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पांच राज्यों में चुनावी शंखनाद

चुनाव आयोग ने पांच राज्यों उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा, पंजाब व मणिपुर के चुनाव कार्यक्रम को घोषित करके इन सभी प्रदेशों में आदर्श आचार संहिता को लागू कर दिया है। इन राज्यों में मतदान 10 फरवरी से शुरू होकर 7 मार्च तक सात चरणों में पूरा होगा और परिणाम 10 मार्च को घोषित किये जायेंगे परन्तु ये चुनाव कोरोना संक्रमण की तीसरी लहर के शुरू होने के समय घोषित हुए हैं अतः चुनाव आयोग ने इससे मुकाबला करने के उपायों को लागू करने की घोषणा भी की है और साथ ही चुनावों को अधिकाधिक पारदर्शी व मतदाता मूलक बनाने का प्रयास भी किया है। आयोग ने चुनाव कार्यक्रम घोषित करते ही किसी भी राजनीतिक पार्टी द्वारा रैलियां अथवा पदयात्राएं आयोजित करने पर प्रतिबन्ध लगा दिया है और डिजिटल माध्यमों ( इंटरनेट जैसे मोबाइल फोन आदि) से चुनाव प्रचार करने पर जोर दिया है। आयोग में चुनावों में बाहुबलियों अथवा अपराधी छवि के लोगों को चुनाव लड़ने से हतोत्साहित करने की गरज से ही यह नियम बनाया है कि प्रत्येक प्रत्याशी को अपने आपराधिक रिकार्ड के बारे में कम से कम तीन बार अखबार या टीवी चैनलों के माध्यम से मतदाताओं को जानकारी देनी होगी । इस मोर्चे पर आयोग ने एक और महत्वपूर्ण बदलाव किया है और समूचे राजनीतिक तन्त्र को पाक-साफ करने का प्रयास भी किया है। 

आयोग ने फैसला किया है कि आपराधिक छवि के प्रत्याशियों का चयन करने के बारे में सम्बन्धित राजनीतिक दल को भी ऐसे लोगों के बारे में आम जनता को बताना होगा और यह स्पष्टीकरण भी देना होगा। उन्होंने ऐसी छवि के लोगों का चुनाव किस वजह से किया। वजह में यह नहीं बताया जा सकता कि दागी छवि के प्रत्याशी के विजयी होने की संभावना सर्वाधिक है। एक प्रकार से चुनाव आयोग ने यह नियम बना कर राजनीतिक जगत को नैतिकता के घेरे में लेने का प्रयास किया है। इसकी जितनी ज्यादा तारीफ की जाये कम है क्योंकि चुनावी प्रतियोगिता में राजनीतिक दल ही लोकतन्त्र को प्रदूषित करने के मुख्य जिम्मेदार होते हैं। इसके साथ ही आयोग ने 80 वर्ष से अधिक उम्र के मतादाताओं का वोट उनके निवास पर जाकर डलवाने की व्यवस्था भी की है और दिव्यांग लोगों के लिए मतदान केन्द्र पर विशेष व्यवस्था करने के साथ ही उनका वोट भी उनके निवास पर ही डलवाने के इन्तजाम किये हैं। जिन पांच राज्यों में चुनाव हो रहे हैं वहां सभी में मतदान केन्द्रों की संख्या इस तरह बढ़ाई गयी है ताकि एक केन्द्र पर अधिकाधिक एक हजार से अधिक मतदाता न पहुंचे। महिलाओं के लिए प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में महिलाओं द्वारा ही संचालित पृथक मतदान केन्द्रों की शुरूआत करके आयोग स्त्री मतदाताओं को अधिकाधिक मतदान करने के लिए प्रेरित करना चाहता है ।

 कोविड संक्रमण को देखते हुए मतदान का समय भी बढ़ाया जा सकता है। ये सब कदम निश्चित रूप से मतदाताओं को सशक्त बनाने के ही कहे जायेंगे जिससे हमारा लोकतन्त्र और अधिक शक्तिशाली होगा। चूंकि भारत के संविधान में चुनाव आयोग हमारी लोकतान्त्रिक व्यवस्था का चौथा ऐसा मजबूत पाया है जो समूचे तन्त्र की आधारशिला तैयार करता है और सुनिश्चित करता है कि केवल जनता की इच्छा ही सर्वोपरि हो अतः इसकी जिम्मेदारी भी बहुत बड़ी है परन्तु एक सवाल उठना वाजिब है कि कोरोना संक्रमण की लहर को देखते हुए क्या अभी से ही रैलियों, जनसभाओं व पदयात्राओं आदि पर प्रतिबन्ध लगा कर राजनीतिक दलों को उपलब्ध सूचना टैक्नोलोजी से ज्यादा से ज्यादा जोड़ने के उपाय नहीं किये जाने चाहिए थे?  सियासी पार्टियां जिस तरह के पारंपरिक चुनाव प्रचार की आदी हो चुकी हैं उसमें इतना खर्चा आता है जो आम आदमी की समझ से परे है। जबकि हमारी चुनाव प्रणाली में धन का बढ़ता प्रभाव एक गंभीर समस्या बन चुकी है और इसकी वजह से नई चुनावों की नई कारोबारी राजनीतिक संस्कृति पनप रही है। आयोग ने सोशल मीडिया को गलत चुनावी प्रचार करने से रोकने के लिए भी बहुत सख्त नियम बनाये हैं परन्तु इनका कार्यान्वयन निश्चित रूप से किसी चुनौती से कम नहीं है क्योंकि पूर्व के चुनावों में हमने इन नियमों का खुला उल्लंघन होते हुए देखा है। चुनाव आयोग ने पांचों राज्यों का जो मतदान कार्यक्रम बनाया है उसके अनुसार उत्तर प्रदेश में सात चरणों में चुनाव होंगे और मणिपुर की भौगोलिक स्थिति को देखते हुए दो चरणों में चुनाव कराये जायेंगे जबकि पंजाब, गोवा व उत्तरखंड में एक-एक चरण में ही चुनाव होंगे। 

उत्तर प्रदेश की विशालता को देखते हुए इस राज्य में 10 फरवरी से लेकर 7 मार्च तक की अवधि के बीच बटे सातों चरणों में ही मतदान होगा । यह फैसला तर्कपूर्ण लगता है क्योंकि इस राज्य में कुल 403 विधानसभा क्षेत्र हैं। चुनाव आयोग का यह फैसला भी स्वागत योग्य है कि किसी निजी मकान या दुकान की मालिक की मर्जी से उसके भवन पर राजनीतिक दल अपने झंडे लहरा सकते हैं। वास्तव में चुनाव लोकतन्त्र का पर्व होता है और इसमें मतदाताओं की अधिकाधिक शिरकत होनी चाहिए परन्तु पिछले 25 सालों से कुछ ऐसे नियम बने जिनकी वजह से मतदाताओं की इस जश्न में भागीदारी को हाशिये पर धकेला गया। वर्तमान मुख्य चुनाव आयुक्त का यह फैसला मनोवैज्ञानिक तौर पर मतदाताओं में राजनीतिक शिक्षा को बढ़ावा देने में भी सहायक होगा। 

आदित्य नारायण चोपड़ा

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