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आपातकाल : हमारे कड़वे अनुभव

25 जून, 1975 को देश में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगाया था, जिसे भारतीय इतिहास का काला अध्याय भी कहा जाता है। यह आपातकाल 21 मार्च, 1977 तक लगा रहा। आपातकाल के दौरान भारतीय नागरिकों से हुई ज्यादतियों के बारे में मेरे पिताश्री अश्विनी कुमार अक्सर बताते रहते थे या फिर मैंने इस संबंध में भारतीय राजनीति के इतिहास से सम्बन्धित पुस्तकों से जानकारी ली। आपातकाल की नींव 12 जून, 1975 को ही पड़ गई थी, इस दिन इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को रायबरेली के चुनाव अभियान में सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग का दोषी पाया था और उनके चुनाव को खारिज कर दिया था। इतना ही नहीं इंदिरा गांधी पर 6 वर्ष तक चुनाव लड़ने और किसी भी तरह का पद सम्भालने पर भी रोक लगा दी गई थी। राज नारायण ने 1971 में इंदिरा गांधी के हाथों पराजित होने के बाद यह मामला दाखिल कराया था। जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा ने यह फैसला सुनाया था। हालांकि 24 जून, 1975 को सुप्रीम कोर्ट ने फैसला बरकरार रखा था लेकिन इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री पद की कुर्सी पर बने रहने की इजाजत दे दी थी। तब जयप्रकाश नारायण ने इंदिरा गांधी के इस्तीफा देने तक देश भर में रोज प्रदर्शन करने का आह्वान किया। देश भर में हड़तालें चल रही थीं। जयप्रकाश और मोरारजी देसाई सहित कुछ नेताओं के नेतृत्व में व्यापक विरोध प्रदर्शन किए जा रहे थे। इंदिरा गांधी सिंहासन खाली करने के मूड़ में नहीं थीं, उधर विपक्ष सरकार पर लगातार दबाव बना रहा था। नतीजा यह हुआ ​कि इंदिरा गांधी ने 25 जून की रात देश में आपातकाल लागू करने का फैसला किया। आधी रात को इंदिरा गांधी ने तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद से आपातकाल के फैसले पर हस्ताक्षर भी करवा लिए। यह वो दिन था जब नागरिकों के  मौलिक अधिकारों को स्थगित कर दिया गया था। नागरिक अधिकारों का खुला हनन किया गया। आपातकाल लगते ही जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में पूरा विपक्ष एकजुट हो गया था। पूरे देश में इंदिरा गांधी के खिलाफ आंदोलन छिड़ गया था। सरकारी मशीनरी विपक्ष के आंदोलन को कुचलने में जुट गई थी। अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण अडवानी, मुलायम सिंह यादव समेत विपक्ष के तमाम नेता जेलों में ठूंस दिए गए थे। मेरे पिता अश्विनी कुमार मुझे आपातकाल की कहानियां बताया करते थे। पंजाब केसरी के संस्थापक और मुख्य सम्पादक और मेरे परदादा लाला जगत नारायण जी ने आपातकाल के विरुद्ध लड़ाई लड़ने का फैसला किया। श्रीमती इंदिरा गांधी और लाला जगत नारायण जी तथा मेरे दादा रमेश चन्द्र जी के विचारों में काफी अंतर था। एमरजैंसी लगी तो लाला जगत नारायण जी, रमेश चन्द्र जी आैर पंजाब केसरी पर मानो कहर टूट पड़ा।

एमरजैंसी 19 माह रही, लाला जी को गिरफ्तार कर लिया गया। इस दौरान वह जालंधर, फिरोजपुर, नाभा, संगरूर और पटियाला की जेलों में रहे। जेल में भी उनकी हालत ठीक नहीं रही। 76 वर्ष की आयु थी। शरीर को कई तरह की बीमारियों ने घेर रखा था। डाक्टरों ने तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्ञानी जैल सिंह को ​लिखा था-‘‘ज्यादा दिन जेल में रहना इनकी जान के लिए खतरा है।”  ज्ञानी जैल सिंह ने जवाब दिया कि ‘‘लाला जी को छोड़ा जा सकता है अगर वह लिखित रूप से यह वचन दें कि वह किसी भी राजनीतिक गतिविधि में भाग नहीं लेंगे।”  तब लाला जी ने ज्ञानी जैल सिंह को लिखा ‘‘वह ऐसी स्थिति में मर जाना पसंद करेंगे पर झुकेंगे नहीं।” लाला जी से वही पत्रकारिता मेरे दादा जी में आई और वहीं से मेरे पिता अश्विनी जी के अन्दर भरपूर थी। वह किसी भी कीमत पर अपनी निर्भीक, निष्पक्ष पत्रकारिता से समझौता नहीं करते थे। उन्होंने जिन्दगी में बहुत से नुक्सान भी उठाए। मेरी भी पूरी कोशिश है कि मैं यानी लाला जी की चौथी पीढ़ी उनके नक्शे कदमों पर चलूं और हमेशा देश के ​लिए समर्पित रहूं और अपने पाठकों से सदैव आशीर्वाद पाता रहूं।

मेरे पिता मुझे बताते थे कि आपातकाल लगते ही अखबारों पर सेंसर बैठा दिया गया। सेंसरशिप के अलावा अखबारों और समाचार एजैंसियों को नियंत्रित करने के लिए सरकार ने नया कानून बनाया। पंजाब केसरी का प्रकाशन रोकने के लिए जालंधर स्थित प्रैस का बिजली कनैक्शन काट दिया गया तब ट्रैक्टर से प्रैस चला कर पंजाब केसरी ने प्रैस की स्वतंत्रता की रक्षा करने का शंखनाद किया। मेरे पिता जी ने बताया था कि किस तरह ट्रैक्टर का प्रबंध किया गया फिर बुआ जी के बेटे रवि सूरी ने इंजन और बड़े पट्टे का प्रबंध किया। मेरे पिता अश्विनी कुमार ने और सभी परिवार के बड़ों ने मिलकर ऐसा जुगाड़ बैठाया कि प्रिंटिंग मशीन चल पड़ी। देश के अन्य अखबारों को बहुत तंग किया गया। कई समाचार पत्रों को इस बात के लिए बाध्य किया गया कि वह सरकार द्वारा मनोनीत निदेशकों की नियुक्ति करें। यहां तक कि मुझे कल ही ताऊ रवि सूरी ने बताया कि कैसे वह और उनके भाई कमल सूरी, राजीव सूरी रात-रात भर पहरा देते थे कि कोई उनकी प्रेस को नुक्सान न पहुंचा सके।

इंदिरा गांधी के शासन में नागरिकों के साथ जो दुर्व्यवहार, अन्याय और अत्याचार किया गया उसमें नागरिक अधिकारों की रक्षा करने वाले वकीलों को भी नहीं बख्शा गया। जजों को भी नहीं बख्शा गया। जनसंख्या नियंत्रण के नाम पर गरीब मजदूरों की जबरन नसबंदी कराई गई। पुलिस और प्रशासन को अधिक अधिकार मिलने से भ्रष्टाचर चरम पर पहुंच गया था। हर तरफ आतंक का माहौल था। अंततः जनता ने 1977 में एकजुट होकर इंदिरा गांधी को धूल चटा दी थी। इस तरह जनता ने लोकतंत्र में अपनी आस्था का सबूत दे दिया था। आज आपातकाल को भुलाने की कोशिशें की जाती हैं लेकिन लोग काले दिनों के अनुभवों को कैसे भूल सकते हैं। हम अनुभवों से ही सीखते हैं जिनसे हमारा लोकतंत्र और मजबूत होता है।