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राजस्थान में लोकतन्त्र की परीक्षा

राजस्थान कांग्रेस के बागी नेता सचिन पायलट अपना घर छोड़ कर अब रास्ता भटक गये हैं। मुख्यमन्त्री श्री अशोक गहलौत ने जिस तरह अपनी सरकार गिराये जाने के ‘आपरेशन’ को समय रहते ही ‘फेल’ किया है उससे उनकी जमीनी राजनीति की गहरी पकड़ का अन्दाजा लगाया जा सकता है और निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि राजस्थान दूसरा ‘मध्य प्रदेश’ होने से बच गया है। लोकतन्त्र में चुनी हुई सरकारों को दल बदल या विधायकों की खरीद-फरोख्त अथवा सत्ता के लालच से गिरा देने की पैरवी राजनीति को किसी खुले बाजार में बदल देती है जो विधायकों की कीमत लगा कर उनकी नीलामी तक कर  देती है। वाजिब सवाल पैदा होता है कि जब श्री पायलट को अपने पुराने साथी ज्योतिरादित्य सिन्धिया की तरह न तो भाजपा का दामन थामना था और न ही आन्ध्र प्रदेश के जगन मोहन रेड्डी की तरह अपना अलग क्षेत्रीय दल ही बनाना था तो उन्होंने अपनी पार्टी का अनुशासन तोड़ कर विद्रोह का बिगुल क्यों बजाया? श्री पायलट प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और उप मुख्यमन्त्री पद से बर्खास्त होने के बाद भी कह रहे हैं कि वह अभी भी कांग्रेस में ही हैं। जाहिर है उनकी मंशा वह नहीं थी जिसे वह अब व्यक्त कर रहे हैं ? क्या वह मध्य प्रदेश की तर्ज का प्रयोग कांग्रेस के कुछ विधायकों को साथ लेकर करना चाहते थे ?

दुर्भाग्य से इसमें उन्हें सफलता नहीं मिली क्योंकि कांग्रेस के कुल 107 विधायकों में से वह केवल 17 को ही बागी बना पाये। 200 सदस्यीय राजस्थान विधानसभा में  विपक्षी भाजपा के कुल विधायकों की संख्या 75 को देखते हुए 17 विधायकों के बूते पर सरकार को हिलाया-डुलाया जाना मुश्किल था जिसकी वजह से राजस्थान भाजपा के नेता श्री गुलाब चन्द कटारिया ने साफ कह दिया है कि उनकी पार्टी फिलहाल विधानसभा सत्र बुलाने की मांग नहीं कर रही है। यह गहलौत सरकार के वर्तमान संकट से सुरक्षित बाहर निकल आने की गारंटी है और इस बात का भी सबूत है कि श्री पायलट की फिलहाल भाजपा में कोई उपयोगिता नहीं है। अतः यह कहा जा सकता है कि सचिन पायलट ने अपनी हैसियत से बाहर पैर फैला दिये जिन्हें समेटना अब उनके लिए ही भारी हो रहा है एेसा इसीलिए हुआ क्योंकि कांग्रेस पार्टी ने उन्हें स्व. राजेश पायलट का पुत्र होने की वजह से जरूरत से ज्यादा तरजीह दी और निष्ठावान पुराने कांग्रेस कार्यकर्ताओं की पीठ पर उन्हें चढ़ाने से भी गुरेज नहीं किया।  मगर सचिन ने जो व्यवहार कांग्रेस के साथ किया है उसके लिए यह पार्टी खुद जिम्मेदार है क्योंकि कांग्रेस ‘बड़े बाप के बेटों’ की रियासत बनती जा रही है और इसे युवा पीढ़ी का नाम दिया जा रहा है।

 यदि नाम गिनना शुरू करें तो माननीय कपिल सिब्बल  जैसे कुछ नेताओं को छोड़ कर हर बड़े कांग्रेसी का बेटा आज कांग्रेस में नेता बना घूम रहा है। कांग्रेस कामराज से लेकर लालबहादुर शास्त्री और चन्द्रभानु गुप्ता जैसे नेताओं की पार्टी भी रही है। अतः पायलट प्रकरण से उपजा विचारणीय मुद्दा यह भी है कि विपक्ष की यह सबसे बड़ी पार्टी किसानों, मजदूरों, दस्तकारों व कामगारों के कुशाग्र व बुद्धिमान बेटों की पार्टी किस तरह बने? लोकतन्त्र की सफलता की गारंटी समाज का दबा-कुचला वर्ग ही करता है क्योंकि वह जन्म से संघर्षशील होता है।

 बौद्धिक रूप से समर्थ व्यक्ति इसी समुदाय को नेतृत्व देकर शहरों से लेकर गांवों तक लोकतन्त्र की जड़ें फैलाता है। सचिन पायलट के सन्दर्भ में यह वाजिब सवाल है कि अगर वह वापस कांग्रेस में नहीं आते हैं तो उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करते हुए विधानसभा की सदस्यता से क्यों न बर्खास्त किया जाये और उनके 17 साथियों को भी यही रास्ता दिखाया जाये। यदि ये लोग मध्यप्रदेश दोहराने ही चले थे तो क्यों न इनको ऐसा सबक सिखाया जाये जिससे किसी अन्य राज्य की स्थिर सरकार आगे चल कर अस्थिर न हो सके।

 श्री पायलट को एतराज है कि उन्हें मुख्यमन्त्री अशोक गहलौत के इशारे पर राजद्रोह जैसे संगीन मामले में फंसाने हेतु नोटिस भेजा गया। यदि मुख्यमन्त्री गहलौत की सरकार को यह सूंघ लग गई थी कि उनकी सरकार को अस्थिर करने का षड्यन्त्र घर के भीतर से ही रचने का प्रयास किया जा रहा है तो नोटिस भेजने में क्या हर्ज था। नोटिस तो सभी मन्त्रियों को मिला है और निर्दलीय सदस्यों तक को मिला है और खुद मुख्यमन्त्री ने भी नोटिस लिया है। मगर सबसे बड़ा सवाल लोकतन्त्र को पराजित करने का है। मध्यप्रदेश में ज्योतिरादित्य सिन्धिया के जिन 22 समर्थक विधायकों ने सदस्यता से इस्तीफा दिया था अब वहां उप चुनाव होंगे। ये चुनाव किस कीमत पर होंगे ? इसका भुगतान मध्य प्रदेश की उस जनता को ही करना पड़ेगा जिसने नवम्बर 2018 में अपना जनादेश कांग्रेस पार्टी को देकर सरकार बनाने की अनुमति दी थी। यह जनादेश पांच वर्ष के लिए था। मगर बीच में ही इसे पलट दिया गया और विधानसभा का स्वरूप भी बदल दिया गया। यह जांच किस दरबार या अदालत में होगी कि इस्तीफे किन परिस्थितियों में दिये गये ? विधानसभा अध्यक्ष इसका फैसला करते हैं जहां मनोवैज्ञानिक जांच का सवाल पैदा ही नहीं होता। दलबदल कानून को ध्वस्त करने का यह तोड़ भारत के लोकतन्त्र में जिस तरह फैला है उसका एक रास्ता गहलौत ने निकालने की कोशिश भर की है जो पूरी तरह वैधानिक है। किसी भी स्थिर सरकार को गैर कानूनी रास्तों से गिराने का षड्यन्त्र रचना राजद्रोह जैसा अपराध ही होता है विधायकों को लालच या डर दिखा कर अस्थिरता पैदा करना गैरकानूनी होता है।