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संपादकीय

ट्रंप की दादागिरी और भारत

अमेरिका जिस तरह से भारत के साथ व्यवहार कर रहा है, उससे हमारे और अमेरिका के रिश्तों की असलियत का पता चलता है। साथ ही साथ इस बात की पुष्टि होती है कि उनकी आंखों में हमारा वजन कम से कम मित्रों वाला तो नहीं है। कभी एक शे’र सुनते थे :-


‘‘न जाने क्या वजन है अपना उनकी आंखों में,

सुना है इक नजर से आदमी को तोल लेते हैं।’’

 

किसी न किसी बहाने अमेरिका ने हमें तोलने का अवसर कई बार दिया है। अब एक के बाद एक अमेरिका भारत से दबंगई पर उतर आया है। वह भारत को अपने इशारे पर चलाना चाहता है। अमेरिका की सोच ऐसी बन चुकी है कि वह रात को दिन कहे तो भारत भी दिन कहे, वह दिन को रात कहे तो भारत भी रात कहे। डोनाल्ड ट्रंप का रवैया ऐसा है कि भारत समेत सभी देश उसके सुर में सुर मिलाएं, नहीं तो वह प्रतिबंध लगा सकता है। पहले उसने कहा कि भारत ईरान से तेल खरीदना बन्द करे। अगर भारत ऐसा नहीं करता तो उस पर अमेरिका प्रतिबंध लगाएगा। अमेरिका और ईरान में परमाणु कार्यक्रम को लेकर काफी तनाव है। 

अब यह बात स्पष्ट हो चुकी है कि भारत ने ईरान से तेल खरीदना बन्द कर दिया और वैकल्पिक स्रोतों से वह अपनी तेल की जरूरतें पूरी कर रहा है। इससे पहले अमेरिका के कहने पर भारत वेनेजुएला से तेल खरीदना बन्द कर चुका है। दो दिन पहले अमरीका ने भारत को चेतावनी दी है कि अगर उसने रूस से रक्षा मिसाइल प्रणाली एस-400 खरीदी तो इसका असर भारत-अमेेरिका सम्बन्धों पर पड़ेगा। अब डोनाल्ड ट्रंप ने भारत और तुर्की को दिए गए तरजीही व्यापार व्यवस्था (जीएसपी) वाले देश का दर्जा समाप्त कर दिया है। ट्रंप का यह फैसला भारत-अमेरिका के द्विपक्षीय रिश्तों के लिहाज से बड़ा झटका है। भारत का वाणिज्य विभाग भले ही यह कहे कि तरजीही व्यवस्था हटाए जाने से भारत पर कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा क्योंकि इसके तहत किया जाने वाला व्यापार भारत के कुल व्यापार का मामूली हिस्सा है।

अमेरिका की तरजीही व्यापार व्यवस्था के तहत कोई विकासशील देश अगर अमेरिकी कांग्रेस द्वारा तय शर्तों को पूरा करता है तो वह वाहन कलपुर्जों एवं कपड़ों से जुड़ी सामग्रियों सहित करीब 2,000 उत्पादों का अमेेरिका को बिना किसी शुल्क के निर्यात कर सकता है लेकिन अमेरिका भारत समेत कई देशों पर अनुचित व्यापार पद्धति अपनाने का आरोप लगाता रहा है। अमेरिका के व्यापार घाटे को कम करने का संकल्प जताने वाले राष्ट्रपति ट्रंप कई बार भारत को ‘शुल्कों का राजा’ भी बता चुके हैं और 2018 से ही वे इस व्यवस्था की समीक्षा कर रहे थे। ट्रंप का मानना है कि भारत इस व्यवस्था का लाभ उठाता है, लेकिन अमेरिका से भारत जाने वाले सामानों पर भारी शुल्क लगाता है, इसलिए उसे व्यवस्था से बाहर करना चाहिए आैर उस पर जवाबी शुल्क लगाना चाहिए।

केन्द्र सरकार के प्रतिष्ठानों का कहना है कि भारत जीएसपी के तहत अमेरिका को 5.6 अरब डॉलर के सामानों का निर्यात करता है जिसमें से केवल 1.90 करोड़ डॉलर मूल्य की वस्तुएं ही बिना किसी शुल्क वाली श्रेणी में आती हैं। उनके मुताबिक भारत मुख्य रूप से कच्चे माल एवं जैव-रसायन जैसी वस्तुओं का निर्यात ही अमेरिका को करता है। जीएसपी व्यवस्था को वापस लिए जाने से भारत द्वारा अमेरिका को किए जाने वाले निर्यात पर कोई उल्लेखनीय प्रभाव नहीं पड़ेगा। पूरे व्यापार के संदर्भ में अगर इस व्यवस्था से फायदे की बात करें तो वह बहुत कम है लेकिन विशेषज्ञ इस बात से सहमत नहीं हैं। 

अमेरिकी कांग्रेस की जनवरी में प्रकाशित एक रपट के मुताबिक वर्ष 2017 में भारत इस कार्यक्रम का सबसे बड़ा लाभार्थी रहा था। उसने इस साल अमेरिका को बिना किसी शुल्क के 5.7 अरब डॉलर के सामान का निर्यात किया वहीं तुर्की 1.7 अरब डॉलर के निर्यात के साथ इस मामले में पांचवें स्थान पर रहा था। जानकारों का कहना है कि जीएसपी से निकलने से भारत को नुक्सान होगा और पहले से ही कम हो रहा भारत का निर्यात और कम हो सकता है। यदि अमेरिका अपनी ही हठधर्मिता पर अड़ा रहा तो उसके बुरे प्रभाव देखने को मिल सकते हैं। अमेरिका के इशारे पर नहीं चलने के कारण वह तुर्की और ईरान को तबाह कर देना चाहता है। 

वेनेजुएला की अर्थव्यवस्था को उसने बर्बाद कर दिया है। ताकत का होना और दिखाई देना दोनों अलग-अलग भाव हैं। दुनिया की कूटनीतिक और सामरिक स्थिति में अमेरिका ऐसा देश है, जो अपनी ताकत दिखाता ही रहता है। अमेरिका को इस बात का अहसास नहीं है कि भारत एक लोकतांत्रिक देश है। यहां राष्ट्र की भावनाओं की अनदेखी नहीं की जा सकती। जनता सर्वोपरि है। मानवता, मानवाधिकार, लोकतंत्र के आवरण में अमेरिका विश्व के किसी भी कोने में टांग अड़ाता है, फिर वहां अपनी कठपुतली सरकारें बनवाता है। 

पूर्व में हम इराक और अफगानिस्तान का विध्वंस देख चुके हैं। वहां आज तक शांति स्थापित नहीं हो सकी है। मुझे तो भारत-अमेरिका सम्बन्ध बालू की भीत के समान ही नजर आ रहे हैं। अगर हम आंख मूंदकर अमेरिका के सुर में सुर मिलाते रहे तो हमारे सम्बन्ध मित्र देशों से बिगड़ सकते हैं। रूस हमारा विश्वसनीय परखा हुआ मित्र है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सरकार-2 को अमेरिका को इस बात का अहसास कराना होगा कि अगर वह भारत का मित्र है तो दबंगई से बाज आए। नए विदेश मंत्री एस. जयशंकर के सामने चुनौतियां कम नहीं।