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संपादकीय

मतगणना से पहले मतों पर संशय !

भारत के लोगों ने लोकतन्त्र प्राप्त करने के लिए अपनी पुरानी पीढि़यों का बलिदान देकर खुद सिंहासन पर बैठने का जो अधिकार प्राप्त किया है उससे दुनिया की कोई भी ताकत इसलिए छेड़छाड़ नहीं कर सकती क्योंकि इसे पाने का तरीका ‘संविधान’ लिखकर उस आदमी ने सुझाया जिसे समाज कभी ‘अस्पृश्य’ समझता था मगर उस आदमी ने भारत के उसी समाज को निडर और निर्भय बनाने के लिए अहिंसक हथियार ‘एक वोट’ से लैस करके आह्वान किया कि जाओ और इसका इस्तेमाल करके खुद उस ‘सिंहासन’ पर जा बैठो जहां कभी ‘अंग्रेज लाट साहब’ बैठा करते थे।

उस आदमी का नाम ‘डा. भीमराव अम्बेडकर’ था और उसके सिर पर ‘राष्ट्रपिता महात्मा गांधी’ का हाथ था.. अतः इस एक वोट की ताकत को हर तरफ से महफूज रखने के लिए संविधान में ‘चुनाव आयोग’ का गठन करके ये हक दिये गये कि सरकार चाहे जिस राजनैतिक दल की हो मगर उसकी जवाबदेही सिर्फ संविधान के प्रति रहेगी और उसका रुतबा खुद मुख्तारी के हकों से नवाजा जायेगा। अतः आज देश के 22 विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग को ज्ञापन देकर जो मांग की है उस पर अमल करने में किसी भी तरह की कोई दिक्कत इसलिए नहीं हो सकती क्योंकि मौजूदा नियमों के तहत ही बने कायदे को पूरी ईमानदारी से लागू करने की दरख्वास्त भर की गई है। बात सिर्फ इतनी सी है कि ये 22 दल चाहते हैं कि एक विधानसभा क्षेत्र में पांच ईवीएम मशीनों से निकले वोटों का मिलान वीवीपैट मशीनों से निकली रसीदी पर्चियों से मतगणना के शुरू में ही किया जाये।

इनमें अगर कोई गड़बड़ी अर्थात मिलान नहीं होता है तो पूरे विधानसभा क्षेत्र में पड़े मतों की गिनती बजाय ईवीएम के वीवीपैट से निकली रसीदों को गिनकर की जाये। इन रसीदों पर चुनाव में खड़े प्रत्याशी की फोटो और उसकी पार्टी का निशान होता है। इसमें परेशानी क्या है? और इस पर सत्ताधारी पार्टी भाजपा को एतराज क्यों हो सकता है? भाजपा यह कैसे मान कर चल सकती है कि ईवीएम मशीन और वीवपैट से निकले वोटों का मिलान न होने के बावजूद मतदाताओं द्वारा डाले गये वोट उसी प्रत्याशी को गये हैं जिसके निशान के आगे मतदान के दिन मतदाता ने बटन दबाया था। जब पांच मशीनों की गिनती में ही गड़बड़ी निकल गई तो फिर बाकी मशीनों की गारंटी चुनाव आयोग कैसे दे सकता है? क्या आदमी के शरीर के खून की जांच के लिए उसके बदन का सारा खून निचोड़ा जाता है? खून की कुछ बून्दों की जांच करके ही पता लगा लिया जाता है कि खून में क्या-क्या खराबियां हैं।

ईवीएम तो टैक्नोलोजी है जिसे दूसरी मशीन के साथ इसीलिए जोड़ा गया था जिससे वोटर को यह यकीन हो जाये कि उसका वोट उसी पार्टी को गया है जिसके निशान के आगे उसने बटन दबाया है। अगर इसमें ही खराबी मिलती है तो फिर उसके द्वारा डाले गये वोट की क्या कीमत रह जायेगी? जबकि चुनाव आयोग की यह बुनियादी जिम्मेदारी है कि वह हर आदमी के वोट की पवित्रता को कायम रखते हुए आखिरी वोट तक को गिने और उसके आधार पर ही चुनाव नतीजे निकाले। विपक्ष चुनाव आयोग से मतगणना शुरू होने से पहले नियम बदलने के लिए नहीं कह रहा है बल्कि सर्वोच्च न्यायालय के उस फैसले को पूरी शुद्धता से लागू करने के लिए कह रहा है जो उसने वीवीपैट के बारे में दिया था कि प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में कम से कम पांच मतदान केन्द्रों की पांच ईवीएम व वीवीपैट मशीनों का मिलान मतगणना के दौरान किया जाये।

बकौल कांग्रेस पार्टी के नेता अभिषेक मनु सिंघवी के चुनाव आयोग ने नौ हजार करोड़ रुपये खर्च करके सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर ही वीवपैट मशीनें खरीदी हैं। इन मशीनों को ईवीएम मशीनों के साथ सजाने के लिए तो नहीं खरीदा गया है जबकि इनमें ही अपना वोट डालने की रसीद को देखकर मतदाता को तसल्ली होती है अतः प्राकृतिक न्याय कहता है कि गिनती इन मशीनों की रसीदों की ही होनी चाहिए मगर इस विवाद के चलते ही उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा आदि राज्यों से मतगणना के लिए रखी गई ईवीएम मशीनों को स्ट्रांग रूम से बाहर और अन्दर ले जाने की जो खबरें वीडियो बनकर घूम रही हैं उससे एक नई चिन्ता पैदा हो गई है कि मशीनों को ही बदलने की कोशिशें हो रही हैं और इसी बीच जब यह खबर आती है कि उत्तर प्रदेश के मुख्य चुनाव अधिकारी ने मतगणना केन्द्रों के प्रत्येक खंड में राजनैतिक दलों के दो-दो प्रतिनिधियों के मौजूद रहने की शर्त हटा दी है तो चिन्ता और भी बढ़ जाती है क्योंकि सूचना के अधिकार के तहत यह जानकारी भी बाहर आ चुकी है कि 20 लाख के लगभग ईवीएम मशीनें इन्हें बनाने वाली कम्पनी ने तो रवाना कर दी मगर ये चुनाव आयोग के पास पहुंची ही नहीं।

अतः मतगणना से पहले जिस तरह का माहौल बन रहा है वह सम्पूर्ण चुनाव प्रणाली की विश्वसनीयता को धक्का पहुंचा रहा है। चुनाव आयोग का कार्य सिर्फ चुनाव सफलतापूर्वक सम्पन्न कराना ही नहीं है बल्कि समूची प्रक्रिया की विश्वसनीयता को किसी भी सन्देह से ऊपर रखना भी है। इस बारे में पूर्व राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी से बेहतर कौन समझ सकता है जिन्हें कहना पड़ा है कि लोकतन्त्र में इसके मालिक मतदाता के मन में चुनाव प्रणाली के बारे में जरा भी संशय पैदा नहीं होना चाहिए। अतः चुनाव आयोग को सभी संशयों का तुरन्त निवारण करना चाहिए। श्री मुखर्जी स्वयं संविधान के संरक्षक रहे हैं और जानते हैं कि चुनावों की पवित्रता का मुद्दा किसी भी प्रकार की राजनीति से ऊपर होता है लेकिन एक आश्चर्यजनक तथ्य यह उभर कर सामने आया है कि ईवीएम मशीनों के चलते चुनावों में गड़बड़ी करना ज्यादा आसान काम है क्योंकि जो चार प्रकार की ईवीएम मशीनें (उपयोग में लाई गई, उपयोग में लाई गई खराब मशीनें, पूरी तरह खराब मशीनें और आरक्षित मशीनें) होती हैं उनके रखरखाव में सुनिश्चित निर्देशों का पालन व्यावहारिक कठिनाइयों के चलते लापरवाही में पड़ जाता है।

जबकि प्रत्येक प्रकार की मशीनों के लिए सुरक्षा के पक्के निर्देश होते हैं। जबकि बैलेट बाक्स वाली प्रणाली में मतगणना केन्द्र में घालमेल होने की संभावना नगण्य थी। कुल बैलेट बक्सों की गिनती करके राजनैतिक प्रतिनिधियों के दस्तखत करा कर उन्हें स्ट्रांग रूम में पहुंचा दिया जाता था और फिर मतों की गिनती वाले दिन इसी तरह उनकी सील तोड़ कर गिनती कर ली जाती थी। उसमें सब सन्तुष्ट रहते थे चुनाव अधिकारी भी, प्रत्याशी भी और मतदाता भी। सबसे ज्यादा मतदाता को सन्तोष रहता था कि उसका वोट कानूनी तौर पर गिनती होने के वक्त तक अपरिवर्तनीय बना रहेगा। नई प्रणाली में इसी सन्तोष में कमी आ गई है। इसे पूरा करना चुनाव आयोग का ही काम है, जो इसके खिलाफ बोलता है तो अपनी दाढ़ी में ही तिनका ढूंढता है !