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संपादकीय

एक दानव का अन्त

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दुनिया के लोकतांत्रिक और सभ्य समाज के सामने भीषण, दुरुह और तेजाबी चुनौती खड़ी करने वाले दुर्दांत आतंकवादी गिरोह इस्लामिक स्टेट (आईएस) के सरगना अबू बकर बगदादी का अमेरिका के स्पेशल आपरेशन में मारा जाना भारतीयों के लिए भी बड़ी खबर है। अमेरिका ने जिस तरह पाकिस्तान के ऐबटाबाद में ओसामा बिन लादेन के ठिकाने में घुसकर उसे मारा था, उसी तरह उसने सीरिया में इस्लामिक स्टेट के संस्थापक बगदादी को उसी के ठिकाने में घेर लिया तो उसने अपने आपको आत्मघाती जेकेट के धमाके से उड़ा लिया। इससे पहले भी बगदादी की मौत की खबरें आती रही हैं, लेकिन यह खबरें दुनिया को भ्रमजाल में फंसाने के लिए ही थीं। अब जबकि अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बगदादी की मौत की पुष्टि कर दी है तो उसकी मौत के बारे में अब कोई संदेह नहीं बचा है। 

एक और दानव का अन्त हो चुका है। बगदादी के खिलाफ आपरेशन को सफल बनाने के लिए रूस, तुर्की और सीरिया का भी सहयोग रहा। मौत से पहले बगदादी चीख रहा था, चिल्ला रहा था। अमेरिकी आपरेशन में उसके कई लड़ाके भी मारे गए और कुछ को अमरीका ने पकड़ भी लिया। इस्लामिक स्टेट ने भारत को भी झकझोर कर रख दिया था। भारत के अनेक मुस्लिम युवक-युवतियां इराक में इस्लामिक स्टेट में शामिल होकर लड़ रहे थे। केरल और अन्य दक्षिणी राज्यों के युवक-युवतियां लापता हो रहे थे। 

अमेरिका और यूरोप के मुस्लिम युवक-युवतियों के बीच आईएस के प्रति क्रेज इस कदर बढ़ गया था कि उन्होंने आईएस की राह पकड़ ली। ब्रिटेन ने कुछ वर्ष पहले यह स्वीकार किया था कि जिस तरह उसके युवक-युवतियां इराक में जाकर आईएस में शामिल होकर हिंसा के भागीदार बन रहे हैं, उसे देखते हुए ब्रिटेन की संप्रभुता भी खतरे में पड़ सकती है। दुनिया के कई देशों में अति मुस्लिमवाद, अतिघृणित मानसिकतायें पहले से ही त्राहिमाम मचा रही हैं। यही कारण था कि आईएस के अस्तित्व में आने के साथ-साथ विघटनकारी और जेहादी मानसिकता ने उदारवादी और बहुलतावादी सामाजिक व्यवस्था को भी अपनी चपेट में ले लिया। 

इराक से लेकर सीरिया तक एक बड़े क्षेत्र पर काले झण्डे के वर्चस्व का विस्तार और अमेरिकी नेतृत्व में एक बार फिर यूरोप के मित्रों के साथ मिलकर आतंकवाद के खिलाफ युद्ध के निर्णय ने एक बार इतिहास को उस मोड़ पर ला दिया था जहां वह 2001 में था। आईएस की क्रूरता को देखकर ऐसा लग रहा था कि दुनिया सभ्यताओं के संघर्ष से आगे बढ़कर सभ्यताओं के युद्ध की स्थिति में पहुंच चुकी है। अन्ततः अमेरिकी नेतृत्व में आईएस पर हवाई हमले शुरू किये गए। जिस क्रूरता से आईएस ने नरसंहार किए उससे लोग अलकायदा, तालिबान को भूल गए। 

महिलाओं के यौन शोषण और क्रूरता की सभी हदें पार हो चुकी थीं तो दुनिया को अहसास हुआ कि यदि स्थितियों को संभाला नहीं गया तो आईएस मानवता के लिए बड़ी चुनौती बन जाएगा। इराक के शहरों पर कब्जा करने के बाद चर्चा में आया संगठन इस्लामिक स्टेट इन इराक एण्ड द लेजेंट दरअसल वहाबी आन्दोलन से प्रेरित हुआ। आईएस अकेला संगठन नहीं था बल्कि देश के अन्दर आैर अन्तर्राष्ट्रीय चरमपंथी समूह भी इसे सहयोग दे रहे थे जैसे मुजाहिद्दीन शूरा काऊंसिल, अलकायदा इन इराक, जायश अल फातिहीन आदि। 

बगदादी का जन्म इराक के सामरा में निम्न मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था। बगदादी का परिवार दावा करता रहा कि जिस कबीले से पैगम्बर मोहम्मद का सम्बन्ध था, उसी कबीले से वो भी है। युवावस्था में बगदादी स्थानीय म​स्जिद के बच्चों को इस्लाम की शिक्षा देता था। जैसे ही उसने मुस्लिम ब्रदरहुड ज्वाइन किया उसके बाद से रूढ़िवादी और हिंसक इस्लामिक मूवमेंट की तरफ आकर्षित हो गया। बगदादी का उद्देश्य इराक के सुन्नी क्षेत्र अथवा लेवेंट में खिलाफत (खलीफा  का राज्य) की स्थापना करना था। 

आईएस के निशाने पर अफ्रीका का ऊपरी हिस्सा, इस्राइल, मिडिल ईस्ट, तुर्की, भारत, बंगलादेश और इंडोनेशिया का पूर्वी हिस्सा भी था। अमरीकी हमलों से घबराया बगदादी लगातार अपना ठिकाना बदलता रहा। अंततः अमरीका ने सीरिया के इदलिब से कुछ दूर उसके एक ठिकाने को ढूंढ निकाला। बगदादी तो मारा गया लेकिन सवाल यह है कि क्या उस कट्टरपंथी जेहादी विचारधारा को खत्म किया जा सकता है जिसके चलते बगदादी जैसे लोग पनपते हैं। 

इंटरनेट का धड़ल्ले से इस्तेमाल इस्लामिक स्टेट ही करता है और इसी के माध्यम से वह मुस्लिम युवाओं के दिमाग में जेहादी मानसिकता का जहर भरता है। कोई दूसरा बगदादी पैदा न हो, इसके लिए समूचे विश्व को कट्टरपंथी विचारधारा से लड़ाई जारी रखनी होगी। इस्लामिक स्टेट के लड़ाके संगठन के कमजोर होने से वापिस लौटते हैं तो भी उनके किसी दूसरे जेहादी संगठनों से जुड़ने का खतरा बना हुआ है इसलिए आतंकवादी संगठनों के विरुद्ध लड़ाई जारी रखनी होगी।