उत्तर-पूर्व के राज्यों में चुनाव


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भारत के दो उत्तर-पूर्वी राज्यों नागालैंड व मेघालय में चुनाव की सरगर्मियां सिर चढ़कर बोल रही है परन्तु उत्तर भारत के लोग इस लोकतन्त्र के महान पर्व से अलग-थलग रहने की मुद्रा में हैं। भारत की विशालता और विविधता का अगर वास्तविक आइना देखना है तो उत्तर-पूर्वी राज्यों के अक्स के बिना यह पूरा नहीं कहलाया जा सकता। इन राज्यों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि भारत के स्वतन्त्रता संग्राम में इनकी भूमिका शेष भारत के लोगों से अलग हटकर इस प्रकार रही है कि इन्होंने अंग्रेजी सत्ता की फौजी ताकत को अपने क्षेत्र के भूगोल में कभी भी दखलन्दाजी करने की इजाजत नहीं दी और फौज के बूते पर भारत को स्वतन्त्र कराने की मुहीम छेड़ने वाले नेताजी सुभाषचन्द्र बोस की आजाद हिन्द फौज का दिल खोल कर स्वागत किया।

अंग्रेजी शासन के दौरान अपनी आजाद हिन्द सरकार का ​तिरंगा झंडा भी नेताजी ने इन्हीं राज्यों की पहाड़ियों पर सबसे पहले फहरा कर एेलान किया था कि भारत के हर क्षेत्र का बच्चा-बच्चा अंग्रेजों की दासता से मुक्ति चाहता है। बेशक द्वितीय विश्व युद्ध की विभीषिका में नेताजी की फौजें अंग्रेजों की सेनाओं से परास्त हो गई थीं और कोहिमा में उन्हें पराजय का मुंह देखना पड़ा था परन्तु नेताजी ने सिद्ध कर दिया था कि नागालैंड, मेघालय या मणिपुर आदि के लोगों में भारत की स्वतन्त्रता के लिए जज्बा किसी भी तरह कम नहीं है। असम के गांधीवादी स्वतन्त्रता सेनानी श्री गोपीचन्द बारदोलाई के किस्से तो हम सभी जानते हैं परन्तु यह भी हकीकत है कि 19वीं सदी के आखिर में नागालैंड की बीहड़ परिस्थितियों और यहां के लोगों की कबीला मूलक जिन्दगी को देखते हुए अंग्रेजों ने भी इसे ‘नो मैंस लैंड’ की श्रेणी में डाल दिया था परन्तु कालान्तर में अंग्रेजों ने ईसाई मिशनरियों की मदद से इस क्षेत्र में आधुनिक शिक्षा व सभ्यता की मुिहम चलाई और इन इलाकों को अपने हिसाब से भारत से जोड़े रखा मगर इसके साथ यह भी हकीकत है कि नागालैंड में भारत की आजादी मिलने के पहले से ही पृथकतावादी आन्दोलन हिंसक रूप से चल रहा था जो आजादी के बाद भी स्व. ए.जेड फिजो के नेतृत्व में भूमिगत तौर पर चालू रहा। आजाद भारत में नागा लोगों की अपेक्षाओं को पूरा करने की प्रत्येक सरकार ने भरपूर कोशिश की और भूमिगत सशस्त्र आन्दोलनकारियों को वार्ता की मेज पर लाने के प्रयास किये।

इस संदर्भ में सबसे पहले साठ के दशक के शुरू में पं. नेहरू के शासन के दौरान एकल असम राज्य में पृथक ‘नागा हिल कौंसिल’ का गठन किया गया जिसके संरक्षक वहां के राज्यपाल बनाये गये परन्तु 1966 में असम राज्य को सात राज्यों में विभाजित कर दिया गया। इसकी असली वजह यह थी कि असम के ब्रह्मपुत्र के मैदानी इलाकों को छोड़कर म्यांमार से मिलते अन्य पहाड़ी क्षेत्राें की संस्कृति अलग-अलग आंचलिक कलेवर में बन्धी हुई थी। तब से इन छोटे–छोटे राज्यों ने भारत के लोकतन्त्र के पर्व को मनाने में पूरा उत्साह दिखाया है और अपने-अपने स्तर पर संसदीय लोकतन्त्र की महान परंपराएं भी स्थापित की हैं। उदाहरण के लिए मेघालय विधानसभा में कभी भी कोई भी विधायक अध्यक्ष के आसन के करीब जाकर विरोध प्रकट नहीं करता है। इन राज्यों के लोग चुनावों में औसतन 90 प्रतिशत तक भागीदारी करते हैं। फिलहाल नागालैंड व मेघालय राज्यों में चुनाव हो रहे हैं, उनकी अधिक संख्या ईसाई मतावलम्बियों की है। भारत में अकेला नागालैंड राज्य एेसा है जिसकी सरकारी राजभाषा अंग्रेजी है।

नागालैंड में 90 प्रतिशत और मेघालय में 75 प्रतिशत से अधिक ईसाई मतदाता हैं। इन मतदाताओं का जनादेश भारत की विविधता पर एेसी सहमति की मुहर होगी जिसकी कल्पना उत्तर भारत के मतदाताओं के लिए करना आसान नहीं है। यहां जातिवाद का कोई अर्थ नहीं है। इन राज्यों की महिलाएं पुरुषों से किसी भी क्षेत्र में कम नहीं हैं। कबीलों की संस्कृति में बन्धे होने के बावजूद वृहद स्तर पर ये दकियानूसी नहीं कहे जा सकते। बेशक इनकी जीवन शैली की कुछ विशेषताएं और विशिष्टताएं हैं मगर धर्म इनका नितान्त निजी मामला है। इन चुनावों में पहली बार राष्ट्रवादी कही जाने वाली भारतीय जनता पार्टी परंपरागत रूप से इन राज्यों में मजबूत मानी जाने वाली कांग्रेस पार्टी को सीधी चुनौती दे रही है। यही वजह है कि प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र माेदी से लेकर कांग्रेस अध्यक्ष श्री राहुल गांधी इन राज्यों के चुनावी दौरे पर हैं मगर असल में देखा जाये तो चुनौती भाजपा के लिए अधिक है क्योंकि इस पार्टी की छवि कमोबेश हिन्दुत्ववादी भगवा फहराने वाली एेसी पार्टी की है जिसका उत्तर-पूर्वी राज्यों की उन्मुक्त भारतीयता की परिभाषा से मेल मुश्किल से बैठता है। इसके बावजूद यह पार्टी इन दोनों ही राज्यों में यदि मतदाताओं को लुभाने में सक्षम हो जाती है तो यह श्री मोदी के ताज में नया चमचमाता हुआ मोती कहा जायेगा। जहां तक कांग्रेस पार्टी का सवाल है उसे लोगों को यह विश्वास दिलाना होगा कि उसकी नीतियों में स्वच्छ प्रशासन सबसे पहले पायदान पर आता है।

भाजपा को यह भी लाभ है कि असम राज्य में इसकी सरकार है। यह भी कहा जा सकता है कि संसद के बजट सत्र में ही बांस को वृक्ष की श्रेणी से अलग करके केन्द्र की मोदी सरकार ने इन राज्यों के लोगों को तोहफा दिया है क्योंकि बांस उनके जीवन व आजीविका का प्रमुख हिस्सा है परन्तु यह भी सत्य है कि वैचारिक रूप से इन राज्यों के लोग रूढि़वादी न होकर क्रांतिकारी विचारों के हिमायती माने जाते हैं। इन राज्यों के आर्थिक विकास की गति का स्तर शेष देश के समानुरूपी नहीं रहा है, इसकी वजह भौगोलिक परिस्थितियां और राजनैतिक व्यग्रवाद भी रहा है। प्राकृतिक सम्पदा की इन राज्यों में कमी नहीं है परन्तु आर्थिक उदारीकरण का दौर चलने के बाद जिस तरह निजी क्षेत्र ने इसका दोहन करना चाहा है उसका विरोध भी यहां की जनता द्वारा समय-समय पर किया जाता रहा है। इन चुनावों में देखना केवल यह है कि इन राज्यों की जनता उस कथित बदलाव की तरफ बढ़ती है जिसका सपना भाजपा दिखा रही है या फिर वह कांग्रेस की विरासत को ही महत्व देती है।