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चुनावी बांड और क्रोनी कैपिटलिज्म

सुप्रीम कोर्ट में राजनीतिक दलों की पॉलिटिकल फंडिंग के लिये चुनावी बांड जारी करने के मुद्दे पर चुनाव आयोग और सरकार में मतभेद सामने आ गये हैं। चुनावी बांड मामले में सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग का कहना है कि वह इलैक्टोरल बांड का विरोध नहीं कर रहा है, क्योंकि यह कानूनी डोनेशन होगा, लेकिन चुनाव आयोग चंदा देने वाली पहचान गुप्त रखे जाने का विरोध कर रहा है, क्योंकि वह पारदर्शिता चाहता है। सीनियर एडवोकेट प्रशांत भूषण ने कहा है कि इलैक्टोरल बांड के खिलाफ चुनाव आयोग ने जिस आधार पर हलफनामा दायर किया है, वही आधार कामनकॉज और एडीआर जैसे एनजीओ का भी है। इन एनजीओ ने भी इलैक्टोरल बांड के खिलाफ याचिका दायर की है। इलैक्टोरल बांड एक तरह से प्रोमिसरी नोट हैं। यानी ये धारक को उतना पैसा देने का वादा करते हैं।

ये बांड सिर्फ और सिर्फ राजनीतिक दल ही भुना सकते हैं। यह बांड एक हजार, दस हजार, एक लाख, दस लाख और एक करोड़ की राशि में ही खरीद सकते हैं। ये बांड राजनीतिक दलों को दिये जाते हैं और वह इन्हें 15 ​दिन में भुना सकते हैं। अगर राजनीतिक दल इन्हें 15 दिन में नहीं भुनाते तो यह राशि प्रधानमंत्री राहत कोष में चली जायेगी। यह बांड संदेह के घेरे में हैं। स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने जनवरी 2019 से मार्च 2019 के बीच केवल तीन माह में 1,716 करोड़ के भारी-भरकम बांड बेचे हैं। पिछले वर्ष 2018 में केवल 6 माह के दौरान एक हजार करोड़ के ही बांड बिके थे। इस वर्ष 1,716 करोड़ से अधिक के बांडों की बिक्री इस बात की ओर इशारा करती है कि इस बार चुनावों में पूरी तरह अज्ञात स्रोतों से प्राप्त भारी भरकम धन का इस्तेमाल होगा। दरअसल केन्द्र सरकार ने चुनावी बांड के दानकर्ताओं का नाम गोपनीय रखने का दावा किया था। चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल कर इस योजना को चुनौती दी है।

राजनीतिक दलों को बांडों के जरिए हर प्रकार से धन की रिपोर्टिंग के दायरे से बाहर रखा गया है। यह जानकारी प्राप्त करना मुश्किल होगा कि राजनीतिक दलों को देश की कंपनियों से धन मिला था या विदेशी स्रोतों से। पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त एसवाई कुरैशी का कहना है कि इलैक्टोरल बांड से सत्ताधारी पार्टी को सरकार और कार्पोरेट सैक्टर के बीच गोपनीय रिश्ते छिपाने में मदद मिलती है। उन्होंने कहा है कि इलैक्टोरल बांड ने क्रोनी कैपिटलिज्म (सांठगांठ वाले पूंजीवाद) को कानूनन वैध बना दिया है। विदेशी योगदान नियमन कानून में संशोधन के केन्द्र के फैसले पर चुनाव आयोग ने कहा है कि इससे भारत में राजनीतिक दलों को अनिय​​न्त्रित विदेशी फंडिंग की अनुमति मिलेगी और भारतीय नीतियां विदेशी कंपनियों से प्रभावित हो सकती हैं। भोपाल में एक एनजीओ संचालक के ठिकानों से कुछ डायरियां और इलैक्टोरल बांड मिले हैं। कहा जाता है कि यह बांड बड़ी कार्पोरेट कंपनियों के हैं। यह बांड किस राजनीतिक दल के लिये खरीदे गये यह जानने का विषय है।

चुनाव आयोग ने कोर्ट में दिये अपने हलफनामे में 2017 में कानून मंत्रालय को भेजी अपनी राय पर ही टिके रहने का फैसला किया है। उसने योजना में दानकर्ता की पहचान न होने और नानप्राफिट कंपनियों द्वारा भी इलैक्टोरल बांड खरीदने की आशंका जताई गई है। चुनाव आयोग का कहना है कि कम से कम यह बात तो पता चलनी ही चाहिये कि किस-किस ने कितना चंदा किस राजनीतिक दलों को दिया है। दूसरी तरफ सरकार का कहना है कि चुनावी बांड का मकसद राजनीतिक वित्त पोषण में कालेधन को समाप्त करना है। धन देने वाले चाहते हैं कि उनका राजनीतिक दल सत्ता में आये, ऐसे में अगर उनकी पार्टी सत्ता में नहीं आती तो उनको इसका परिणाम भुगतना पड़ सकता है, इसलिये गोपनीयता जरूरी है। सरकार की तरफ से महाधिवक्ता का कहना है कि दान सही मायने में सफेद धन होता है।

अगर एजैंसियां स्रोत को सुनिश्चित करना चाहती हैं तो वे बैंकिंग चैनलों के माध्यम से जांच कर सकती हैं। चुनावों में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिये फैसला सुप्रीम कोर्ट को करना है कि चुनावी बांड पर रोक लगाई जाये या इसकी व्यवस्था बदली जाये। भारत में चुनाव आयोग की सत्ता को जो कमतर आंकने की कोशिश करते हैं संभवतः वे इस देश के लोकतंत्र की ताकत से या ताे वाकिफ नहीं या उन्हें राजनीतिक बहुदलीय व्यवस्था की प्रशासनिक प्रणाली के बारे में सम्पूर्ण ज्ञान नहीं है। चुनाव आयोग की सत्ता को गंभीरता से पहचानने की जरूरत है। चुनाव में काले धन के इस्तेमाल पर रोक के ठोस उपाय तो किये ही जाने चाहिएं।