लोकतंत्र और राष्ट्रवादी विचार

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लोकतन्त्र विचार विविधता और मत विभिन्नता का समुद्र होता है। भारत में लोकतन्त्र की जड़ें कितनी गहरी हैं इसका आभास इसी से होना चाहिए कि जैन धर्म में ‘स्यातवाद’ की स्थापना हजारों वर्षों पूर्व एक सिद्धान्त दर्शन के रूप में की गई जिसका मतलब ही होता है विरोधी विचार की प्रतिष्ठा। कथनचित और कदाचित हिंसा के तीन प्रकारों शारीरिक, मानसिक व बौद्धिक का तिरस्कार करता है और ‘मानवतावाद’ की स्थापना करता है। भारतीय अथवा हिन्दू संस्कृति मानवतावाद का लगातार परिष्कार करती रही है। महात्मा गांधी ने जिस ‘रघुपति राघव राजा राम’ और ‘वैष्णव जन ते तेने कहिये’ के शब्दोच्चार को अपनाया उसका मूल मानवतावाद के अलावा कुछ नहीं है। उन्होंने प्रतीकात्मक रूप में मानवतावाद को सरल बनाने का प्रयास करते हुए उसे जन-जन तक पहुंचाया और अंग्रेजों के विरुद्ध अपने आन्दोलन को धारदार बनाया। यही वजह रही कि धर्म के नाम पर जब 1947 में नाजायज मुल्क पाकिस्तान का निर्माण हिन्दोस्तान की धरती को काटकर किया गया तो शेष बचे भारत ने धर्मनिरपेक्षता को अपना आधार बनाते हुए घोषणा की कि भारत में बचे मुसलमान नागरिकों के लिए हिन्दू बहुसंख्यक सुरक्षा कवच का काम करेंगे और उन्हें एक नजर से देखेंगे। सत्ता की भागीदारी में उनका मुसलमान होना आड़े नहीं आयेगा मगर इस समय पं. नेहरू एक गलती कर गये कि उन्होंने मुसलमानों के धर्म की प्रतिष्ठा भारतीय नागरिकता से ऊपर कर दी और उन्हें स्वतन्त्रता प्रदान कर दी कि उनके घरेलू व सामाजिक मसलों में भारत का कानून लागू नहीं होगा बल्कि उनके अपने धर्म का कानून ‘शरीया’ लागू होगा। इससे मुसलमानों की पहचान अन्य भारतीयों से अलग हो गई और वे वोट बैंक के रूप में देखे जाने लगे। नेहरू का यह विचार था जो अन्तत: राष्ट्र की एकमेव पहचान पर भारी पडऩे लगा और मुसलमान नागरिक स्वयं को अलग-थलग देखने लगे। इसे हम विचार वैविध्य नहीं कह सकते क्योंकि किसी राष्ट्र की पहचान के बारे में इसकी गुंजाइश नहीं हो सकती मगर नेहरू के दौर में ही जब जनसंघ की स्थापना हुई तो उसने इस विचार के विपरीत ‘राष्ट्रवाद’ की धारा चलाई और स्पष्ट किया कि भारत की एकता के लिए जरूरी है कि अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक की परिभाषाएं गढऩे की जगह भारतीयता की परिभाषा गढ़ी जाये और इसमें से धर्म को बाहर करके केवल हिन्दोस्तानियत की बात की जाये। इस विचार को साम्प्रदायिक करार दिया गया और कहा गया कि यह संकीर्णतावादी सोच है। इसमें हिन्दू और मुसलमान में भेद करने की बात कही गई है जबकि वास्तविकता इसके उलट थी। यह मत समस्त भारतवासियों की नागरिकता को एक सूत्र में बांधने की वकालत करता था। यह विचार शुरू में भारतवासियों के मानस में पैठ बनाने में असफल रहा परन्तु कालान्तर में जिस तरह भारत की राजनीति पर लगातार क्षेत्रवाद और जातिवाद तथा सम्प्रदायवाद प्रभावी होता चला गया उसने राष्ट्रवाद के विचार को सार्वभौमिकता प्रदान कर दी और उसका सबसे प्रखर परिणाम हमें 2014 के लोकसभा चुनावों में मिला जिसमें भारतीय जनता पार्टी अपने बूते पर लोकसभा में पूर्ण बहुमत लेने में सफल रही। यह संकीर्णता या बहुमतवाद की विजय नहीं बल्कि राष्ट्रवाद की विजय थी और हाल ही में उत्तर प्रदेश विधानसभा के जो चुनाव नतीजे आये हैं उन्होंने पुन: स्थापित कर दिया कि राष्ट्रवाद का विचार भारतीयता के समागम होने का एकमेव मन्त्र है। प्रश्न खड़ा किया जा रहा है कि इसमें मुसलमानों की क्या भूमिका है? यह भूमिका कम नहीं है क्योंकि मुसलमान बदलते भारत की आकांक्षाओं के साथ खुद को बदलने की तरफ अग्रसर होंगे ही और राष्ट्रीय एकात्मता में ही अपनी पहचान खोजेंगे जिससे उनकी पहचान सबसे पहले भारतीय के रूप में हो सके। विचार वैविध्य का यह ऐसा पहलू है जिसकी तरफ हमें सजग होकर आगे चलना होगा क्योंकि अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर जिस प्रकार की गतिविधियां आतंकवाद की मार्फत चलाई जा रही हैं उसमें मुसलमानों को बदनाम करने की साजिश छुपी हुई है। भारत में इस साजिश की विफलता राष्ट्रीय एकात्मता की पहचान में छिपी हुई है। विचार वैविध्य का यह दूसरा पहलू है जिसकी इजाजत हमारी लोकतान्त्रिक प्रणाली देती है। अत: भारत की राजनीति में जो उथल-पुथल हो रही है वह विचार भिन्नता का ही परिणाम है। अभी तक जो विचार चलता रहा है उसके विरुद्ध ही यह राष्ट्रवाद का विचार अपना रंग दिखा रहा है।

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