हर बच्चा अपने माता-पिता की आंखों का तारा होता है। उसे पालने-पोसने में माता-पिता बहुत ही मेहनत करते हैं। एक बच्चे को जरा सी चोट लग जाए या बुखार हो जाए तो माता-पिता का चैन लुट जाता है। बच्चों की सांस के साथ सांस लेते हैं उन्हें अच्छे से अच्छे स्कूल में भेजने की कोशिश होती है, हर माता-पिता बच्चों को हर सुविधा देने की कोशिश करते हैं जो शायद उन्हें भी कभी न मिली हो परन्तु किसी एक की गलती से या अनहोनी से किसी की दुनिया लुट जाए या उजड़ ही जाए तो क्या होगा? इसमें कोई शक नहीं कि अपने नन्हें-मुन्ने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाने के लिए उन्हें घर से स्कूल पहुंचाने के लिए कैब और बसों की अच्छी सुविधाएं प्रदान कर रहे हैं लेकिन ये कैब या बसें चलाने वाले ड्राइवर लोग अगर कानों में फोन की लीड लगाकर कहीं व्यस्त हों और दुर्घटना हो जाए तो इसे क्या कहेंगे?

पिछले​ ​दिनों एक के बाद एक ऐसे हादसे हुए जिनमें नर्सरी से सातवीं-आठवीं कक्षा तक पढ़ने वाले बच्चे ड्राइवरों की लापरवाही भरी हरकतों से मौत के आगोश में समा गए। आखिरकार इन ड्राइवरों को असमय मौत की डगर पर मासूमों की जिन्दगी से खेलने का लाइसैंस किसने दिया? यह एक अहम सवाल है।

खाली यूपी में कुशीनगर के एक रेल फाटक पर एक वैन का ड्राइवर कानों में ईयर फोन लगाकर जब आगे बढ़ निकला तो उसकी वैन एक ट्रेन से टकरा गई और 13 मासूमों की जान चली गई। इसी दिन करनाल में ब्रह्मानंद चौक के पास स्कूली बच्चों से लदा एक आटो पलट गया जिसमें 8 बच्चे गंभीर रूप से घायल हो गए। इसी दिन दिल्ली में एक प्राइवेट टैंकर ने स्कूल बस को टक्कर मारकर 18 बच्चों को बुरी तरह से घायल कर डाला।

आखिरकार बच्चों की जिन्दगियों से खिलवाड़ की यह अनहोनी कब रुकेगी। हजारों लोगों ने मुझे व्यक्तिगत तौर पर फोन करके कहा कि जब हमने स्कूल प्रबंधकों से बातचीत की तो जवाब मिला कि आप अपनी व्यवस्था खुद कीजिए, हम कुछ नहीं कर सकते। लिहाजा बच्चों की जिन्दगियों को रौंद डालने का सिलसिला अभी जारी है।

पिछले महीने जिला कांगड़ा के नूरपुर कस्बे में एक स्कूली बस जब गहरी खाई में जा गिरी तो 27 बच्चे मौत के क्रूर पंजे की चपेट में आ गए। हिमाचल में तो समझ आता है कि लोगों के पास शहरों में स्कूल भेजने के लिए बसों के अलावा कोई और विकल्प नहीं, वहां इसे एक हादसा माना जा सकता है लेकिन जिस तरह से मैदानी इलाकों में स्कूल प्रबंधकों की मनमानी और कैब और प्राइवेट आपरेटरों की मनमानी चल रही है तो इसे क्यों नहीं रोका जा रहा। मैंने खुद देखा है कि आटो रिक्शा, कैब, टैम्पो और बसों में स्कूली बच्चों को ठूस-ठूस कर ले जाया जाता है।

आखिरकार ट्रांसपोर्ट विभाग इन असभ्य ड्राइवरों के खिलाफ एक्शन कब लेगा। हमारा मानना है कि प्राइवेट बस आपरेटरों, आटो चालकों और अन्य रिक्शा वालों की गुण्डागर्दी चल रही है जिसके आगे स्कूल प्रबंधक लाभ कमाने के चक्कर में माता-पिता को ट्रांसपोर्ट सुविधा नहीं देते और बेचारे माता-पिता अपने बच्चों की जिन्दगियों को लेकर चिन्ता जता रहे हैं। इस दिशा में हम चाहते हैं कि सरकारों को ठोस नीति बनानी होगी जिसमें बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी। जब स्कूल प्रबंधक मनमर्जी की फीस वसूल रहे हैं तो फिर वे बच्चों के लिए ट्रांसपोर्ट सुविधा क्यों नहीं प्रदान करते, जो बसों में ड्राइवर हों उनकी उचित जांच होनी चाहिए।

इसके अलावा यह भी बहुत तकलीफदेह है कि टीनेजर्स खासतौर से स्कूल जाने वाले बच्चों को जिस तरह से माता-पिता स्वतंत्रता दे रहे हैं और जिस तरह से ये बच्चे धड़ाधड़ मन-पसंदीदा व्हीकल विशेष रूप से बाइक और स्कूटियां चला रहे हैं, वह चौंकाने वाला है। स्कूटी और बाइक चला रहे बच्चों के दर्जनों ऐसे किस्से हैं जो हादसों का शिकार हुए और कइयों की जान चली गई। चैनलों पर ऐसी खबरें और अखबारों की सुर्खियां हफ्ते में दो या तीन दिन जब इन तथ्यों से भर जाती हैं कि किसी माता-पिता का एकमात्र बेटा या बेटी स्कूटी या बाइक पर सवार था और हादसे का शिकार होकर इस दुनिया में नहीं रहा, तो सचमुच बहुत दु:ख होता है।

हम बच्चों की स्वतंत्रता पर रोक लगाने के हक में बिल्कुल नहीं हैं लेकिन सावधानी बहुत जरूरी है। लगभग सालभर पहले एक जुवेनाइल बच्चा अपने पिता की बीएमडब्ल्यू लेकर गया और 140 किमी. प्रति घंटे की रफ्तार पर चलाते हुए एक कंपनी के एकाउंटेंट को रौंद डाला। उस बच्चे के पास लाइसेंस भी नहीं था। यह मामला अखबार की सुर्खियां बना, लेकिन जिसकी जान चली गई उन माता-पिता का परेशान होना स्वाभाविक है। अब जिस बच्चे पर केस चल रहा है और इरादतन हत्या का मामला दर्ज है तो बताओ अदालत का फैसला आने तक या फैसला आने के बाद क्या उसके माता-पिता को चैन मिलेगा?

पीडि़त और प्रताडि़त दोनों पक्ष प्रभावित हुए। छोटे बच्चों के मामले में ड्राइविंग लाइसेंस बनवाना और सब कुछ सेटिंग के तहत हो जाना ये ऐसी चीजें हैं जो प्रशासनिक हेराफेरी की परतें उखाड़ रही हैं, परंतु हमारा मानना है कि माता-पिता को आज के जमाने में बच्चों को स्कूटियां और बाइक सौंपते हुए पूरी सावधानियां बरतनी चाहिएं। ​पिछले दिनों एक के बाद एक सड़क हादसे हुए तो चिंता सताने लगी कि बेटियां और बेटे दोनों ही माता-पिता और देश का भविष्य हैं और उनकी संभाल केवल स्वतंत्रता देने से नहीं बल्कि सुरक्षा से भी की जानी चाहिए, क्योंकि कहा भी गया है जान है तो जहान है। सरकार और माता-पिता को इन गंभीर हादसों का संज्ञान लेकर बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी।