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लोकतंत्र का रखवाला ‘मतदाता’

भारत में लोकतन्त्र की जड़ें कितनी गहरी हैं। इसका सबसे बड़ा प्रमाण इसके वे लोग हैं जिन्हें अंग्रेजों ने अपने दो सौ साल के शासन में भूखा-नंगा बनाकर इस कदर बेहाल छोड़ा था कि मुल्क की 98 प्रतिशत जनता दो जून की रोटी के लिए खेती और छोटे-मोटे धन्धों पर निर्भर करती थी।

मगर यह प. जवाहर लाल नेहरू थे जिन्होंने आजादी से भी बहुत पहले ब्रिटिश सरकार को चेतावनी दी थी कि भारत कभी भी गरीब मुल्क नहीं रहा है और न आगे रहेगा क्योंकि इस सर जमीं में मेहनत और हुनर का ऐसा संगम है जिस पर कोई भी मुल्क नाज कर सकता है।

इसलिये अंग्रेजों को अपना बोरिया-बिस्तर बांध कर लन्दन रवाना हो जाना चाहिए। गांधी बाबा से लेकर नेहरू और डा. अम्बेडकर को यह पक्का यकीन था कि इस मुल्क की मुफलिसी केवल लोकतान्त्रिक पद्धति अपना कर ही दूर होगी और हर नागरिक को एक समान अधिकार देने से हासिल होगी। आर्थिक आजादी प्राप्त करने से पूर्व सबसे पहले राजनैतिक आजादी देनी होगी और ऐसा निजाम कायम करना होगा जिसमें किसी गरीब का होनहार बेटा भी राजनीति के क्षेत्र में प्रवेश करके ऊंचे से ऊंचे औहदे पर बैठ सके। इसका पहला प्रमाण स्वयं डा. अम्बेडकर ही थे जिन्हें प. नेहरू ने अपने मन्त्रिमंडल में देश का पहला कानून मन्त्री बनाया था।

इसलिये आजादी के समय से ही इस देश के आम मतदाता में यह विश्वास पैदा हो गया था कि उसके एक वोट के अधिकार का मतलब उसकी अपनी सरकार होगी और वही इस मुल्क का मालिक कहलायेगा। मगर जैसे-जैसे वक्त बीतता गया हमारे लोकतन्त्र पर धन का प्रभाव भी बढ़ता गया और बाहुबलियों का असर भी बढ़ता गया। इसे जातिवादी राजनीति ने चरम सीमा पर पहुंचा दिया और वह नजारा पेश होने लगा जिसकी चेतावनी हमारे संविधान निर्माता डा. अम्बेडकर ने 26 नवम्बर 1949 को इस देश को संविधान देते हुए दी थी।

उन्होंने कहा था कि यदि हमने आर्थिक समानता की तरफ निर्णायक कदम नहीं उठाये तो इस राजनैतिक आजादी के कुछ ऐसे लोग ठेकेदार बन जायेंगे जो लोगों को विभिन्न वर्गों और समाज में बांट कर इनके वोट का इस्तेमाल अपनी इजारेदारी कायम करने से नहीं चूकेंगे। वास्तव में आज की राजनीति का कमोबेश हाल यही है लेकिन इसके बावजूद आम लोगों की राजनैतिक चेतना सुप्त कभी नहीं हुई और ये वक्त की नजाकत को देखते हुए उड़ती चिडि़या के परों पर हल्दी लगाने का कमाल भी करते रहे।

इसका नजारा 1980 मंे तब पूरे शबाब पर देखने को मिला जब 1977 की श्रीमती इन्दिरा गांधी की कांग्रेस की करारी हार को लोगों ने धमाकों के साथ पलट दिया और ऐलान किया कि 1977 से 1980 तक के तीन सालों के दौरान जनता पार्टी की मोरारजी देसाई सरकार ने इंदिरा जी के साथ जिस तरह बेइंसाफी करते हुए उन्हें ‘शाह जांच आयोग’ के नाम पर फंसाने की कोशिश की है उसे यह मुल्क किसी सूरत में न तो बर्दाश्त करेगा और न स्वीकार करेगा।

राजनैतिक विरोध को अपराधीकरण के दायरे में लाने के जनता सरकार के सारे प्रयास असफल हो गये और इन्दिरा जी को आम जनता ने ही सिर-माथे पर बैठा लिया लेकिन इसकी वजह केवल एक ही थी और वह आम मतदाता की राजनैतिक बुद्धिमत्ता थी। दरअसल भारत के साधारण मतदाता की यह विशेषता रही है कि वह उन राजनैतिक पेंचों को अपनी समझ से इस प्रकार खोलता है कि राजनीतिज्ञों का वह सच प्रकट हो जाता है जिसे वह अपनी राजनीति को चमकाने के लिए अपने विरोधियों को झूठ के जाल में फांस कर रचने की कोशिश करते हैं। यह कार्य बड़ी चालाकी के साथ स्व. वीपी सिंह ने किया था जब उन्होंने बोफोर्स कांड में स्व. राजीव गांधी को फंसाने की व्यूह रचना की थी।

वह सार्वजनिक सभाओं में अपनी शेरवानी की जेब में एक हाथ डाल कर घोषणा किया करते थे कि स्विस बैंक खातों के नम्बर उनके पास एक पर्चे पर लिखे हुए पड़े हैं परन्तु इसके बावजूद उनकी सरकार तब केवल 11 महीने ही चल पाई थी जब भाजपा ने उन्हें बाहर से समर्थन दिया था और वह स्वयं बोफोर्स को भूल कर मंडल आयोग की रिपोर्ट की शरण में चले गये थे। आम मतदाता के सामने सच इस प्रकार प्रकट हुआ कि बाद में वी.पी. सिंह दिल्ली के झुग्गी-झोपड़ी वालों की राजनीति करने लगे। इससे यही सिद्ध होता है कि भारत का मतदाता अपने विश्वास का कत्ल करने वाले को सजा देना भी जानता है क्योंकि राजनीतिज्ञों की इस शतरंज को वह भली-भांति समझता है कि मुझे मालूम है तू मेरा कत्ल करेगा और फिर इल्जाम भी मेरे सिर धरेगा