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धार्मिक भावनाओं को आहत करने की हद

सुप्रीम कोर्ट ने वेब सीरिज तांडव के निर्माता, निर्देशक और  उससे जुड़ी टीम को गिरफ्तारी से अंतरिम संरक्षण प्रदान करने से इन्कार कर दिया है। तांवड के दृश्यों में हिन्दुओं की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने का आरोप है। कामेडियन मुनव्वर फारूकी भी हिन्दू देवी-देवताओं पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने पर कानूनी कार्यवाही का सामना कर रहे हैं। अदालत उन्हें जमानत देने से इन्कार कर चुकी है। फारूकी भी उन कामेडियनों की लम्बी सूची में शामिल हो गए हैं जिन्हें पिछले कुछ सालों के दौरान धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने, मान हानि और अश्लीलता जैसे आरोपों में कानूनी कार्यवाही का सामना करना पड़ा।

इससे पहले कुणाल कामरा, कामेडियन अग्रिमा जोशुआ, तन्मय भट, किकू शारदा भी अपनी टिप्पणियों को लेकर फंस चुके हैं।  एक तरफ लेखक, अभिनेता, हास्य कलाकार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात करते हैं लेकिन सर्वोच्च न्यायालय लगातार कह रहा है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता असीमित नहीं है, उसकी भी सीमाएं हैं। अनुच्छेद 19 (1) देश के नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है लेकिन भारतीय दंड संहिता 1860 की धारा 295-ए के अन्तर्गत वह कृत्य अपराध माने जाते हैं जहां कोई आरोपी व्यक्ति भारत के नागरिकों के किसी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को आहात करने लिए जानबूझ कर और विद्वेषपूर्ण आशय से उस वर्ग के धार्मिक विश्वासों का अपमान करता है या ऐसा करने का प्रयत्न करता है। यह अपमान उच्चारित या लिखित शब्दों या संकेतों द्वारा दृश्य रूपाणों द्वारा किया गया तो यह अपराध बन सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने रामजी लाल मोदी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एआईआर 1957 एससी 620 के मामले में यह स्पष्ट किया था कि भारतीय दंड संहिता 1860 की धारा 295-ए भारत के नागरिकों के एक वर्ग या धर्म या धार्मिक विश्वासों का अपमान करने या अपमान करने का प्रयास करने के हर कृत्य को दंडित नहीं करती है। दूसरे शब्दों में आरोपी का यह ठोस इरादा होना चाहिए कि उसके कृत्य से एक वर्ग की धार्मिक भावनाएं आहत की गई हैं। अनजाने में या लापरवाही के चलते धर्म का अपमान किया जाना आपराधिक कृत्य नहीं होता।

भारत की समस्या यह है कि लोग हर बात को धार्मिक दृष्टिकोण से देेखने लगे हैं और आईपीसी की धारा 295-ए का दुरुपयोग होने लगा है। एक साथ देश के कई शहरों में केस दर्ज करा दिए जाते हैं। वैसे तो इस देश में कानूनों का दुरुपयोग किया जाना कोई नई बात नहीं है। तांडव का विरोध करते-करते कुछ लोगों ने भारत में ईश निंदा कानून की मांग की है। सोशल मीडिया पर ईश निंदा या देव निंदा कानून का ट्रेंड परवान भी चढ़ा। कुछ देश ऐसे हैं जहां पर ईश निंदा कानून पहले से ही है। ये वही देश है जो धर्म की बुनियाद पर बने हैं। इन सब देशों में ईश निंदा कानून के अलावा एक बात बड़ी कॉमन है, लगभग सभी देशों में मानवाधिकार की स्थिति काफी खराब है।  पाकिस्तान में ईश निंदा कानून में मौत या उम्र कैद की सजा का प्रावधान है। इस्लामिक क्रांति से पहले ईरान भी बाकी दुनिया की तरह एक तरक्की पसंद देश था लेकिन इस्लामिक क्रांति के बाद ईरान को एक इस्लामिक गणराज्य घोषित कर दिया है। इसके कारण पल्लवी वंश का अंत हो गया और आयतुल्लाह खोमैनी ईरान के प्रमुख बन गए। 2012 में ईरान में नए सिरे से लाई गई दंड सहिंता में ईश निंदा के लिए नई धाराएं जोड़ दी गईं और इसके तहत धर्म न मानने वाले और धर्म का अपमान करने वाले लोगों के लिए मौत की सजा तय की गई।

मिस्र, मलेशिया, इंडोनेशिया, सऊदी अरब जैसे देशों में भी ईश निंदा कानून है। दुनिया भर में अमेरिका, चीन, कनाडा और कुछ अन्य यूरोपीय और अफ्रीकी देशों को छोड़कर बाकी जगह धार्मिक भावनाओं को लेकर कानून है। फर्क सिर्फ इतना है कि उन्हें लागू करने की सजा देने के तरीके अलग-अलग हैं। ईश निंदा के नाम पर लोगों को मारा जा रहा है। भारत एक ऐसा देश है जिसकी बुनियाद धर्म पर नहीं रखी गई है। भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है, जहां हर धर्म का सम्मान किया जाता है।  हम भारत को कट्टरपंथी राष्ट्र में परिवर्तित नहीं कर सकते। भारत के कानून और कट्टर ईश निंदा कानूनों में काफी फर्क है। भारत का कानून किसी की भी धार्मिक भावनाओं को आहत करने के पीछे की मंशा की जांच करता है। अगर कोर्ट में जानबूझ कर और बुरे आशय की बात सिद्ध नहीं हुई तो इस धारा में केस साबित नहीं किया जा सकता। एक ट्रेंड यह भी बन गया है कि हर कोई हिन्दू धर्म पर निशाना साधने में लगा है, कोई किसी दूसरे धर्म का मजाक उड़ाने की जुर्रत नहीं करता। सोशल मीडिया का दायरा काफी ​विस्तार पा चुका है। हिन्दू धर्म के संबंध में आपत्तिजनक बातें लिखना या धार्मिक चिन्हों का अपमान करना कट्टरपंथी ताकतों के लिए आसान हो गया है। ऐसे कंटैंट आपको आसानी  से मिल जाएंगे। जरूरी नहीं यह काम भारत में रह रहे कुछ कट्टरपंथी कर रहे हों, ऐसा विदशो में स​क्रिय ताकतें भी कर रही हैं। अब समय आ गया है ​कि धार्मिक भावनाओं को आहत करने की हद तय की जाए। अगर ऐसा नहीं किया गया तो भारत की गंगा-जमुनी तहजीब को चोट पहुंचेगी और वातावरण जहरीला होता जाएगा। दूसरी बड़ी बात यह है कि पुलिस को भी ऐसे मामलों की गहराई से जांच करनी होगी, बेवजह के केस दर्ज करने से बचना होगा, जिनको तार्किक निष्कर्ष पर पहुंचाना मुश्किल हो।