बंगाल मे दुर्गा पूजा उत्सव को जो लोग केवल धार्मिक उत्सव मानते हैं वे महान बांग्ला संस्कृति में निहित सकल मानवतावाद के मानकों से अनभिज्ञ ही कहे जाएंगे क्योंकि यह सांस्कृतिक महोत्सव धर्म की सीमाएं तोड़ कर सामान्य बंगाली व्यक्ति में जीवन के उस आलोक को भरता है जो सर्वदा दुष्प्रतियों के प्रति सावधान रहते हुए सद्मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। विजयदशमी या नवदुर्गा के नाम से जाने जाने वाले इस पर्व का महात्म्य समस्त बंगाल को नव आभा से इस प्रकार भरता है कि प्रत्येक धर्म या मजहब का मानने वाला व्यक्ति इसकी सांस्कृतिक सरिता में गोते लगाने लगता है। यही वजह रही काजी नजरूल इस्लाम जैसे बंगाल के मनीषी ने दुर्गा पूजा उत्सव को मजहब की दीवारों से दूर रख कर देखा। इतना ही नहीं बंगलादेश के 1971 तक पूर्वी पाकिस्तान रहने के बावजूद इसकी धरती पर दुर्गा पूजा उत्सव में सभी नागरिकों की भागीदारी रही और बंगलादेश बनने के बाद तो यहां की सरकार ने इस पर्व के मनाने में किसी प्रकार की बाधा न आने देने के लिए सरकारी सुरक्षा की पक्की व्यवस्था की।

वर्तमान में भी इस देश में यहां की सरकार दुर्गा पूजा पंडालों की सुरक्षा की पुख्ता व्यवस्था करती है। अतः भारत के प. बंगाल राज्य में इसकी मुख्यमन्त्री सुश्री ममता बनर्जी ने यदि दुर्गा पूजा पंडालों को सुरक्षा हेतु इन्हें लगाने वाली नागरिक समितियों को दस हजार रुपये प्रति के हिसाब से मदद देने का फैसला किया तो उसे किसी भी तौर पर हिन्दू– मुसलमान के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए था। ममता दी की इस सदाशयता को यदि हम साम्प्रदायिक चश्मे से देखने की गलती करते हैं तो भारत की संस्कृति के मूल तत्व को नजरअंदाज करते हैं जिसमें विभिन्न पर्वों के माध्यम से हमेशा सदमार्ग पर चलने की प्रेरणा रहती है और मनुष्य को बुराई से लड़ने की ताकत मिलती है। परन्तु दुर्भाग्य से यह मामला कोलकाता उच्च न्ययालय से होता हुआ सर्वोच्च न्यायलय तक याचिकाओं की मार्फत आया और दोनों ही न्यायालयों ने राज्य सरकार के निर्णय को उलटना उचित नहीं समझा।

बल्कि उच्च न्यायालय ने तो अपने फैसले में स्पष्ट किया था कि वह पंडालों को आंशिक रूप से राशि वितरण होने के बाद इस मामले में हस्तक्षेप नहीं करेगा। इसके विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में जाने पर भी विद्वान न्यायाधीशों ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा है कि वह राज्य सरकार के काम में अड़चन नहीं डाल रहे हैं परन्तु इतना निर्देश दे रहे हैं कि पंडाल आयोजकों को यह धनराशि पुलिस के माध्यम से ही वितरित की जाए। दरअसल ममता दी ने दस हजार की धनराशि प्रत्येक पूजा पंडाल को इसकी सुरक्षा हेतु प्रदान करने की घोषणा की थी। यह भी जाहिर है कि राज्य सरकार पर ही पुलिस प्रशासन की मदद से ही दुर्गा पूजा समारोहों के सफल आयोजन के प्रबन्धन की जिम्मेदारी रहती है। इन सभी पंडालों की सुरक्षा-व्यवस्था के सन्दर्भ में पुलिस की मदद से ही इनकी आयोजक समितियां इन्तजाम करती हैं। किसी भी सामाजिक या सांस्कृतिक अथवा धार्मिक आयोजन हेतु सुरक्षा के लिए पुलिस बन्दोबस्त की व्यापक और पक्की व्यवस्था करना किसी भी राज्य सरकार की जिम्मेदारी होती है।

परन्तु प. बंगाल में दुर्गा पूजा आयोजन इतने विशाल और व्यापक स्तर पर होता है कि पुलिस को भी एेसे सहायक बन्दोबस्त की दरकार रहती है जिससे वह अपनी जिम्मेदारी को प्रभावशाली ढंग से पूरा कर सके। क्योंकि प. बंगाल में यह त्यौहार ‘बांग्ला राष्ट्रीय पर्व’ जैसा होता है। अतः इसकी सुरक्षा व्यवस्था के लिए यदि अतिरिक्त सावधानी बरती जाती है और इसके लिए आर्थिक स्रोत मुहैया कराए जाते हैं तो वे भारत के धर्मनिरपेक्ष चरित्र के विरुद्ध नहीं कहे जाएंगे। क्योंकि स्वतन्त्रता के बाद से ही भारत में एेसी व्यवस्था रही है कि सभी धर्मों के मानने वाले लोगों की धार्मिक भावनाओं और श्रद्धा को देखते हुए होने वाले आयोजनों को पुलिस संरक्षण प्राप्त हो जिससे उनका सफल आयोजन हो सके। इस सन्दर्भ में हिन्दू तीर्थ यात्रियों के दुर्गम पूज्य स्थलों जैसे श्री अमरनाथ गुफा आदि की यात्रा को खतरे से बाहर रखने के लिए राज्य की जम्मू-कश्मीर सरकार से लेकर केन्द्र सरकार जरूरी सुरक्षा चक्र व सुविधा मदद प्रदान करती रही हैं। इसी प्रकार हज पर जाने वाले मुस्लिम यात्रियों की मदद की व्यवस्था भी सरकार ने की।

किन्तु विविधता से भरे भारत में इसकी सांस्कृतिक धारा के भी इतने रंग हैं, जिसमें मजहबों के अलग–अलग होने के बावजूद इनका समागम विस्मय पैदा कर देता है और मानवीयता की चमक को बिखेरता है। हर राज्य और क्षेत्र की खुशबू से भरी संस्कृति के भीतर मानवीय आत्मीयता के तत्व इस प्रकार भरे हुए हैं कि मजहब के मायने सिर्फ पूजा पद्धति तक सिमट कर रह जाते हैं। यही वजह है कि प. बंगाल में जब किसी भी धर्म का मानने वाला हुनरमन्द मजदूर वन सम्पदा पाने के लिए उसमें प्रवेश करता है तो सबसे पहले ‘वनदेवी’ की पूजा–अर्चना करता है। दुर्गा पूजा तो सबसे बड़ा एेसा सामाजिक व सांस्कृतिक उत्सव है जिसका धार्मिक कलेवर होने के बावजूद कहीं कोई दकियानूसी या पोंगापंथी पहचान नहीं रहती।