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संपादकीय

कर्नाटक में रोज नया किरदार!

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कर्नाटक में जो कुछ भी हो रहा है उस पर पूरे देश की नजर है। सियासत के तिजारत बन जाने का कर्नाटक सबसे ताजा उदाहरण है। अतः कर्नाटक में अब जो कुछ भी होगा वह तिजारत के कायदों के अनुसार ही होगा, इसमें किसी को भी किसी प्रकार का सन्देह नहीं होना चाहिए। यह पूरी तरह साफ है कि राज्य की कांग्रेस व जनता दल (सै.) की एचडी कुमारस्वामी की सरकार अपना ‘व्यावहारिक’ बहुमत खो चुकी है क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा देने वाले कांग्रेस के दस विधायकों के बारे में आगामी मंगलवार तक यथास्थिति बनाये रखने का निर्देश देने के बाद श्री कुमारस्वामी ने इसे सुनहरा मौका समझते हुए विधानसभा में ही इच्छा जता दी कि वह सोमवार को ही अपनी सरकार का बहुमत साबित करना चाहेंगे। दूसरी तरफ भाजपा की अब यह कोशिश है कि सोमवार को किसी भी हालत में शक्ति परीक्षण न होने पाये क्योंकि ऐसा होते ही 224 सदस्यीय विधानसभा के भीतर कांग्रेस के उन दस विधायकों की स्थिति ‘सांप- छछूंदर’ जैसी हो जायेगी जो न इधर के रहेंगे और न उधर के रहेंगे। 

सोमवार को होने वाले शक्ति परीक्षण वाले दिन यदि वह सरकार के खिलाफ मत देते हैं तो उन पर दलबदल कानून लागू हो जायेगा और वे छह साल के लिए चुनाव लड़ने के अयोग्य साबित हो जायेंगे क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के अनुसार मंगलवार तक उनकी दलीय स्थिति परिवर्तित नहीं होगी और उन पर अपनी पार्टी का व्हिप लागू होगा। यदि ये दस विधायक सरकार के पक्ष में मत देते हैं तो कुमारस्वामी की विजय होगी और फिर अगले छह महीने तक उनकी सरकार सुरक्षित हो जायेगी क्योंकि किसी भी चुनी हुई सरकार को सदन के भीतर छह महीने में एक बार ही विश्वासमत अर्जित करना होता है लेकिन दूसरी स्थिति में यदि मंगलवार अर्थात 16 जुलाई को विधानसभा  अध्यक्ष के. आर. रमेश कुमार उनका इस्तीफा स्वीकार कर लेते हैं तो उनकी राजनैतिक उपयोगिता विपक्षी पार्टी भाजपा के लिए ही खत्म हो जायेगी क्योंकि अगले छह महीने तक कुमारस्वामी सरकार का तब तक कुछ नहीं हो सकता जब तक कि सत्तापक्ष की तरफ से कुछ और विधायक या तो पाला बदलने अथवा इस्तीफा देने का फैसला न करें। 

इसलिए आज एक और नया मोहरा आगे बढ़ा दिया गया है और कांग्रेस के पांच और विधायकों ने अध्यक्ष पर उनका इस्तीफा स्वीकार न करने का आरोप लगाया है। ये पांच विधायक भी सर्वोच्च न्यायालय पहुंच गये हैं जहां उन्होंने गुहार लगाई है कि अध्यक्ष श्री रमेश कुमार उनके साथ बेइंसाफी कर रहे हैं। इससे मामला फिर से नये पेंचों में फंसता हुआ नजर आ रहा है। यह पेंच यह है कि अध्यक्ष श्री रमेश कुमार प्रत्येक विधायक पर वही पैमाना लागू नहीं कर सकते जो उन्होंने पहले दस विधायकों पर लागू किया है। नये पांच विधायकों में कांग्रेस के ऐसे वरिष्ठ विधायक रोशन बेग भी शामिल हैं जो पिछली कांग्रेस सरकार में महत्वपूर्ण मन्त्री रह चुके हैं।  वह कुछ दिनों पहले ही खुलेआम ऐलान कर चुके हैं कि उनकी अपनी पार्टी के नेताओं से गंभीर मतभेद हैं और उनकी नीतियों के खिलाफ हैं। 

उन्होंने इस्तीफा देने से पहले ही कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल होने की इच्छा व्यक्त की थी। अतः अध्यक्ष को इन नये पांच बागी कांग्रेसी विधायकों के इस्तीफे के बारे में विचार करना पड़ेगा। इन पांच विधायकों के इस्तीफे स्वीकार न करने की शिकायत से अध्यक्ष रमेश कुमार की राजनैतिक मंशा पर भी सवाल खड़े हो गये हैं। अध्यक्ष पद पर बैठे हुए किसी भी विधायक को ‘अराजनैतिक’ भावना से काम करना पड़ता है क्योंकि वही सदन के सभी चुने हुए सदस्यों के अधिकारों व हितों के संरक्षक होते हैं। 

सदन से इस्तीफा देना किसी भी सदस्य का अधिकार है जबकि अध्यक्ष का काम यह देखना है कि इस्तीफा प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से जायज कारणों से दिया गया हो अर्थात उस पर किसी भी प्रकार का दबाव न हो मगर अपनी ही इच्छा के दबाव में यदि कोई विधायक इस्तीफा देता है तो अध्यक्ष उसे किस आधार पर रोक सकते हैं। कांग्रेसी विधायकों के इस्तीफे के पीछे यही मुख्य कारण दिखाई पड़ता है। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण गोवा है जहां कांग्रेस के दस विधायकों ने इस्तीफा दे दिया और उनमें से तीन आज मन्त्री भी बन गये। इस राज्य में तो विपक्ष का नेता तक सत्तारूढ़ पार्टी में शामिल हो गया। इसलिए इस्तीफा देने वाले विधायकों को यह खौफ नहीं है कि सदस्यता समाप्त होने पर उनका भविष्य क्या होगा? 

खतरा कर्नाटक में सिर्फ यह है कि 12 जुलाई से शुरू कर्नाटक विधानसभा के बजट सत्र में यदि सोमवार को शक्ति परीक्षण हो गया तो बागी विधायकों का भविष्य क्या होगा? मगर सियासत में हर पेंच का नया पेंच तैयार करना भी एक फन होता है। इसी वजह से हुनरमन्दों ने नया पेंच पांच और विधायकों के इस्तीफे का निकाल कर अध्यक्ष के सामने ही चुनौती फेंक दी है। उन्हें अपने फैसले के पीछे संवैधानिक तर्क देना पड़ता है। इसकी जांच-पड़ताल सर्वोच्च न्यायालय के दायरे में पहुंच चुकी है और सरकार के बहुमत का फैसला सदन के भीतर ही होना चाहिए, ऐसा निर्देश भी सर्वोच्च न्यायालय का 1994 से ही है। 

अतः कर्नाटक संसदीय लोकतन्त्र के बिल्कुल नये तरीके के नाटक का मुजाहिरा करता नजर आ रहा है जिसमें मुख्यमन्त्री, अध्यक्ष, विपक्ष और न्यायपालिका समानान्तर चल रहे हैं। देखिये क्या परिणाम निकलता है। अभी तो इसके नाटक मंच पर रोज नया किरदार निकल कर आ जाता है।