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गुलाम कश्मीर में चुनाव

पाकिस्तान के कब्जे में पड़े गुलाम कश्मीर की हालत यह है कि यहां के सभी मसलों के आखिरी हल के लिए पाकिस्तान की फौज ही बाअख्तियार है, इसके बावजूद पाकिस्तान इसे ‘आजाद कश्मीर’ कहता है और यहां की एक विधानसभा के लिए हर पांच साल बाद चुनाव करा कर इस इलाके का राष्ट्रपति और प्रधानमन्त्री मुकर्रर करता है। कुल 20 लाख वोटरों वाले इस इलाके की विधानसभा के 53 सदस्य होते हैं। मगर हकीकत यह भी है कि पाकिस्तान में 14 सदस्यीय एक कश्मीर परिषद होती है जिसके सभी सदस्य नामांकित होते हैं। यह परिषद पाकिस्तान की केन्द्रीय सरकार गठित करती है जिसका नेतृत्व इस देश का प्रधानमन्त्री करता है। यही परिषद गुलाम कश्मीर के सभी कामकाज को  चलाती है। इसके छह सदस्य पाकिस्तान सरकार मनोनीत करती है जबकि  आठ सदस्य गुलाम कश्मीर की विधानसभा से आते हैं जिनमें इस इलाके का प्रधानमन्त्री भी शामिल होता है। इसी गुलाम कश्मीर की कथित विधानसभा के चुनाव आज रविवार को हो रहे हैं जिसका फैसला भी देर रात तक सुना दिया जायेगा। मगर चुनाव होने से पहले ही पाकिस्तान के गृहमन्त्री शेख रशीद ने आज लाहौर में एक प्रेस कान्फ्रेंस में घोषणा कर दी कि चाहे कुछ भी हो जाये और बेशक एक सीट से ही जीत हो मगर ‘आजाद कश्मीर’  में उन्हीं की पार्टी ‘पाकिस्तान तहरीके इंसाफ’ की सरकार बनेगी। इससे अन्दाजा लगाया जा सकता है कि गुलाम कश्मीर में किस तरह के चुनाव होने जा रहे हैं। 

एक मजेदार बात और इन चुनावों के बारे में हैं कि 53 में केवल 45 सीटों पर ही प्रत्यक्ष चुनाव होंगे और इनमें से भी गुलाम कश्मीर से केवल 33 सीटें ही होंगी जबकि 12 सीटें पाकिस्तान के अन्य राज्यों पंजाब, सिन्ध, बलोचिस्तान व खैबर पख्तूनवा में रहने वाले शरणार्थी मतदाताओं के लिए होंगी जिनमें विदेशों में बसे कश्मीरियों की एक सीट भी शामिल है। हकीकत यह है कि 5 अगस्त, 2019 से पहले भारत की जम्मू-कश्मीर विधानसभा में 24 सीटें गुलाम कश्मीर के लोगों के लिए खाली पड़ी रहती थी। इसकी वजह यह थी कि भारत ने पाकिस्तान के कब्जे में पड़े कश्मीर को हमेशा अवैध कार्रवाई माना और इस इलाके पर कभी अपना हक नहीं छोड़ा।  मगर गुलाम कश्मीर में हो रहे चुनावों में पाकिस्तान की तीन प्रमुख पार्टियां मुस्लिम लीग, पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी व सत्ताधारी तहरीके इंसाफ भाग ले रही हैं और एक-दूसरे पर कश्मीर के मुद्दे को लेकर ही आरोप प्रत्यारोप लगा रही हैं। इसमें सबसे रोचक तथ्य यह है कि पूर्व प्रधानमन्त्री नवाज शरीफ की पार्टी मुस्लिम लीग की तरफ से सत्ताधारी तहरीके इंसाफ पार्टी पर आरोप लगाया जा रहा है कि इसकी सरकार के मुखिया इमरान खां ने भारत के साथ कश्मीर का सौदा कर लिया है जिसकी वजह से भारत की सरकार ने विगत 5 अगस्त, 2019 को जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को हटा दिया। यह आरोप नवाज शरीफ की सुपुत्री और मुस्लिम लीग की नेता मरियम नवाज ने इस इलाके में चुनाव प्रचार के दौरान बहुत ऊंची- ऊंची आवाज में लगाया। जबकि तहरीके इंसाफ पार्टी की तरफ से नवाज शरीफ की पार्टी पर यह आरोप लगाया गया कि उसके रहनुमा (नवाज शरीफ) ने भारत के प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी के साथ दोस्ती करने के चक्कर में कथित कश्मीरी हितों को नुकसान पहुंचाया। इसके साथ ही पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के सरपरस्त बिलावल भुट्टो ने एक कदम और आगे बढ़ कर इमरान खान और नवाज शरीफ दोनों पर ही मुल्क के साथ गद्दारी करने का आरोप तक लगा दिया। इस तरह यह कहा जा सकता है कि पाकिस्तान की तकरीबन हर सियासी पार्टी कश्मीर मामले पर एेसा तास्सुबी रुख अख्तियार करे रहती है जिससे पाकिस्तान के लोगों को यह लगे कि पाकिस्तान कश्मीर की आजादी के लिए लड़ रहा है जबकि हकीकत इसके बिल्कुल उलट है और वह यह है कि पाकिस्तान ने अपने संविधान में ही कश्मीर को पाकिस्तान का हिस्सा बनाने का इन्तजाम इस तरह कर रखा है कि यदि कथित आजाद कश्मीर विधानसभा का सदस्य भी यह कहता है कि वह कश्मीर के पाकिस्तान में मिलाये जाने के फलसफे की मुखालफत करता है तो वह विधानसभा की सदस्यता से बर्खास्त कर दिया जायेगा।

 इसी वजह से गुलाम कश्मीर के चुनावों में खड़े होने वाले हर प्रत्याशी को हलफनामे पर हस्ताक्षर करने होते हैं कि वह जम्मू-कश्मीर को पाकिस्तान में मिलाये जाने का विरोध नहीं करेगा। इसलिए पाकिस्तान का फरेब पूरी तरह दुनिया के सामने है कि वह किस तरह गुलाम कश्मीर की अवाम का बेवकूफ बना रहा है। यही वजह रही कि पाकिस्तान ने गुलाम कश्मीर को दहशत गर्दी की सैरगाह बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी और यहां आतंकवादी शिविरों की कतारें लगा दीं जिससे भारत में आतंकवाद को बढ़ाया जा सके। बराये नाम कराये जा रहे इन चुनावों का कोई मतलब नहीं है क्योंकि अन्त में पाकिस्तानी फौज और वहां की केन्द्रीय सरकार ही यहां की कथित राज्य सरकार को अपनी अंगुली पर न केवल नचाती है बल्कि उस पर हुक्म चलाती है। यही वजह है कि पाकिस्तान में जिस पार्टी की केन्द्रीय सरकार होती है उसी की जीत गुलाम कश्मीर में भी होती है। पाकिस्तान हर पांच साल बाद यह ढकोसला सिर्फ अन्तर्राष्ट्रीय ​बिरादरी का मूर्ख बनाने की गरज से करता रहा है और दिखाने की कोशिश करता है कि 1949 का राष्ट्रसंघ का प्रस्ताव अभी भी जिन्दा है जबकि 1972 के शिमला समझौते में स्व. इंदिरा गांधी ने इसे कब्र में गाड़ दिया था और पाकिस्तान के तत्कालीन हुकमरान जुल्फिकार अली भुट्टो से एेलान करवा दिया था कि कश्मीर का मसला हिन्दोस्तान व पाकिस्तान के बीच दो मुल्कों का मसला है जिसे सिर्फ बातचीत से ही सुलझाया जायेगा। यह भारत द्वारा पाकिस्तान के मुंह पर मारा गया एेसा तमाचा था जिसकी आवाज कराची की उस जनसभा में पहुंची थी जिसे शिमला से स्वदेश लौटने पर जुल्फिकार अली भुट्टो ने सम्बोधित किया था और स्वीकार किया था कि मैं मानता हूं कि हमारी जबर्दस्त शिकस्त हुई है मगर भुट्टो सियासत दां थे। अतः उन्होंने इस शिकस्त को भारत से शिकस्त न कह कर हिन्दुओं से शिकस्त का नाम दिया था और कहा था कि पिछले एक हजार साल में यह हमारी कौम की सबसे बड़ी शिकस्त है।