर धकेलने वाली अपने भीतर की काली भेड़ों की पहचान करनी होगी। अगर ऐसा नहीं किया गया तो युवा वर्ग नशे की दलदल में इतना फंस जायेगा जहां से उसे निकालना मुश्किल होगा। किसी भी महानगर का रात की बांहों में झूमना जीवन की शैली हो सकता है लेकिन नशे में झूमना एक नासूर होता है।