लोकसभा चुनाव के पहले चरण का मतदान सम्पन्न हो गया। इस मतदान के साथ यह एक बार फिर प्रमाणित हो गया है कि भारत का जनतंत्र इतना मजबूत है कि वह गनतंत्र को भी पराजित कर देता है। इसका उदाहरण मिला छत्तीसगढ़ की नक्सल प्रभावित लोकसभा सीट बस्तर में। मतदाता न नक्सलियों की धमकियों से डरे और न ही धमाकों से। मतदाताओं के उत्साह ने नक्सलियों की धमकियों को पांवों तले रौंद दिया। मतदान के दो दिन पहले ही मंगलवार शाम दंतेवाड़ा में नक्सली हमला हुआ। इसमें भाजपा विधायक भीमा मंडावी और 4 जवान शहीद हो गये थे। मतदान करने के लिये भाजपा विधायक मंडावी की विधवा ओजस्वी मंडावी भी परिवार सहित मतदान करने आई। मतदान से पूर्व दो दिन तक वारदात काे नक्सलियों ने अपनी मौजूदगी दिखाने की कोशिश की।

चुनाव के दौरान बस्तर में नक्सल हिंसा का पुराना इतिहास रहा है। नवम्बर-दिसम्बर 2018 में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान भी नक्सलियों ने गड़बड़ी करने की बहुत कोशिश की थी। दंतेवाड़ा जिले के नीलवाया गांव में फोर्स को एंबुश में फंसाने की कोशिश थी जिससे दूरदर्शन के एक कैमरामैन की मौत हो गई थी। तब भी नक्सलियों ने चुनाव के दौरान धमकी दी थी कि अगर किसी की उंगली पर अमिट स्याही देखी तो उंगली काट दंेगे। फिर भी आदिवासी नदी-नाले पार कर वोट देने पहुंचे। मई 2013 में विधानसभा चुनाव से पहले नक्सलियों ने मनीरम घाटी में कांग्रेस की पदयात्रा से लौट रहे नेताओं पर हमला कर दिया था जिसमें पूर्व केन्द्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल, महेन्द्र कर्मा, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंद कुमार पटेल आैर अन्य नेता मारे गये थे। इस बार भी नक्सलियों ने बस्तर के नारायणपुरा विधानसभा क्षेत्र में आईईडी ब्लास्ट किया लेकिन सौभाग्य से कोई हताहत नहीं हुआ। जहां भाजपा विधायक की हत्या की गई थी वहां श्याम गिरी में 78 फीसदी वोटिंग दर्ज की गई। इस लोकसभा चुनावों में एक नया इतिहास भी लिखा।

नक्सलियों का गढ़ माने जाने वाले अबूझामांड इलाके में आजादी के बाद पहली बार लोगों ने नक्सलगढ़ में अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया। हालांकि दंतेवाड़ा में चुनाव बहिष्कार के नक्सली फरमान का अंदानी इलाके में असर दिखाई दिया। आश्चर्य इस बात पर भी रहा कि बस्तर, बीजापुर और नारायणपुर जिले के कई मतदान केन्द्रों पर लाखों रुपये के इनामी आत्मसमर्पण करने वाले नक्सली मतदान के लिये पहुंचे।जो लोग कभी लोगों को मतदान पर धमकी देते थे उन्होंने स्वयं लोकतंत्र के महायज्ञ में आहुति डाली। बीजापुर नेशनल पार्क एरिया के कमांडर रह चुके 8 लाख के इनामी सन्तु कर्मा ने आत्मसमर्पण के बाद अपनी पत्नी के साथ वोट डाला। नक्सली जो लगातार लाशें गिरा रहे थे और उनकी नजर में वे हत्यारे नहीं, क्रांतिकारी हैं, उनमें से अधिकतर की मानसिकता बदल रही है। वह राष्ट्र की मुख्यधारा में शामिल हो रहे हैं। इससे कोई संकेत मिलता है तो यह कि आने वाले समय में नक्सलियों की व्यवस्था से हथियारबंद लड़ाई कमजोर होती जायेगी। जम्मू-कश्मीर की बारामूला और जम्मू लोकसभा सीटों पर भी मतदान हुआ।

भारत के लोगों की लोकतंत्र में आस्था इतनी मजबूत है कि कश्मीरी पंडित 1990 में घाटी से पलायन करने के बावजूद मतदान करते हैं। विस्थापित कश्मीरी पंडितों ने अपने जीवन को पटरी पर लाने के लिये क्या कुछ नहीं किया। देश के विभिन्न शहरों में शिविरों में रहे, अब उनके परिवारों की नई पीढ़ी भी युवा हो चुकी है। कुपवाड़ा और घाटी के अन्य क्षेत्रों के सुदूरवर्ती गांव में अपना घर बार छोड़ कर जम्मू के जागती शिविर में रह रहे 15 हजार लोगों ने मतदान किया। हालांकि विस्थापित कश्मीरी पंडित पिछले 4 लोकसभा चुनावों में वोट देते रहे हैं। सरकारें बनती रहीं लेकिन उनकी घर वापिसी की समस्या का समाधान नहीं हुआ। अब की बार वोट डालने आये कश्मीरी पंडितों काे अभी भी उम्मीद है कि आने वाली सरकार उनकी घाटी में वापिसी और पुनर्वास सुनिश्चित करेगी।

कश्मीरी पंडितों के साथ सिस्टम ने बहुत खराब व्यवहार किया, इसके बावजूद वोट की ताकत में उनका विश्वास कम नहीं हुआ। जम्मू-कश्मीर की जनता ने भी कई बार कट्टरपंथियों को मात दी है लेकिन सियासत ने बहुत नकारात्मक भूमिका निभाई। जब घाटी का अवाम भी वोट डालने मतदान केन्द्रों पर आता है तो साफ है कि उसकी भी भारत के संविधान और जनतंत्र में आस्था है। सत्ता को भी जनआकांक्षाओं का ध्यान रखना होगा। लोगों की आस्था खरीदने के प्रयास नहीं किये जाने चाहिये बल्कि लोकतंत्र में लोगों की सहभागिता बढ़ाने के प्रयास हाेने चाहिये। गनतंत्र एक न एक दिन पूरी तरह पराजित हो जायेगा।