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कश्मीर लौटने का सपना!

जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 समाप्त होने के बाद से ही राज्य के विस्थापित हिन्दू- सिखों व पंडितों को पुनः अपने पूर्वजों के स्थान पर बसाने की चर्चा तेजी से होती रही है। इससे पहले भी विस्थापित पंडित परिवारों के साथ हुए जुल्म के बाद उन्हें अपनी मतृभूमि में वापस भेजने पर खासी राजनीति भी होती रही है। पूरी दुनिया जानती है कि 1980 के बाद से ही राज्य की कश्मीर घाटी में आतंकवाद ने पैर पसारने शुरू किये थे और इसके पीछे पड़ोसी पाकिस्तान का ही हाथ था मगर 1989 के बाद से घाटी में जिस तरह आतंकवाद ने साम्प्रदायिक रूप लेकर हिन्दू पंडितों व सिखों को अपनी जन्मभूमि छोड़ने के लिए मजबूर किया और अपने ही देश में विस्थापितों जैसा जीवन जीने को मजबूर किया उसने ‘अमानवीयता’ की सीमाओं तक को लांघ कर इन नागरिकों को लवारिस बना कर छोड़ दिया। 

मगर 5 अगस्त, 2019 को राज्य की स्थिति में अन्तर आने और इसके लद्दाख के साथ दो भागों में बंट जाने पर यह उम्मीद जागी थी कि सरकार विस्थापित पंडितों के अपने घर पुनःवापस लौटने के लिए प्रेरित करेगी और वास्तव में ऐसा हो भी रहा है परन्तु विरोधाभास यह है कि कश्मीरी पंडितों में अब पुनः अपने मूल घर जाने का उत्साह ठंडा पड़ता जा रहा है। इसका एक कारण यह हो सकता है कि बरसों से देश के दूसरे हिस्सों में बसे पंडितों ने अब पुनर्वासित शहरों या इलाकों को ही अपना भाग्य मान लिया है। दूसरा कारण यह हो सकता है कि उन्हें कश्मीर जाने से अब भी भय लगता हो। जहां तक भय का सवाल है तो जम्मू-कश्मीर अब केन्द्र शासित क्षेत्र है और वह सीधे केन्द्र सरकार के नियन्त्रण में है अतः भय या खौफ के कोई विशेष मायने नहीं हैं। 

राज्य के राहत व पुनर्वास कमिश्नर कार्यालय ने विगत 16 मई, 2020 से सभी विस्थापित कश्मीरियों के लिए स्थायी निवास प्रणाणपत्र लेने की स्कीम जारी की थी जो आगे एक वर्ष तक चलनी थी परन्तु मई 2021 तक इसमें पंडितों समेत विस्थापित कश्मीरियों ने पंजीकरण कराने में रुचि नहीं दिखाई। अब इस स्कीम को 15 मई, 2022 तक बढ़ा दिया गया है और चेतावनी दी गई है कि इसके बाद इस योजना को और आगे नहीं बढ़ाया जायेगा। इसके बावजूद पंजीकण कराने कश्मीरी आगे नहीं आ रहे हैं। कमिश्नर कार्यालय ने लोगों में रुचि जागृत करने के लिए ऐसे शहरों व स्थानों में अपने पंजीकरण शिविर तक लगाये जहां विस्थापित पंडित या अल्पसंख्यक कश्मीरी अधिक संख्या में रहते हैं, इसके बावजूद जोश देखने को नहीं मिला। ऐसा ही एक शिविर कुछ दिनों पहले राजधानी  दिल्ली में भी लगाया गया था। दिल्ली में विस्थापित कश्मीरी पंडितों के 25 हजार परिवार रहने का अनुमान लगाया जाता है जिनमें से बहुत कम ही पंजीकृत हैं।

 मगर सवाल उन कश्मीरी नागरिकों का भी है जो 1947 के बाद पाक अधिकृत कश्मीर छोड़ कर भारत आ गये थे। इनमें भी अधिसंख्य हिन्दू व सिख हैं जिनमें पंडित भी शामिल हैं। ऐसे परिवारों की अकेली संख्या 45 हजार तक आंकी जाती है। इनके नाम विस्थापितों के रूप में कमिश्नर कार्यालय में दर्ज नहीं हैं जबकि 1980 के बाद के विस्थापित नागरिकों के नाम दर्ज हैं। मगर ये नागरिक भी राज्य के मूल निवासी का प्रमाणपत्र लेने के लिए उत्सुक नहीं हैं। यह प्रमाणपत्र इसलिए उपयोगी मना जाता है जिससे जम्मू-कश्मीर में एेसे नागरिकों को जमीन खरीदने से लेकर नौकरी पाने व शिक्षण संस्थाओं में प्रवेश तक में सुविधा हो सके। 1947 के बाद पाक अधिकृत इलाके से आये कश्मीरी नागरिकों को ढूंढना अब काफी मुश्किल काम है क्योंकि ये देश के विभिन्न हिस्सों में बस चुके हैं। इनमें से अधिसंख्य के नाम प्रादेशिक पुनर्वास कार्यालय में दर्ज हैं जिनमें से आधे से ज्यादा के नाम राज्य के स्थायी निवासी के तौर पर भी दर्ज हैं। मगर ये निवासी प्रमाणपत्र लेने के लिए उत्सुक नहीं हैं। इनमें से कई हजार ऐसे भी परिवार हैं जो 1947 से 1954 के बीच सीमा पार से भारत नहीं आये और यदि आये भी तो उन राहत शिविरों में नहीं ठहरे जो तत्कालीन सरकार ने ऐसे नागरिकों के लिए स्थापित किये थे।  मगर हकीकत यह है कि पाक अधिकृत कश्मीर की एक तिहाई से थोड़ा कम आबादी ही बंटवारे के बाद भारत में आ गई थी। जबकि पाक अधिकृत कश्मीर के लोगों के लिए जम्मू-कश्मीर विधानसभा में 24 सीटें खाली रखी गई हैं ।  कश्मीर में इस समय चुनाव क्षेत्र परिसीमन का काम चल रहा है और विस्थापित कश्मीरियों के मूल आवास को देखते हुए उनके नाम मतदाता सूचि में जोड़े जा सकते हैं। सवाल यह है कि जम्मू-कश्मीरी के मूल नागरिकों को उनका जन्मसिद्ध अधिकार क्यों न दिया जाये जिससे वे अपने राज्य के निवासी होने का गौरव प्राप्त कर सकें और विस्थापितों के तग्मे को तिलांजिली दे सकें।