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इत्र से उठती धन की सुगन्ध

उत्तर प्रदेश में कानपुर व कन्नौज के इत्र व्यापारियों के घर जिस तरह आयकर व अन्य जांच एजेंसियों के छापे पड़ रहे हैं उन्हें लेकर राजनीतिक विवाद अपने चरम पर पहुंच रहा है। इसकी असली वजह यह है कि राज्य में जल्दी ही विधानसभा चुनाव होने वाले हैं जिसकी वजह से राज्य की विपक्षी समाजवादी पार्टी अपना दामन साफ दिखाना चाहती है और इस प्रयास में वह जांच एजेंसियों को सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी का ‘सहयोगी’ तक बता रही है। भारत की राजनीति में ऐसे आरोप पहली बार नहीं लग रहे हैं परन्तु असली सवाल यह है कि इत्र व्यापारियों के घर से बेहिसाब नकद रोकड़ा मिल रहा है। मगर इसके ​लिए जांच एजेंसियों को दोष इसलिए नहीं दिया जा सकता है कि वे अपना कानूनी काम कर रही हैं और बेइमानी से दौलत इकट्ठा करने वालों को पकड़ रही हैं। एजेंसियों के छापे में अकूत दौलत मिल रही है इसलिए उनकी कार्रवाई को पूर्वाग्रह से ग्रस्त नहीं माना जा सकता है। इसके साथ यह भी सत्य है कि चुनावों में जम कर कालाधन खर्च किया जाता है और चुनाव कानूनों के तहत किसी प्रत्याशी के चुनाव पर उसके मित्र व समर्थक जो खर्च करते हैं वह उसकी पार्टी के खर्चे में शामिल नहीं किया जा सकता। 

दरअसल  1974 में जब राजधानी के सदर बाजार लोकसभा चुनाव क्षेत्र से कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवार स्व. अमरनाथ चावला का 1971 में लड़ा। चुनाव जब दिल्ली उच्च न्यायालय ने निर्धारित सीमा से अधिक धन खर्च को लेकर रद्द कर दिया था तो उसके बाद जनप्रतिनिधित्व अधिनियम में संसद में संशोधन किया गया था जिसमें किसी राजनीतिक दल के प्रत्याशी के चुनाव पर उसका मित्र या समर्थक कही जाने वाली संस्था अपनी ओर से कितना ही खर्च कर सकती थी और यह खर्च प्रत्याशी के चुनावी व्यय के हिसाब-किताब से अलग कर दिया गया था। इसके बाद ही भारत में चुनाव लगातार बहुत खर्चीले होते चले गये। दिल्ली उच्च न्यायालय ने 1974 में स्व. चावला का चुनाव रद्द करने का आदेश उनके खिलाफ चुनाव लड़े भारतीय जनसंघ के प्रत्याशी स्व. कंवरलाल गुप्ता की याचिका पर दिया गया था। अतः हमें यह स्पष्ट होना चाहिए कि भारत में चुनावों का तौर-तरीका किस वजह से बदला। इसे देखते हुए अब चुनावों में धन की महत्ता और भूमिका इस कदर बढ़ चुकी है हर राजनीतिक दल ऐसे छिपे हुए (अंडर कवर) समर्थक रखता है जो उसके प्रत्याशियों के चुनाव पर पानी की तरह पैसा बहा सके। अतः कानपुर में पीयूष जैन नाम के जिस इत्र व्यापारी के घर से 194 करोड़ रुपए से अधिक की नकद रोकड़ा नये नोटों के रूप में जब्त हुई है उससे यही सन्देश जा रहा है कि यह धन अन्ततः चुनावों में ही खर्च होना था। मगर इसका दूसरा पहलू बहुत गंभीर है जो भारत के लोकतन्त्र की दयनीय स्थिति को दर्शाता है कि राजनीतिक दल चुनावों की तैयारी करने के लिए स्वयं ही भ्रष्टाचार को बढ़ावा देते हैं जिससे वक्त आने पर उनकी मदद हो सके। मगर समाजवादी पार्टी के नेता श्री अखिलेश यादव ने जिस तरह पीयूष जैन के घर पड़े छापे को भाजपा के समर्थक के ही घर पड़े छापे के रूप में बताने की कोशिश की उससे यह साफ तो हो ही गया कि दाल में कुछ काला जरूर है क्योंकि यदि केन्द्र व राज्य दोनों में ही भाजपा की सरकार है तो वह अपने समर्थक के ही घर पर छापा नहीं डलवाती। मगर इसके बाद श्री यादव की पार्टी के ही एक विधान परिषद सदस्य इत्र व्यापारी पम्पी जैन के घर भी छापा पड़ा और कुछ अन्य इत्र व्यापारियों को भी लपेटे में लिया गया। इसका मतलब यह निकलता है कि जांच एजेंसियां छापा डालने में राजनीतिक संरक्षण को संज्ञान में नहीं ले रही हैं। मगर एक सवाल फिर भी उठता है कि छापे चुनावों से पहले ही क्यों पड़ते हैं? और नोटबन्दी के बाद पीयूष जैन किस प्रकार दो हजार व पांच सौ रुपए के नये नोटों की गड्डियां पाने में सफल रहा। 

पहले प्रश्न का उत्तर वित्तमन्त्री सीतारमण ने दिया कि जांच एजेंसी अपनी गुप्त खबर के आधार पर छापा डालती हैं और दूसरे सवाल का यह उत्तर दिया जा रहा है कि नोटबन्दी 2016 में हुई थी और श्री अखिलेश यादव 2017 तक उत्तर प्रदेश के मुख्यमन्त्री थे। मगर मूल प्रश्न अपनी जगह यह खड़ा हुआ है कि इत्र के कारोबार में इतना धन किस प्रकार बन सकता है कि कोई व्यापारी अपने घर में 194 करोड़ रुपए की रोकड़ा दबा कर बैठा रहे जबकि उसका वार्षिक कारोबार मात्र पांच करोड़ रुपए का ही हो? इसके साथ ही उसके पास से 23 किलो विदेशी छाप वाला सोना भी बरामद हो। इसका सम्बन्ध राष्ट्रीय सुरक्षा से जाकर भी जुड़ता है कि किस प्रकार यह सोना विदेशों से सभी कानूनी अवरोधों को तोड़ते हुए लाया गया। मगर उत्तर प्रदेश की राजनीति को कौन नहीं जानता कि पिछले तीन दशकों से यहां जिस प्रकार जाति मूलक राजनीति का बोलबाला हुआ है उसमें सभी आम जन जीवन से जुड़े मुद्दों को ‘होम’ कर दिया गया है और समूचे समाज को कबायली तर्ज पर हांकने का प्रयास किया गया है। 

आदित्य नारायण चोपड़ा

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