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भारत में कोरोना के आँकड़े #GharBaithoNaIndiaSource : Ministry of Health and Family Welfare

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‘मन्दिर’ से लेकर ‘भोज मेट्रो’

आजादी के बाद से भारत में धर्मनिरपेक्षता का अर्थ जिस प्रकार अल्पसंख्यकों विशेषरूप से मुस्लिम समुदाय की धार्मिक भावनाओं के तुष्टीकरण से लगाया गया, उसका मोहजाल अब चौतरफा टूट रहा है और भारतीयता का भाव धर्मनिरपेक्षता को अपने आभा मंडल में समेकित कर रहा है। बेशक कुछ मामलों में इस भावना को भी अतिरंजित करने की ऐसी कोशिशें हुई हैं जिनसे मुस्लिम सम्प्रदाय में रोष पैदा होना वाजिब कहा जा सकता था, खास कर गोरक्षा के नाम पर स्वयं को कानून से ऊपर समझने की हिमाकत अमली परन्तु ऐसे अपवादों को छोड़कर अगर हम राजनीति के समग्र विमर्श को देखें तो हमें वह तबदीली दिखाई पड़ती है जिसकी अपेक्षा हम किसी भी धर्मनिरपेक्ष देश में कर सकते हैं। 

जम्मू-कश्मीर में धारा 370 को समाप्त करने के फैसले को इसके मुस्लिम बहुल राज्य होने से जोड़कर कांग्रेस के नेता व पूर्व गृहमन्त्री श्री पी. चिदम्बरम ने उसी मानसिकता का परिचय दिया था जिसे भारत के बंटवारे के बाद भारत में मुस्लिम वोट बैंक को एक ‘ब्लैंक चेक’ के रूप में भुनाने की तकनीक इस समुदाय के लोगों को केवल मजहबी हकों के दायरे में सीमित रख कर की गई थी। यह सीमा अब टूट रही है और मुस्लिम समुदाय भारत की सामाजिक व्यवस्था में खुद के पिछड़ा रह जाने पर माथा पीटता सा लग रहा है परन्तु मुस्लिम समुदाय के पक्षकार बने लोग अभी भी उसी पुरानी राजनीति को आगे बढ़ाना चाहते हैं जो भारत के मुसलमानों को अलग खांचे में ढाले रहे। 

इस सन्दर्भ में जम्मू-कश्मीर में धारा 370 समाप्त होने के बाद जिस तरह घाटी में मन्दिरों का सर्वेक्षण कराने का विचार केन्द्रीय गृह राज्यमन्त्री श्री जी. किशन रेड्डी ने व्यक्त किया उसके विरोध में इस राज्य के मुख्यमन्त्री रहे नेशनल कान्फ्रेंस के नेता श्री उमर अब्दुल्ला का भड़कना उनकी संकीर्ण सोच का ही इजहार करता है। श्री रेड्डी ने घाटी में बन्द पड़े पांच सौ से अधिक मन्दिरों की व्यवस्था सुचारू करने की ही बात कही है। इस पर उमर साहब को इतना तैश में आने की क्या जरूरत है! उनका तैश में आना तब वाजिब बनता था जब वह छह साल तक इस रियासत के मुख्यमंत्री  रहने के बावजूद घाटी से निकाले गये कश्मीरी पंडितों को वापस उनकी पुश्तैनी जमीन पर लाकर नहीं बसा सके थे क्योंकि वह एक धर्मनिरपेक्ष  राष्ट्र के एक सूबे के वजीरे आल्हा थे। 

मन्दिरों के सर्वेक्षण से उन्हें क्यों शिकायत हो रही है? कश्मीरी संस्कृति की सबसे बड़ी खूबी यही रही है कि इसमें हिन्दू और मुसलमानों के पूजा स्थलों का रखरखाव सभी कश्मीरियों का फर्ज रहा है। उनका मजहब क्या है, इससे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता था। मगर पिछले तीस-चालीस सालों से जिस तरह की सियासत इस सूबे में चल रही है उससे कश्मीरी होने का मतलब सिर्फ मुसलमान बना दिया गया है। यह पूरी तरह तथ्यों और हकीकत के खिलाफ है। उमर साहब को मालूम होना चाहिए कि उनके दादा मरहूम शेख अब्दुल्ला ने 1932 के करीब अपनी पार्टी का नाम पहले ‘मुस्लिम कान्फ्रेंस’ ही रखा था मगर जब उन्हें कश्मीरी तासीर की असलियत का इल्म हुआ तो उन्होंने इसका नाम बदल कर ‘नेशनल कान्फ्रेंस’ रख दिया और कश्मीरी पंडित रहनुमाओं को हमेशा अपने दांये बाजू  रखा। 

यह कैसे मुमकिन है कि कश्मीर की वादियों में इस्लामी तास्सुब को बढ़ाने के लिए जिम्मेदार पाकिस्तानी दहशतगर्द तंजीमों के टुकड़े पर पलने वाले कुछ अलगाववादी नेताओं के षड्यन्त्र को इस सूबे का नक्शा बदल जाने के बावजूद जारी रखा जाये और मुसलमान नागरिकों को अपनी कश्मीरी संस्कृति से अलग होकर जीने के लिए मजबूर किया जाये। इसलिए श्रीनगर में मौजूद ‘शकंराचार्य चोटी’ उसी तरह आबाद और पुर रोशन रहनी चाहिए जैसे वह पहले दहशतगर्दों का साया पड़ने से पहले रहा करती थी। धर्मनिरपेक्षता कभी भी इकतरफा नहीं हो सकती। उसका एहतराम हर पार्टी के सियासत दां को दिल से करना ही होगा। 

मगर क्या कयामत है कि मध्य प्रदेश में भोपाल में शुरू होने वाली मेट्रो रेल परियोजना का नामकरण इस शहर को स्थापित करने वाले राजा भोज के नाम पर करने पर एतराज  कांग्रेस का ही एक विधायक करता है और भूल जाता है कि इस प्रदेश में उसी की पार्टी की सरकार है जिसके मुख्यमन्त्री श्री कमलनाथ हैं। दुर्भाग्य यह है कि यह विधायक एक मुस्लिम है और भोपाल के ही एक चुनाव क्षेत्र से जीत कर आया है।

वह शायद भूल गये कि राज्य में 2018 मंे चुनावों के समय स्वयं कमलनाथ ने ही राज्य की जनता को यह सन्देश दिया था कि उनकी धर्मनिरपेक्षता भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों पर टिकी हुई है जिसमें ‘समानता’ और ‘समादर’ ही लोगों को एक दूसरे से जोड़ते हैं जिसके चलते उन्होंने प्रत्येक ग्राम पंचायत में गौशाला निर्माण का वचन दिया था और ‘भगवान राम के वनवास गमन’ के मार्ग को आकर्षक धार्मिक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने का वचन दिया था और साथ ही भोपाल में मेट्रो रेल शुरू करने का वादा किया था जिससे आधुनिकता और प्राचीन सांस्कृतिक धरोहर उनके राज्य की विकास गति में एक-दूसरे की सहायक बन सकें। 

यदि श्रीकमलनाथ ने भोपाल मेट्रो का नामकरण राजा भोज पर करते हुए इसका शिलान्यास किया है तो इस पर एतराज करने की क्या बात है? यह तो ऐतिहासिक सच है कि भोपाल को महाराजा भोज ने ही अपनी राजधानी बनाकर इसे बसाया था। इसके प्रमाण में ही इस शहर से लगी हुई वह भोजनगरी है जहां विश्व के सर्वाधिक विशाल शिवलिंग की स्थापना भगवान शंकर का मन्दिर है जिसके जलाभिषेक के लिए भी सीढि़यों की आवश्यकता होती है। भोपाल की मूल विरासत का विरोध करना धर्मनिरपेक्षता किसी भी सूरत में नहीं कहला सकता बल्कि इसके विपरीत यह कट्टरता का ही परिचायक होगा। 

विधायक महोदय को यह भी मालूम होना चाहिए कि भोपाल के नवाब ने भी स्वतन्त्रता के समय अपनी इस रियासत का विलय भारतीय संघ में नहीं किया था और खुद को खुद मुख्तार बनाये रखा था। वह इस राज्य की जनता का ही दबाव था कि उन्हें हार कर भारतीय संघ में अपना विलय कबूल करना पड़ा था। अतः भोपाल तो राजा भोज के नाम से ही सदियों से पहचाना जाता रहा है और भविष्य में भी पहचाना जाता रहेगा। हम धर्मनिरपेक्ष तभी कहलायेंगे जब भारत की मिट्टी को माथे पर लगा कर स्वयं को केवल भारतीय पहचानेंगे। जय हिन्द।