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बिहार की चुनावी शतरंज !

अगले महीने होने वाले बिहार विधानसभा चुनावों के लिए चुनावी चौसर अब लगभग बिछ चुकी है और सत्तारूढ़ भाजपा- जद (यू) गठबन्धन का मुकाबला करने के लिए विपक्षी राजद-कांग्रेस-कम्युनिस्ट गठबन्धन की घोषणा भी हो चुकी है जिसका नेतृत्व श्री लालू प्रसाद यादव के पुत्र श्री तेजस्वी यादव करेंगे। तेजस्वी वर्तमान विधानसभा में विपक्ष के नेता भी हैं और पूर्व उपमुख्यमन्त्री भी हैं। राज्य में पिछले 15 साल से (केवल कुछ महीनों को छोड़ कर) नीतीश बाबू के नेतृत्व में ही सत्तारूढ़ गठबन्धन सरकार चला रहा है। अतः यह देखना बहुत दिलचस्प होगा कि इन चुनावों में बिहार के मतदाता किस गठबन्धन को सत्ता सौंपते हैं। इसके साथ इस गठबन्धन के क्षेत्रीय सहयोगी दल लोक जनशक्ति पार्टी ने जिस तरह अकेले ही चुनावों में उतरने का फैसला किया है उससे नीतीश बाबू की मुश्किलें थोड़ी बढ़ सकती हैं। वैसे राज्य में अब इस पार्टी की शक्ति इसके संस्थापक श्री रामविलास पासवान के राजनीति में ज्यादा सक्रिय न होने की वजह से नाम मात्र की ही आंकी जा रही है। हालांकि पिछले 2015 के चुनावों में बिहारी मतदाताओं ने भाजपा के विरुद्ध मत देकर लालू जी और नीतीश कुमार की पार्टियों जद (यू) व राजद के महागठबन्धन को दो-तिहाई बहुमत दिया था जिसमें कांग्रेस भी शामिल थी, परन्तु यह गठबन्धन बीच में ही टूट गया था और नीतीश बाबू पुनः अपनी पुरानी सहयोगी पार्टी भाजपा के खेमे में चले गये थे। इस दृष्टि से भी इन चुनावों का विशेष महत्व होगा क्योंकि तेजस्वी यादव का गठबन्धन मौजूदा चुनावों में नीतीश बाबू पर जनमत के साथ छल करने को भी एक चुनावी मुद्दा बना रहा है।

 बिहार में जो चुनावी चौसर बिछी है उसमें सत्तारूढ़ गठबन्धन में जद (यू) व भाजपा को बराबर-बराबर सीटें मिली हैं। इस प्रकार नीतीश बाबू ने राज्य का क्षेत्रीय दल होने के नाते बड़े भाई होने का रुतबा खो दिया है। इसकी वजह उनके शासन के खिलाफ सत्ता विरोधी भावनाएं प्रबल होना माना जा रहा है और भाजपा यह चुनाव प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी की छवि को आगे रख कर लड़ना चाहती है। हालांकि इस गठबन्धन के मुख्यमन्त्री पद के दावेदार नीतीश बाबू ही होंगे और उन्हीं के नेतृत्व में चुनाव लड़ा जायेगा परन्तु इससे इतना तो निश्चित हो गया है कि नीतीश बाबू का वजन कुछ कम करके देखा जा रहा है। 243 सदस्यीय विधानसभा में जद (यू) 122 व भाजपा 121 सीटों पर चुनाव लड़ेगी। जबकि दूसरी तरफ लालू पुत्र तेजस्वी यादव को कांग्रेस ने राज्य चुनावों का नेतृत्व देकर और उन्हें मुख्यमन्त्री पद का दावेदार घोषित करके साफ कर दिया है ​िक बिहार इस बार परंपरा तोड़ कर एक युवा नेता पर दांव लगाना चाहता है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि लालू जी की अनुपस्थिति से उनकी राष्ट्रीय जनता दल पार्टी की ताकत कमजोर हुई है और युवा तेजस्वी इस पार्टी के राज्यभर में फैले जनाधार को कस कर बांधे रखने में पूरी तरह सफल नहीं रहे हैं मगर कांग्रेस पार्टी द्वारा उन्हें आंख मींच कर दिया गया समर्थन इस खाई को पाटने का प्रयास है।  वास्तविकता यह है कि 1989 के बाद कांग्रेस पार्टी का ही बहुत बड़ा जनाधार खिसक कर जनता दल के पास चला गया था जिसके लालू व नीतीश दोनों ही शुरू में अन्तरंग हिस्सा थे।  बाद में इन दोनों ने रास्ते अलग किये और अलग-अलग पार्टी बनाई जिससे स्व. कर्पूरी ठाकुर की संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी का जनाधार नीतीश बाबू व जार्ज फर्नांडीज की समता पार्टी ने हथिया लिया।

तीसरे सहयोगी राम​िवलास पासवान ने भी अलग पार्टी बना कर अपना जातिगत वोट बैंक मजबूत किया मगर वर्तमान सन्दर्भों में पुराने वोट गणित का बहुत ज्यादा महत्व इसलिए नहीं है क्योंकि 2005 के चुनावों से बिहारी मतदाताओं का मिजाज बदला और उन्होंने स्वच्छ प्रशासन की तरफ ज्यादा ध्यान देना शुरू किया जिसके चलते नीतीश बाबू की छवि ‘सुशासन बाबू’ की बनी, परन्तु पिछले पांच सालों में नीतीश बाबू की यह छवि ध्वस्त हुई है और राज्य में प्रशासनिक अक्षमता के कई मामले अखबारों की सुर्खियां बने हैं। इनमें सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण कोरोना से उपजे लाॅकडाऊन काल के दौरान बिहार के प्रवासी मजदूरों की राष्ट्रीय स्तर पर दयनीय हालत प्रमुख है। इस समस्या के चलते बिहार की राजनीति से इस बार जातिगत समीकरणों का बन्धन टूटने का अन्देशा पैदा हो रहा है। इसके साथ ही विपक्षी महागठबन्धन ने इस बार कम्युनिस्ट पार्टियों को अपने साथ लेकर यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया है कि जातिगत ध्रुवीकरण को सम्पन्न और विपन्न की धारों में बांटा जाये। हालांकि कुल 243 सीटों में से वामपंथी दलों को 29 सीटें ही दी गई हैं परन्तु इस बहाने इस राज्य के पुराने वोट बैंक आधार को पुनर्जीवित करने का प्रयास जरूर किया गया है।

 आजादी के बाद 1962 तक बिहार में कम्युनिस्ट पार्टी ही प्रमुख विपक्षी दल हुआ करती थी।  भारतीय जनसंघ का प्रादुर्भाव इस राज्य में 1967 से ही होना शुरू हुआ, परन्तु वर्तमान में राजनीतिक समीरकरण बदलने का श्रेय कोरोना और लाॅकडाऊन को जरूर दिया जा सकता है जिसकी वजह से बिहार में अमीर-गरीब के बीच दूरी और बढ़ गई मगर बिहार के मतदाताओं को सर्वाधिक सुविज्ञ मतदाता भी माना जाता है। अतः इन चुनावों में कृषि क्षेत्र के लिए बनाये गये नये कानून भी प्रमुख मुद्दा रह सकते हैं।  इस राज्य के सर्वाधिक खेतीहर मजदूर पंजाब जाते हैं जो कि कृषि उपज में देश का अग्रणी राज्य है। अतः पंजाब  में जिस प्रकार इन कानूनों का विरोध कर रहे हैं उसका असर बिहार की राजनीति पर पड़े बिना नहीं रह सकता मगर इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण यह है कि बिहार में 2006 से ही कृषि मंडी समिति कानून नहीं है और यहां के किसान अपनी उपज निजी व्यापारियों को ही बेचते हैं। अतः कृषि कानूनों के मुद्दे पर चुनावों में उनकी राय एक प्रकार से सीमित जनमत संग्रह जैसी मानी जायेगी। इसके साथ ही बिहार के चुनाव कोरोना काल में हो रहे हैं।  इन चुनावों में बिहारी जनता का मत प्रतिशत क्या रहता है। यह भी देखने वाली बात होगी क्योंकि पारंपरिक तरीकों से चुनाव प्रचार पर कई प्रकार के प्रतिबन्ध होंगे। गौर से देखें तो ये चुनाव स्वयं चुनाव आयोग के लिए भी एक परीक्षा से कम नहीं होंगे क्योंकि इन्हें सम्पन्न करने के लिए उसने पृथक आचार संहिता जारी की है। राजनीतिक नजरिये से ये चुनाव देश की राजनीतिक दिशा तय करने वाले भी माने जाएंगे क्योंकि बिहार को उत्तर भारत की राजनीति की प्रयोगशाला भी कहा जाता है। जाहिर है इसका प्रभाव राष्ट्रीय राजनीति पर पड़े बिना नहीं रहेगा।