आज देश के पांच प्रमुख राज्यों की विधानसभा चुनावों के लिए मतदान का काम पूरा हो जायेगा और इससे पहले जिस तरह भ्रष्टाचार का भूत राजनैतिक वातावरण पर सवार हुआ है, उसने समस्त देशवासियों के सामने यह पेचीदा सवाल खड़ा कर दिया है कि चुनाव हो रहे हैं या चोंचलों की बरसात हो रही है क्योंकि कांग्रेस पार्टी नीत पिछली मनमोहन सरकार के दौरान देश के सर्वोच्च पदों पर बैठे हुए लोगों के लिए सुरक्षा की उच्चतम तकनीक से लैस इटली से ‘अगस्ता वेस्टलैंड हेलीकाप्टर’ खरीदने के समझौते को रद्द करते हुए इसमें हुए कथित भ्रष्टाचार के विरुद्ध इटली की अदालत में ही मनमोहन सरकार ने मुकदमा लड़ा था और वहां के सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला दिया था कि भारत मे हेलीकाप्टरों की खरीदारी के लिए किसी को भी रिश्वत देने के सबूत नहीं हैं।

मजेदार तथ्य यह है कि मनमोहन सरकार से भी पहले सत्ता पर काबिज रही भाजपा नीत वाजपेयी सरकार के दौरान इन हेलीकाप्टरों को खरीदने का फैसला किया गया था मगर 2004 में भाजपा के चुनाव हार जाने पर जब मनमोहन सिंह सरकार सत्तारूढ़ हुई तो यह काम आगे बढ़ा और 2010 में जाकर कांग्रेस नेता रक्षामन्त्री श्री ए. के. एंटनी के कार्यकाल में इन हेलीकाप्टरों के रक्षा कौशल व तकनीकी दक्षता में सुधार के नये मापदंड तय करते हुए बढ़ी हई कीमत पर खरीदारी करने का करार हुआ परन्तु तब संसद में बैठी विपक्षी पार्टी भाजपा ने इनकी खरीदारी में भ्रष्टाचार होने के आरोप लगाये और सवाल खड़ा किया कि हेलीकाप्टर की कीमत को तकनीकी दक्षता के बहाने बढ़ाने का बहाना ढूंढा गया क्योंकि 2012 में इटली की अदालत में अगस्ता वेस्टलैंड बनाने वाली कम्पनी ‘फिन मकैनिका’ पर बिकवाली के लिए रिश्वत देने का मुकद्दमा चल पड़ा था।

इटली में व्यापारिक विस्तार के लिए अवैध तरीकों का इस्तेमाल करना गंभीर अपराध माना जाता है। इटली की निचली अदालत ने 2013 में फिन मकैनिका कम्पनी के चेयरमैन के खिलाफ फैसला दिया और भारत की संसद मंे इसकी अनुगूंज इस तरह हुई कि तत्कालीन रक्षामन्त्री श्री ए. के. एंटनी ने खरीदारी समझौते को एक सिरे से खारिज करते हुए घोषणा की कि भारत की सरकार हेलीकाप्टरों की खरीदारी के लिए दी गई पेशगी रकम को वापस लेगी। केरल के श्री एंटनी देश के एेसे राजनीतिज्ञ माने जाते हैं जिनकी ईमानदारी की कसम किसी भी अदालत में बेहिचक होकर तब भी ली जा सकती थी और आज भी ली जा सकती है। हकीकत तो यह है कि अपने रक्षामन्त्री के कार्यकाल के दौरान उन्होंने हर उस सौदे की जांच का काम ही कराया जिसको लेकर विपक्ष ने कभी भी आशंका व्यक्त की। अतः श्री एंटनी ने अगस्ता वेस्टलैंड हेलीकाप्टर करार को खारिज ही नहीं किया बल्कि इसकी जांच का काम सीबीआई को सौंप दिया।

यह छोटी बात नहीं थी कि इस खरीदारी में देश के तत्कालीन वायुसेना अध्यक्ष एयर चीफ मार्शल त्यागी भी लपेटे में आये और उन्हें एक अभियुक्त के तौर पर अपनी पैरवी करनी पड़ी। स्वतन्त्र भारत के इतिहास में यह पहला मौका था कि सेना के तीनों अंगों के प्रमुखों मंे से किसी एक पर रिश्वत खोरी का आरोप लगा था लेकिन सीबीआई ने इस मामले की जांच आगे बढ़ाई और जब इटली की सर्वोच्च अदालत में फिन मकैनिका कम्पनी ने अपने बचाव मंे निचली अदालत के फैसले के विरुद्ध अपील की तो वहां भारत का पक्ष रखा किन्तु यहां मामला उलट गया और फिन मकैनिका को क्लीन चिट मिल गई तथा सीबीआई भी यह सिद्ध नहीं कर पाई कि सौदे के लिए किसी बिचौलिये को रिश्वत दी गई लेकिन श्री एंटनी ने फिन मकैनिका कम्पनी को हेलीकाप्टर खरीदरी समझौते को लागू करने के लिये दी गई पूरी पेशगी रकम वापस ले ली और उसे सरकारी खजाने में जमा करा लिया। पूरे मामले में बिचौलिये के तौर पर क्रिस्टीन मिशेल का नाम उछला और उसकी वह डायरी सबूत के तौर पर रखी गई जिसमें उसने भारत में कुछ खास लोगों को धन देने की निशानदेही अपने ही खास नाम देकर की थी मगर यह डायरी भी उसके हाथ की लिखी हुई नहीं है बल्कि यह किसी दूसरे बिचौलिये ने उसके कहे अनुसार लिखी है।

इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब पूरा सौदा रद्द हो गया और अगस्ता वेस्टलैंड हेलीकाप्टर खरीद के लिए दिया गया पूरा धन भी वापस सरकारी खजाने में जमा हो गया तो क्रिस्टीन मिशेल ने भारत में रिश्वत क्या अपनी जेब से दी? जब कांग्रेस पार्टी के ही रक्षामन्त्री ने सौदा रद्द करते हुए फिन मकैनिका द्वारा दी गई बैंक गारंटी को भुना कर धन वापस ले लिया तो सीबीआई कौन सा भ्रष्टाचार उजागर कर सकती है? जहां तक डायरी में सांकेतिक नाम लिखे होने का प्रश्न है तो बिड़ला-सहारा डायरी मामले में 2017 में ही भारत का सर्वोच्च न्यायालय फैसला दे चुका है कि किसी की डायरी में कुछ भी लिखा होना कानूनी तौर पर सबूती दस्तावेज नहीं है। भारत कानून और संविधान से चलने वाला देश है और इसकी न्याय प्रणाली की प्रतिष्ठा पूरी दुनिया में ऊंचे पायदान पर रख कर देखी जाती है। इसके साथ ही क्रिस्टीन मिशेल मूल रूप से ब्रिटेन का नागरिक है और उसका प्रत्यर्पण संयुक्त अरब अमीरात की सरकार ने किया है।

इस देश की संवैधानिक व्यवस्था वहां के हुक्मरानों के हुक्म की गुलाम होती है। वैसे भी प्रत्यर्पण पूरी तरह किसी भी सरकार का राजनैतिक विषय होता है। किसी लोकतान्त्रिक देश तक में विदेश मन्त्रालय के पास यह अधिकार होता है कि वह अदालत के फैसले के बावजूद किसी भी विदेशी नागरिक के प्रत्यर्पण पर अलग रुख रख सकता है क्योंकि उसे अपने विदेश सम्बन्धों की सुरक्षा करनी होती है। इसी वजह से विभिन्न देशों के बीच द्विपक्षीय प्रत्यर्पण सन्धियां होती हैं। भारत में चुनाव आते-जाते रहते हैं, सरकारें बदलती रहती हैं मगर जो नहीं बदलता वह इसका संविधान की सत्ता का विराट स्वरूप और इसकी जांच एजेंसियों की सत्ता निरपेक्ष स्वतन्त्र भूमिका मगर क्या किया जाये कि सर्वोच्च जांच एजेंसी सीबीआई का मामला ही आजकल अदालत में अपनी तस्दीक करा रहा है और नीरव मोदी से लेकर ललित मोदी और विजय माल्या बैंकों के लाखों करोड़ रुपये हजम करके उल्टे भारत को ही धमका रहे हैं।