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लपटें मारता संसद का शीत सत्र!

संसद का शीतकालीन सत्र जितनी ‘गरमाहट’ के साथ समाप्त हुआ है उससे देश की स्थिति का अन्दाजा लगाया जा सकता है। सच्चे लोकतन्त्र में संसद सड़कों पर व्याप्त वातावरण का ही प्रतिनिधित्व करती है। इस सत्र की केवल 20 बैठकें ही हुईं परन्तु इसमें पारित ‘नागरिकता संशोधन विधेयक’ ने पूरे देश में ऐसी बहस को जन्म दे दिया जिसका सीधा सम्बन्ध भारत की समग्र एकता व अखंडता से है। 

पूर्वोत्तर भारत में जिस तरह इस विधेयक का उग्र विरोध हो रहा है उसकी लपटें दूसरे राज्यों तक कब पहुंचने लगें इस बारे में यकीन से कुछ नहीं कहा जा सकता क्योंकि पंजाब, केरल, छत्तीसगढ़ व प. बंगाल के मुख्यमन्त्रियों ने कह दिया है कि वे इस कानून को अपने राज्यों में लागू नहीं करेंगे। हालांकि यह विधेयक गृह मन्त्रालय का है मगर विदेशों से आने वाले शरणार्थियों की भारत में परिवर्तित हैसियत के बारे में है जिसका परोक्ष सम्बन्ध विदेश मन्त्रालय से भी है अतः यह विषय कानूनी विशेषज्ञों के अधिकार क्षेत्र में चला जायेगा कि केन्द्रीय नागरिकता कानून होने के बावजूद राज्य सरकारें किस तरह से अपने राज्यों में अमल होने से रोक सकती हैं? 

परन्तु चिन्ता का विषय यह है कि इस विधेयक का प्रभाव हमारे विदेश सम्बन्धों पर भी पड़ने लगा है। बांग्लादेश के विदेश व गृह मन्त्री ने अपनी भारत यात्रा रद्द कर दी है। इस देश के विदेश मन्त्री ए.के. अब्दुल मेमन का यह कहना कि नागरिकता विधेयक ने भारत की धर्मनिरपेक्षता की छवि को कमजोर किया है, सामान्य नहीं कहा जा सकता  क्योंकि बांग्लादेश का गठन ही पाकिस्तान की कट्टर इस्लामी नीतियों के विरुद्ध हुआ था जिसमें इस देश के रहने वाले लोगों की बांग्ला भाषा भी एक प्रमुख मुद्दा थी। 

इसके साथ ही जापान के प्रधानमन्त्री शिंजे आबे ने भी गुवाहटी में होने वाली शिखर बैठक रद्द कर दी है, जो प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी के साथ 15 से 17 दिसम्बर तक होनी थी लेकिन इससे भी अधिक चिन्ता की बात यह है कि इस मुद्दे पर भारत के चार राज्यों के मुख्यमन्त्रियों ने जिस तरह विरोध की भाषा बोली है वह लोकतन्त्र के धागे को कमजोर करती है। जीएसटी (माल व सेवा कर) का शुल्क संशोधन करने के लिए इस देश ने 15 से अधिक वर्षों तक इंतजार इसीलिए किया था जिससे प्रत्येक राज्य सहमत हो सके। बेशक यह संविधान संशोधन का मामला था क्योंकि इसमें राज्यों के लगभग समस्त वित्तीय अधिकार केन्द्र द्वारा बनाये गये नये संगठनात्मक ढांचे के पास चले गये थे जिसे ‘जीएसटी कौंसिल’ का नाम दिया गया। 

स्वतन्त्र भारत का यह अभी तक का सबसे बड़ा संविधान संशोधन है क्योंकि प्रत्यक्ष शुल्क निर्धारण का अधिकार संसद से इस कौंसिल को स्थानान्तरित हो गया। यह कार्य राष्ट्रीय एकता  व अखंडता की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण समझा गया, परन्तु नागरिकता विधेयक को सर्वोच्च न्यायालय में तुरन्त ही चुनौती दे दी गई है। पूर्वोत्तर के अधिसंख्य राज्यों में भाजपा के सहयोग से ही सरकारें चल रही हैं परन्तु इन्हीं राज्यों में इस विधेयक का सबसे ज्यादा विरोध हो रहा है।  इसका कारण तो हमें जानना ही होगा कि इन राज्यों में जन आक्रोश क्यों उबल पड़ा है? 

आखिरकार क्या वजह है कि भाजपा शासित राज्य असम में लोग भाजपा के विधायकों के घरों तक को निशाना बना रहे हैं। इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण यह है कि पूरी दुनिया में भारत की प्रतिष्ठा सबसे बड़े लोकतन्त्र के रूप में इसलिए है कि इसका संविधान केवल कोई लिखित कानून का दस्तावेज नहीं है बल्कि यह आर्थिक व सामाजिक बदलाव का कारगर अस्त्र है। इस तरफ राष्ट्रपति पद पर रहते हुए वर्तमान समय के राजनेता (स्टेट्समैन)  माने जाने वाले श्री प्रणव मुखर्जी ने एक नहीं बल्कि कई बार ध्यान दिलाया और चेताया कि इसकी स्वाभाविक गति आगे की ओर ही होनी है। 

इसमें कभी कोई दो राय नहीं हो सकती कि पाकिस्तान, अफगानिस्तान या बांग्लादेश में जिन गैर मुस्लिमों पर उनके धर्म की वजह से अत्याचार किया जाता है और वे भारत में शरण लेना चाहते हैं उन्हें अपनाने में हमें पहल करनी चाहिए। आखिरकार वे अगर भारत में नहीं आयेंगे तो कहां जायेंगे? किन्तु नेपाल जैसे हिन्दू बहुल देश में भी ‘मधेशियों’ की समस्या है, श्रीलंका में तमिलों की समस्या है, जिनमें हिन्दू व मुसलमान दोनों हैं। जहां तक पाकिस्तान का सवाल है यह पूरी तरह नाजायज मुल्क है और इसकी बुनियाद लाखों लोगों की लाशों पर रखी हुई है। धार्मिक आधार पर अत्याचार ही इसके विघटन का ‘कारक’ निकट भविष्य में बनेगा। 

चाहे वहां बलोच हों, पख्तून हों  या सिन्धी हों, सभी किसी न किसी रूप में प्रताड़ना के शिकार हो रहे हैं। हमारी प्रतिष्ठा पूरी दुनिया में गांधी के एेसे देश की है जिसके सामने भारत के टुकड़े होने पर पाकिस्तान के हिस्से में ही गये पख्तून नेता ‘सरहदी गांधी’ खान अब्दुल गफ्फार खान ने कहा था कि ‘बापू आपने हमें किन भेड़ियों के सुपुर्द कर दिया।’ समझने वाली बात यह है कि भारतीय उपमहाद्वीप में रहने वाले लोगों के धर्म बेशक अलग-अलग रहे हैं मगर संस्कृति एक रही है जिसे समन्वित एकनिष्ठ (कम्पोजिट कल्चर) कहा जाता है। कहीं बौद्ध तो कहीं हिन्दू व कहीं इस्लाम धर्म का प्रादुर्भाव जरूर रहा है मगर ये सभी धर्म उसी ताने-बाने से बुनी चादर पर कशीदाकारी की तरह फैले हैं जिसे ईसा से भी पूर्व सम्राट अशोक ने पाटिलीपुत्र से लेकर तेहरान (ईरान) तक बुना था।