हिन्दी को लेकर व्यर्थ का विवाद


हिन्दी को लेकर दक्षिण भारत के कर्नाटक व तमिलनाडु आदि राज्यों में पुन: विरोध के स्वर उठने शुरू हो गए हैं। यह सबसे पहले स्पष्ट होना चाहिए कि भारत की कोई भी भाषा राष्ट्र भाषा नहीं है। स्वतन्त्रता प्राप्ति के उपरान्त हिन्दी को राजभाषा का दर्जा दिया गया और अंग्रेजी को भी इसके साथ यही मान्यता दी गई। भारत जैसे विविधता से भरे देश में हिन्दी को देश की सम्पर्क भाषा बनाने का अभियान आजादी के आंदोलन के समानान्तर ही चल रहा था जिसके चलते हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा देने का आंदोलन भी खड़ा हुआ परन्तु आजाद होते ही हमें पता चल गया कि इसमें कितनी व्यावहारिक दिक्कतें आ सकती हैं और अंग्रेजी के स्थान पर हिन्दी को एकल रूप में स्थापित करने से पूरे देश में भाषाई अराजकता फैल सकती है। इसी वजह से संविधान लागू होने पर जवाहर लाल नेहरू ने यह फैसला किया कि भारत की दो राजभाषाएं अंग्रेजी व हिन्दी होंगी तथा 15 वर्ष बाद केन्द्र के सभी कामकाज को अंग्रेजी के साथ ही हिन्दी में भी करने का प्रचलन होगा।

चूंकि संविधान में हिन्दी को राजभाषा का दर्जा दिया गया था अत: लागू करने की जिम्मेदारी सरकार पर थी परन्तु इस तजवीज का विरोध होने पर भी स्व. नेहरू ने यह प्रावधान किया कि हिन्दी का प्रयोग सरकारी कामकाज में तब से शुरू किया जा सकता है जब से सभी पक्ष इसे लागू करना सुविधाजनक मानें। अत: 1965 में 15 साल पूरे होने पर जब जनवरी महीने में स्व. लाल बहादुर शास्त्री के कार्यकाल में केन्द्र ने हिन्दी में भी कामकाज करने के लिए अधिसूचना जारी की तो इसका दक्षिण भारत समेत विभिन्न गैर हिन्दी भाषी राज्यों में भारी विरोध हुआ जिसके जवाब में उत्तर भारत के हिन्दी भाषी राज्यों में अंग्रेजी विरोधी आंदोलन चला। दोनों ही आंदोलन उग्र होते चले गए मगर बीच में ही पाकिस्तान से युद्ध छिड़ जाने के बाद यह आंदोलन ठंडा हो गया परन्तु श्री शास्त्री की मृत्यु हो जाने पर केन्द्र की सत्ता स्व. इन्दिरा गांधी के हाथ में आ जाने पर यह आंदोलन पुन: भड़क उठा और तब इसका इलाज श्रीमती गांधी ने ‘त्रिभाषा फार्मूला’ देकर ढूंढा और समस्या का दीर्घकालीन समाधान कर दिया।

इसके साथ ही उन्होंने राजभाषा विधेयक में भी संशोधन किया परन्तु अब पुन: यह विवाद सिर्फ इसलिए खड़ा हो गया है कि केन्द्र ने हिन्दी के उपयोग को बढ़ावा देने के लिए निर्देश जारी किया परन्तु इसे लेकर अति उत्साह का वातावरण देश में बनाने की कोशिश की गई जिसकी वजह से दक्षिण भारत के कर्नाटक व अन्य राज्यों में तनाव बढ़ गया। विभिन्न स्थानों के नाम हिन्दी में भी लिखने पर आपत्ति होने लगी विशेषकर बंगलूरु में मैट्रो स्टेशनों के नाम कन्नड़ के साथ हिन्दी में भी लिखने पर आपत्ति हुई और सड़कों ने नाम पट्ट भी तमिलनाडु आदि राज्यों में हिन्दी में लिखने की शुरूआत हुई। इससे इन राज्यों के लोगों को यह आभास हुआ कि केन्द्र की सरकार फिर से उन पर हिन्दी लादने की कोशिश कर रही है। हमें यह सोचना चाहिए कि त्रिभाषा फार्मूले ने भाषा विवाद हमेशा के लिए निपटा दिया था। इसे फिर से हवा देकर हम भारत की एकता में व्यवधान पैदा कर सकते हैं। दक्षिण भारत के लोगों में हिन्दी सीखने की ललक स्वत: ही 1966 के बाद से बढ़ी है। इन राज्यों के लोग भी अब समझने लगे हैं कि देश के विभिन्न राज्यों में रोजी-रोटी की तलाश करने में हिन्दी एक महत्वपूर्ण कड़ी का काम करती है जबकि उत्तर भारत के लोगों में यह ललक आज तक नहीं जगी है।

इनमें दक्षिण भारत की भाषाएं सीखने के लिए कभी उत्साह नहीं देखा गया। इसके कई सामाजिक-आर्थिक कारण हैं। हमें अति उत्साह में कोई भी कार्य इस तरह नहीं करना चाहिए कि संयुक्त भारत के लोग एक-दूसरे को भाषाई आधार पर नफरत की नजर से देखने लगें। केन्द्र सरकार के सभी कार्यालयों में हिन्दी व अंग्रेजी का उपयोग देश के सभी राज्यों में मान्य है। इसका कहीं कोई विरोध नहीं है मगर हमें लोगों के जीवन के उन क्षेत्रों में भाषाई दखलंदाजी से बचना होगा जो उनकी व्यावहारिक जरूरतों का अभिन्न हिस्सा है। किसी भी भाषा का भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि उसका रोजी-रोटी से क्या सम्बन्ध है। हिन्दी का यह सम्बन्ध राजभाषा विधेयक कायम करता है। इसी वजह से तमिलनाडु में हिन्दी पढऩे में वहां के छात्रों की रुचि बढ़ी है।

इसके साथ ही हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि भारत में सात सौ बोलियां व भाषाएं बोली जाती हैं। इनमें से अधिकांश की कोई लिपि भी नहीं है। जिन भारतीय भाषाओं की लिपियां हैं उनमें से अधिकतर को हमने अपनी आधिकारिक भाषा स्वीकार किया हुआ है। अत: व्यर्थ का विवाद बढ़ाने से कोई लाभ नहीं होगा बल्कि उसके उलट हम विकास के मार्ग से भटक जाएंगे। बेशक हिन्दी सबसे सरल और वैज्ञानिक भाषा है और देश के सबसे बड़े हिस्से में बोली-पढ़ी जाती है मगर यह अपना रास्ता आर्थिक विविधीकरण के जरिये स्वयं ही बना लेगी, ठीक उसी प्रकार जिस तरह हिन्दी सिनेमा ने अपनी जगह दक्षिण भारत में बनाई है।