‘निर्भया’ से ‘गुडिय़ा’ तक


हिमाचल की शांत रहने वाली वादियां अशांत हैं। लोग गुडिय़ा के लिये इन्साफ मांग रहे हैं। गुडिय़ा बलात्कार कांड से देवभूमि कलंकित भी हुई है, शर्मसार भी। दिल्ली के निर्भया बलात्कार कांड पर राजधानी समेत पूरे देश में उबाल आ गया था। बर्बर गैंग रेप के बाद आक्रोशित युवा सड़कों पर थे लेकिन सियासत के राजकुमार कहीं नजर नहीं आये थे। गुस्सा इतना था कि युवा रायसीना हिल्स पर राष्ट्रपति भवन के द्वार तक जा पहुंचे थे। निर्भया जैसा बर्बर कांड शिमला के निकट कोटखाई में हुआ। गुडिय़ा की मौत मानवता की मौत है। यह मौत एक मासूम बेटी के अरमानों की मौत है। यह मौत एक लड़की की सिसकती सांसों की मौत है। कोटखाई के जंगल में हवस, हैवानियत और दरिंदगी का ऐसा तांडव मनुष्य के रूप में उन भेडिय़ों ने किया, जिसका शिकार दसवीं में पढऩे वाली गुडिय़ा बनी जो हवस, हैवानियत और दरिंदगी की परिभाषा भी नहीं जानती होगी। जंगल में भेडिय़ों ने एक मासूम की एक-एक सांस को नोच डाला। समाचारों में तो यह भी कहा गया है कि दरिंदों ने मौत के बाद भी उसे नहीं बख्शा। ऐसी घटना पर लोगों का भड़कना स्वत:स्फूर्त प्रतिक्रिया होती है लेकिन घटना के बाद जिस तरीके से पुलिस ने कार्यवाही की, उससे लोगों में संदेह व्याप्त हो गया और लोगों ने थाने पर धावा बोल दिया।

बड़े अफसरों को भागना पड़ा और लोगों ने पुलिसकर्मियों को बंधक बना लिया। पुलिस ने जो लापरवाही दिखाई उससे जनता का कानून से विश्वास उठ गया। हैरानी की बात तो यह है कि इस घटना पर राष्ट्रीय मीडिया भी खामोश रहा। अवार्ड वापिस करने वाले लोग भी खामोश रहे। शिमला से लेकर जंतर-मंतर दिल्ली और मुम्बई में भी इस घटना के विरोध में प्रदर्शन हुए लेकिन कोई खास प्रतिक्रिया नहीं आई। नितीश कटारा हत्याकांड, प्रियदर्शनी मट्टू बलात्कार व हत्याकांड, जेसिका लाल हत्याकांड, रुचिका मेहरोत्रा आत्महत्या कांड, आरुषि मर्डर मिस्ट्री ने लोगों को झकझोरा था, हमने सेलिब्रिटी की अगुवाई में बड़े-बड़े कैंडिल मार्च देखे। इसमें कोई दो राय नहीं कि कैंडिल मार्च भारतीय लोकतंत्र की नई सुबह, अभिव्यक्ति की आजादी का एक नया आयाम है। कैंडिल मार्च इसलिए चर्चित होते रहे हैं क्योंकि इनमें ऐसी हस्तियां शामिल होती रही हैं जो महत्वाकांक्षी हैं और लोकप्रियता के शिखर पर भी होती हैं। इसलिये इन जुलूसों को मीडिया में खूब मौके मिलते हैं। इसलिये जनमत भी तैयार हो जाता है। सवाल यह है कि क्या हिमाचल की गुडिय़ा को इन्साफ दिलाने के लिये जनमत तैयार करने की जरूरत नहीं थी?

कोटखाई मामला पूरी तरह से ब्लाइंड केस था। लड़की के पास मोबाइल तक नहीं था। हिमाचल की पुलिस ने 8 दिन में इस सनसनीखेज मामले का खुलासा तो किया लेकिन हवालात में ही एक आरोपी की हत्या दूसरे आरोपी द्वारा कर दी जाती है। इससे रहस्य गहरा गया। क्या मृतक आरोपी इस घटना के पूरे रहस्य जानता था या फिर वह सरकारी गवाह बनना चाहता था। इससे पहले कि वह कोई राज उगलता उसकी जुबां हमेशा-हमेशा खामोश कर दी जाती है। इस बात की कल्पना तक नहीं की जा सकती कि सामूहिक बलात्कार के दौरान गुडिय़ा की मानसिक व शारीरिक स्थिति क्या रही होगी। तमाम आरोपी न तो हाई प्रोफाइल के हैं और न ही रसूखदार परिवारों से सम्बन्ध रखते हैं। अगर रसूखदार परिवारों से होते तो पुलिस उनका पूरा ख्याल रखती। पुलिस इतनी लापरवाह क्यों रही कि पेशी से एक दिन पहले आरोपी की हत्या को लेकर उठे सवालों के जवाब को लेकर कोटखाई पुलिस स्टेशन के बाहर जन सैलाब इकठ्ठा हुआ और हिंसा हुई। हिमाचल में इस घटना पर सियासत भी हो रही है। विधानसभा चुनावों को देखते हुए इस मुद्दे को गर्म किया जा रहा है।

सवाल वहीं के वहीं खड़े हैं। निर्भया केस के बाद देशव्यापी चर्चा के बाद कड़े कानून बनाये गये, निर्भया के बलात्कारियों को फांसी की सजा सुनाई गई। महिला सुरक्षा के मुद्दे पर बहुत कुछ किया गया। जघन्य अपराधों में लिप्त नाबालिगों को कड़ी सजा दिलाने के लिए भी केन्द्र सरकार ने कानून में संशोधन किया लेकिन न तो महिलाओं के प्रति दरिंदगी रुकी और न ही हिंसा। दिक्कत यह है कि सरकार और पुलिस बलात्कार के मामलों को बड़े सामाजिक संकट की तरह नहीं देख रहीं। जब भी कोई हादसा होता है तो पुलिस उसे किसी इकलौती वारदात की तरह निपटाने की कोशिश करती है और समझती है कि उसका दायित्व पूरा हो गया। कानून तो केवल कागजों में बदलता है। उसे व्यवहार में लाने वाले पुलिस तंत्र का मिजाज रत्ती भर भी नहीं बदला है। पुलिस को संवेदनशील बनाने की कोई पहल की ही नहीं गई। महिलाओं के प्रति दरिंदगी उस मानसिकता की देन है जिसके तहत महिला को केवल मोम की वस्तु समझा जाता है।