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भारत में कोरोना के आँकड़े #GharBaithoNaIndiaSource : Ministry of Health and Family Welfare

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राम का नाम बदनाम न करो

पंजाबी में एक कहावत है ''तू मामा लागदा है यह तब इस्तेमाल किया जाता है जब कोई व्यक्ति किसी के विवाद में बिना मतलब, बिना किसी के बुलावे पर टांग अड़ाते हुए मामला हल कराने का दावा करने लगता है। अब आज श्री श्री रविशंकर जी की यही स्थिति है। अयोध्या में बाबरी विध्वंस से लेकर श्रीराम मंदिर निर्माण (जो कि अभी होना है) के लिए माकूल माहौल बनाने तक जिस विश्व हिन्दू परिषद, आरएसएस, अखाड़ा निर्मोही परिषद, बजरंग दल और अन्य सहयोगी संगठनों ने जितनी मेहनत की है उन्हें पीछे छोड़कर अचानक श्री श्री रविशंकर एक नए मध्यस्थ बनकर अपनी सियासत चमकाने के लिए मैदान में उतर आए हैं। श्री श्री रविशंकर मुसलमानों के विभिन्न संगठनों से अपने आप जाकर बात करने लगे हैं जिससे मुसलमान फिर भड़क गए हैं और देश को भीषण विस्फोट के कगार पर श्री श्री ने पहुंचा दिया है। उन्हें केंद्र सरकार, यूपी सरकार या फिर सुप्रीम कोट ने कोई वार्ताकार या मध्यस्थ अधिकृत रूप से घोषित नहीं किया परंतु वह अपने आपको सुप्रीम कोर्ट से भी बड़ा मानकर धंधे में लग गए हैं।

इस देश में कानून का अपना नियम है परंतु क्या श्री श्री रविशंकर कानून से भी बड़े हो गए? उन्हें किसने अधिकृत किया? अगर फिर से साम्प्रदायिक माहौल बिगड़ गया तो जिम्मेदार कौन होगा, इत्यादि-इत्यादि सवाल आज सामाजिक स्तर पर और सत्ता के गलियारों में हर कोई एक-दूसरे से पूछ रहा है? सबसे बड़ी बात यह है कि खुद यूपी के सीएम योगी ने रविशंकर से मीटिंग के बाद साफ-साफ कह डाला कि मंदिर मुद्दे पर मेरी रविशंकर से कोई बात नहीं हुई और यूपी सरकार कोई बात चाहती भी नहीं, क्योंकि हम इसमें कोई पक्ष नहीं हैं और जब मामला सुप्रीम कोर्ट में है तो हम कोई भी बात नहीं करना चाहेंगे। इस मामले पर अब श्री श्री रविशंकर क्या कहेंगे? जब से बाबरी मस्जिद गिराई गई है और अब श्रीराम मंदिर निर्माण के लिए मामला सुप्रीम कोर्ट में है तो फिर श्री श्री रविशंकर की इस 'बिचौलिये वाली भूमिका की जरूरत हमें नहीं है। ये देश जितना हिन्दुओं का है उतना ही अन्य मजहबों के अलावा मुसलमानों का भी है। कानून का नियम सबके लिए एक है। सब सुप्रीम कोर्ट में अपने-अपने ढंग से अपनी-अपनी दलीलें दे रहे हैं। अब इस मामले पर जो कुछ होगा वह सुप्रीम कोर्ट तय करेगी, परंतु तीन दशकों के बाद अचानक श्री श्री रविशंकर स्वयंभू वार्ताकार और मध्यस्थ बनकर सामने आएंगे तो फिर यही कहावत लागू होगी 'क्या तू मामा लागदा है। और तो और मंदिर निर्माण के लिए एक चैनल ने स्टिंग के माध्यम से सुन्नी वक्फ बोर्ड को 20 करोड़ रुपए तक दिए जाने के दावे बेनकाब कर डाले हैं। इस स्टिंग में एक हिन्दू नेता दिनेंद्र दास मंदिर के निर्माण को लेकर धन देने की आफर देने की बात कहते नजर आ रहे हैं।

अक्सर हमारे देश में देखा गया है कि जितने भी बाबा हैं वे खुद को कानून और सुप्रीम कोर्ट से बड़ा समझते हैं। यह उनका गुरूर है, जो आगे चलकर उन्हें खत्म कर देता है। डेरा सच्चा सौदा के संचालक राम रहीम का उदाहरण सबके सामने है। वह भी खुद को कानून से बड़ा मानता था। अब ऐसा ही श्री श्री रविशंकर के मामले में भी हो रहा है, जिनके बारे में यह कहा जा रहा है कि किस तरह से उन्होंने कथित रूप से अपने ऊपर गोली चलवाकर राम रहीम की तरह सिक्योरिटी लेने की कोशिश की, जिसमें वह विफल रहे। राम रहीम जैसी पोजीशन पाने और सत्ता में ऊंचा उडऩे की महत्वाकांक्षा पालने का हश्र उन्होंने नहीं देखा। शायद इसीलिए अब राम मंदिर की आड़ में सियासत की जमीन पर चलकर अपनी वह इच्छा श्री श्री रविशंकर पूरी करना चाहते हैं। सोशल साइट्स पर लोग एक-दूसरे से अपनी भावनाएं शेयर कर रहे हैं कि श्री श्री रविशंकर से कोई पूछे कि उन्होंने अपने आश्रम में इकट्ठे हुए धन से कितने भूखे लोगों को रोटी खिलाई? अयोध्या श्रीराम मंदिर के लिए कितना धन दिया? या फिर मंदिर निर्माण के लिए और राष्ट निर्माण के लिए आखिरकार किया क्या है? लोग यह भी कह रहे हैं कि धर्म को लेकर राजनीति चमकाने में हिन्दू बाबाओं की कोई कमी नहीं है और यह श्री श्री रविशंकर भी एक कड़ी ही हैं।

बाबाओं को आज की तारीख में अपने काम से ज्यादा ''दूसरी चीजों का राजनीतिक चस्का लग गया है। रविशंकर जी ने राम मंदिर निर्माण के लिए कितनी राशि का चैक काट कर दिया, यह भी एक अहम सवाल लोग एक-दूसरे से पूछ रहे हैं। कहने वाले कह रहे हैं कि श्री रामदेव की तर्ज पर अब श्री श्री रविशंकर भी अपना प्रोडक्ट लांच कर रहे हैं। देखते हैं कि वो अपनी कमाई में से मंदिर को कितना दान देते हैं। वैसे आज के बाबाओं के युग में एक प्रसिद्ध बाबा जिनके बारे में कहा जाता है कि वे सरकार की पहुंच का लाभ उठाकर अब बड़े बिजनेस मैन हो गए हैं, का जिक्र करना भी जरूरी है। एक वक्त था जब कालेधन, भ्रष्टचार व अन्य घोटालों को लेकर यह बाबा सड़कों पर आंदोलन किया करते थे परंतु नोटबंदी, कालेधन और जीएसटी को लेकर अब उनके मुंह में दही जम गई है।

ये सवाल हमारे नहीं सोशल साइट्स पर लोग एक-दूसरे से पूछ रहे हैं। बता दें कि सत्ता के गलियारों में अपने चहेतों के बीच यह बाबा खुद को राजनीति का चाणक्य मानते हुए बड़े-बड़े मंत्रियों का नाम लेकर उन्हें अपना चेला बताता है। लोग सोशल साइट्स पर कह रहे हैं कि जब से यूपी में एक साधू के रूप में पहचान प्राप्त आदित्य योगीनाथ ने सीएम के रूप में कमान संभाली है तब से राम मंदिर को लेकर तेजी से चल रही सरगर्मियों के बीच श्री श्री रविशंकर ने श्रीराम मंदिर की आड़ में अपना दांव खेल दिया है और इसका नतीजा यह निकला कि उनके इस स्वयंभू प्रयासों से श्रीराम मंदिर निर्माण की कोशिशों को तगड़ा झटका लगा है। शिया समुदाय दोफाड़ हो गया है और उसने वक्फ बोर्ड को करारा झटका दिया है। आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के प्रवक्ता मौलाना यासूब अब्बास ने साफ कह दिया है कि मुसलमानों ने समर्थन नहीं किया है। हम केवल सुप्रीम कोर्ट की ही बात मानेंगे तो वहीं भाजपा के पूर्व सांसद रामबिलास वेदांती ने स्पष्ट चुनौती देते हुए कहा कि मामले में पहल करने वाले श्री श्री रविशंकर होते कौन हैं? जेल हम गए, लाठियां हमने खाई और अब श्री श्री रविशंकर अचानक प्रकट हो गए। जब हम संघर्ष कर रहे थे जब रविशंकर कहां थे? श्री श्री रविशंकर की इस पहल से हिन्दू, मुस्लिम साम्प्रदायिक सद्भाव जो श्रीराम मंदिर निर्माण के लिए बहुत जरूरी है अब प्रभावित होने लगा है। महत्वाकांक्षाएं जब परवान चढ़ती हैं तो अंजाम धृतराष्ट की तरह निकलता है, यह बात हमारे कहने की नहीं, बल्कि दुनिया जानती है। अब रविशंकर को खुद सोचना है कि उन्हें क्या करना है लेकिन मंदिर की आड़ लेकर अपनी सियासत को चमकाने के लिए श्रीराम का नाम बदनाम नहीं किया जाना चाहिए। यह सवाल पूरे देश का है।