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संपादकीय

अर्थव्यवस्था एक पहेली?

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भारत की अर्थव्यवस्था की तस्वीर काे लेकर समय-समय पर मंथन चलता रहता है। इस संबंध में अलग-अलग राय सामने आती है। इसकी असली वजह यह है कि विदेशी निवेश की ललक में हम अपनी उस ताकत को पहचानने में लगातार गफलत करते आ रहे हैं जिसने आजादी के बाद विभिन्न क्षेत्रों में हमें आत्मनिर्भर बनाया। हमें 1990 तक बेशक साढे तीन प्रतिशत की विकास वृद्धि की दर से ही प्रगति की मगर हमने अपनी बढ़ती आबादी के बोझ के समानान्तर 33 प्रतिशत से अधिक लोगों को गरीबी की सीमा रेखा से उभार कर उस मध्यम वर्ग का निर्माण किया जिसकी उपभोक्ता ताकत को पहचानने में दुनिया ने देरी नहीं की। इसमें कृषि क्षेत्र आजादी के बाद सबसे बड़ी चुनौती था क्योंकि आजाद होने पर जहां भारत की जनसंख्या का 90 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा कृषि पर निर्भर करता था वहीं इसकी पैदावार इतनी नहीं थी कि वह तब की 33 करोड़ आबादी का भी पेट भर सके।

आजाद भारत की पहली सरकार के सामने यही सबसे बड़ी चुनौती थी जिसे पं. जवाहर लाल नेहरू से लेकर इंदिरा गांधी की दूरदर्शिता से भरी आर्थिक नीतियों के सहारे हमने आत्मनिर्भरता का लक्ष्य प्राप्त करने में सफलता प्राप्त की परन्तु 1991 से भारत की अर्थव्यवस्था का पैमाना जिस तरह बदला उसमें विदेशी एेसा ‘देशी राग’ बनकर उभरा जिसके बिना भारत के लोगों का विकास असंभव था।

इस धारा की नई अर्थव्यवस्था ने सबसे बड़ा हमला हमारे स्वास्थ्य व शिक्षा क्षेत्र पर किया और इन दोनों ही क्षेत्रों को व्यापार व मुनाफे का शानदार जरिया बना दिया। एक तरफ हमने उपभोक्ता क्षेत्र में क्रान्ति कर डाली और मध्यम व उच्च वर्ग के लोगों को दुनिया भर के नये उत्पादों से नवाज डाला मगर दूसरी तरफ निम्न व गरीब वर्ग के लोगों को अच्छी स्वास्थ्य व गुणवत्तापरक शिक्षा प्रणाली से ही महरूम कर डाला। अतः राष्ट्रसंघ के अध्ययन में जो तथ्य निकल कर आया है कि 1990 से 2017 तक भारत में सामान्य विकास की दर तो बढ़ी है मगर आर्थिक असमानता का दायरा भी बहुत ज्यादा बढ़ा है, इसी हकीकत को दर्शाता है। इसका मतलब सीधे तौर पर यही होता है कि नई अर्थव्यवस्था की धारा से उन्हीं लोगों को लाभ पहुंचा है जो बाजार की गतिविधियों में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से शामिल हैं। इस दायरे में आने वाले लोग गरीबी की सीमा रेखा से बेशक ऊपर उठ गये हैं मगर जो लोग इस दायरे से बाहर छूट गये हैं उनकी स्थिति बदतर होती जा रही है।

बिना शक एेसी जनसंख्या को हम उस लावारिस लोगों की श्रेणी में रख सकते हैं जिन्हें न सरकार से कुछ मिल पाता है और न ही बाजार मूल्क अर्थव्यवस्था का विकास उन्हें अपना हिस्सा अपना बना पाता है। दिकक्त यह पैदा हो रही है कि एेसी आबादी के लिए हम जो भी जनकल्याण की योजनाएं चलाते हैं उनमें भी निजी क्षेत्र की भूमिका को अहम किरदार निभाने के लिए दे देते हैं जिससे एेसी स्कीमें भी बाजार के फन्दे में फंस जाती हैं। कृषि बीमा योजना का मजाक जिस तरह बीमा कम्पनियों ने बनाया है उसका भी दूसरा उदाहरण देखने को शायद ही मिले।

महाराष्ट्र जैसे राज्य में किसानों की फसल खराब होने पर बीमा मुआवजा राशियां दो से दस रु. तक के चेकों के रूप में किसानों को भेंट की गईं। अतः इससे समझा जा सकता है कि हम जिस अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर बढ़ने का लोभ पाले बैठे हैं उसका जमीनी स्वरूप क्या हो सकता है। इसी के समानान्तर जब शेयर बाजार नई ऊंचाइयां पार करता हुआ तेज भागता है तो उसका असर अर्थव्यवस्था पर किस रूप में पड़ता है। इस बाजार का सूचकांक विभिन्न कम्पनियों के मुनाफा कमाने व व्यापार बढ़ने की संभावनाओं पर तकनीकी रूप से टिका होता है। इसमें विदेशी निवेश भी जमकर होता है जो अधिक से अधिक मुनाफा कमाने की गरज से होता है। यह निवेश कभी भी स्थायी या दीर्घकालिक नहीं होता। दीर्घकालिक विदेशी निवेश भारत में स्थायी परियोजनाओं के वित्तीय पोषण के माध्यम से ही होता है मगर हम देख रहे हैं कि पिछले कुछ सालों से भारत का चालू खाता घाटा सकल घरेलू उत्पाद की अपेक्षा दो प्रतिशत से भी कम चल रहा है।

इसके बावजूद भारतीय मुद्रा रुपये का डालर के मुकाबले अवमूल्यन जारी है और अब यह प्रति डालर 72 रुपए के आसपास हो चुका है। इसका क्या मतलब निकाला जा सकता है? इसका मतलब साफ दिखाई पड़ रहा है कि भारत सरकार की चिन्ता बढ़ रही है। अर्थात सरकार समझती है कि डालर की कीमत बढ़ने से भारत की आर्थिक स्थिति कमजोर आंकी जा सकती है जबकि घरेलू बाजार में थोक मूल्य सूचकांक ठहरा हुआ सा है परन्तु इस बात का गंभीर मतलब है कि भारत में विदेशी मुद्रा कोष घटने की तरफ बढ़ रहा है।

पिछले साल यह 426 अरब डालर को पार कर गया था, अब यह 399 अरब डालर के पास रह गया है। क्या इससे रुपये की कीमत पर असर पड़ रहा है? परन्तु एेसा भी नहीं है जब विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ रहा था तो रुपये की कीमत मजबूत नहीं हो रही थी। क्या अर्थव्यवस्था एक पहेली बनती जा रही है? एेसा भी नहीं है क्योंकि घरेलू छोटे उद्योग धन्धे सुस्त चल रहे हैं और विदेशी कम्पनियों व बड़ी देशी कम्पनियों का कारोबार कुलांचे मार रहा है। क्या इससे किसी नतीजे पर पहुंचा जा सकता है?