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आखिर कब तक बहेगा खून?...

‘‘गीली मेहंदी रोई होगी छुपकर घर के कोने में

ताजा काजल छूटा होगा चुपके-चुपके रोने में

जब बेटे की अर्थी आई होगी सूने आंगन में

शायद दूध उतर आया हो बूढ़ी मां के दामन में।’’

जम्मू-कश्मीर में आतंकवादियों के खिलाफ चल रहे अभियान के दौरान घात लगाकर किए गए हमले में 5 जवानों की शहादत इस बात का स्पष्ट संकेत दे रही है कि सुरक्षा बलों की तमाम कोशिशों के बावजूद आतंकवाद की जड़ें अभी कमजाेर नहीं पड़ी हैं। मुठभेड़ में शहीद जसविन्द्र सिंह, मनदीप सिंह, सरज सिंह, गज्जन सिंह और वैशाख एच शामिल हैं। शहीद गज्जन सिंह सेना की 23 सिख रेजिमेंट में तैनात थे। अभी 4 महीने पहले ही उनकी शादी हुई थी। शहीद की पत्नी हरप्रीत कौर के हाथों में लाल मेहंदी का रंग भी अभी फीका नहीं हुआ था। गज्जन सिंह दस दिनों की छुट्टी पर अपने गांव आने वाले थे कि उनकी शहादत की खबर आ गई। गज्जन सिंह अपनी दुल्हन हरप्रीत कौर को ट्रैक्टर पर लेने आए थे। अब उनके परिवार का क्रन्दन सुनकर गांव वालों का कलेजा फट रहा है। ऐसा ही शोकाकुल माहौल अन्य शहीद जवानों के परिवारों का भी है।

राष्ट्र फिर आक्रोश में है, देेशवासियों का धैर्य फिर टूट चुका है। आखिर कब तक हम पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद झेलते रहेंगे? कश्मीर में कितना खून बहेगा? माएं कब तक अपने बेटों की शहादत देती रहेंगी?

जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद के खात्मे को लेकर जारी कोशिशें जब भी सार्थक मानी जाने लगती हैं, तब-तब आतंकी गिरोह ऐसे हमलों को अंजाम दे देते हैं। वह दुनिया को बताना चाहते हैं कि जम्मू-कश्मीर आतंकवाद मुक्त होने नहीं जा रहा।

इससे पहले आतंकवादियों ने श्रीनगर के ईदगाह इलाके में स्कूल में घुसकर स्कूल प्रिंसिपल सुपिन्दर कौर और उसी स्कूल के शिक्षक दीपक चंद की गोली मार कर हत्या कर दी। इससे पहले एक प्रख्यात कैमिस्ट मक्खन लाल बिंद्रू की गोली मार कर हत्या की गई थी। प्रिंसीपल सुपिंदर कौर और शिक्षक दीपक चंद की हत्या से पहले उनके आई कार्ड देखकर उनकी शिनाख्त पुख्ता की। इन हत्याओं में शहीद किए गए कैमिस्ट और अध्यापक जैसे नोबल पेशे से जुड़े लोगों की हत्या कर देना, जिनका जीवन हर कश्मीरी के जीवन को सुधारने, समाज के लिए समर्पित था, एक सिख महिला शिक्षिका जो घाटी में सिखों को ही नहीं बल्कि हिन्दुओं, मुस्लिमों को सभी को ज्ञान का प्रकाश बांटती थीं, ऐसे निहत्थे लोगों को जान से मार देना यह आखिर कैसा युद्ध अथवा जिहाद है?

वास्तव में आतंकवाद की जटिल समस्या की जड़ें सीमा पार से संचालित हो रही हैं। भारत के अलावा वैश्विक मंचों पर भी ऐसे सवाल लगातार उठाए जाते रहे हैं कि पाकिस्तान स्थित ठिकानों से आतंकवादी गतिविधियां संचालित करते हैं। अफगानिस्तान में पाकिस्तान की आईएसआई और उस द्वारा समर्पित आतंकी संगठनों की कामयाबी के बाद उसने अपनी ताकत कश्मीर में झोंक दी है। उन्होंने घाटी को लहूलुहान करना शुरू कर दिया है। जब से जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाया गया तब से कश्मीर में उथल-पुथल की आशंकी थी लेकिन सुरक्षा बलों ने काफी हद तक शांति स्थापित कर दी थी। कश्मीर में शांति पाकिस्तान को हजम नहीं हुई। अब उसने डबल गेम खेलनी शुरू कर दी है। आतंकवादियों ने चुन-चुन कर सिखों और हिन्दुओं की हत्याएं करनी शुरू कर दी हैं। ये सिलसिलेवार टारगेट किलिंग एक चुनौती है कि आतंकवादी कश्मीर में हिन्दुओं की मौजूदगी नहीं चाहते। पाकिस्तान 90 के दशक का माहौल पैदा करने की कोशिश कर रहा है, तब लाखों कश्मीरी पंडितों को उनकी जन्मभूमि से बाहर कर दिया गया था। दहशत का माहौल पैदा करने की कोशिश की जा रही है। 14 सितम्बर, 1989 को भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष टिक्कू लाल टपलू की हत्या से कश्मीर में शुरू हुआ आतंक का दौर समय के साथ-साथ और विभत्व होता गया। टिक्कू की हत्या के महीने भर बाद भी जे.के.एल.एफ. नेता मकबूल बट्ट को मौत की सजा सुनाने वाले सेवानिवृत्त सैशन जज नीलकंठ गंजू की हत्या कर दी गई और फिर 13 फरवरी,1990 को श्रीनगर के टेलीविजन केन्द्र के निदेशक लासा कौल की निर्मम हत्या के साथ ही आतंक अपने चरम तक पहुंच गया था। घाटी में शुरू हुए आतंक ने धर्म को हथियार बनाया और निशाने पर लिए गए कश्मीरी पंडित। खुलेआम पोस्टरबाजी कर कश्मीरी पंडितों को घाटी खाली करने या फिर मारने की धमकियां दी जाने लगीं। जिन मस्जिदों के लाऊडस्पीकरों से कभी इबादत की आवाज सुनाई देती थी उन लाउडस्पीकरों से कश्मीरी पंडितों के लिए जहर उगला जाने लगा। लगातर तीन दिन तक इन पर नारा लगाया जाता रहा-

‘‘यहां क्या चलेगा निजाम ए मुस्तफा

आजादी का मतलब क्या ला इल्लाह इलल्लाह।’’

फिर शुरू हुआ कश्मीरी पंडितों का घाटी से पलायन। कश्मीरी पंडित अपने ही देश में शरणार्थी हो गए। यद्यपि सुरक्षा बल जवानों की शहादत का बदला आतंकवादियों को मार कर ले रहे हैं लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि हमारे जवानों का खून कब तक बहता रहेगा। गृहमंत्री अमित शाह,राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और सुरक्षा एजैंसियों से जुड़े प्रमुखों ने आतंकवादियों को सबक सिखाने के लिए नई रणनीति पर ​विचार किया है और आतंकवाद को मूल स्रोतों से काटने की तैयारी कर ली है। 

भारतीयों को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह पर पूरा भरोसा है। राष्ट्र महसूस करता है कि भले ही भारत और पाकिस्तान सीमाओं पर युद्ध विराम को सहमत है लेकिन ऐसे युद्ध विराम का कोई फायदा नहीं है। क्या पाकिस्तान पर एक और सर्जिकल स्ट्राइक या फिर युद्ध का समय आ चुका है। उम्मीद है कि यह फैसला सही समय पर राजनीतिक नेतृत्व करेगा।