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अनाथ बच्चों के सपनों को पंख दें

कोरोना महामारी ने अब तक 41,43,615 लोगों की जान ले ली है। इसका सबसे ज्यादा असर उन बच्चों पर पड़ा जो इस दौर में अनाथ हुए हैं। करीब एक लाख 90 हजार बच्चे भारत के हैं, जिन्होंने कोरोना काल में अपने माता-पिता दाेनों को खोया या फिर किसी एक को खोया। हालांकि मेडिकल हब बन चुके देशों की तुलना में भारत में अनाथ बच्चों की संख्या कम है। द लैंसेट में प्रकाशित एक अध्ययन में कहा गया है कि कोरोना महामारी के 14 महीनों में पूरी दुनिया में 1 लाख 63 हजार बच्चों ने कम से कम एक माता-पिता या संरक्षक या दादा-दादी या अन्य रिश्तेदार की मृत्यु का अनुभव किया।

विशेषज्ञों का अनुमान है कि भारत में मार्च 2021 से अप्रैल 2021 के बीच अनाथालयों में बच्चों की संख्या में 8.5 गुना वृद्धि हुई है। इन बच्चों के स्वास्थ्य और सुरक्षा पर गहरा अल्पकालिक और दीर्घकालिक प्रतिकूल प्रभाव पड़ने का खतरा है। समाज से गहरे जुड़े विशेषज्ञों ने चिंता व्यक्त की है कि माता-पिता के खोने से बच्चों में असुरक्षा के साथ बीमारी, शारीरिक शोषण, यौन हिंसा और किशोर गर्भावस्था का खतरा बढ़ सकता है।

इसमें कोई संदेह नहीं कि केन्द्र और राज्य सरकारों ने अनाथ हुए बच्चों के सपनों को पंख देने के लिए अनेक तरह की घोषणाएं की हैं। राज्य सरकारों द्वारा उन्हें 12वीं कक्षा तक निशुल्क शिक्षा, मासिक भत्ता और युवा होने पर एकमुश्त राशि देने का ऐलान किया। सभी राज्यों ने अनाथ बच्चों के लिए अनुकरणीय योजनाओं की शुरूआत की है लेकिन अनाथ बच्चों के लिए व्यवस्था करना आसान नहीं है। केन्द्र सरकार ने भी पीएम केयर्स फॉर चिल्ड्रन योजना के तहत अनाथ बच्चों को सहायता राशि देने का ऐलान किया है। ऐसे बच्चों को फ्री एजुकेशन दी जाएगी और आयुष्मान भारत के तहत 5 लाख का हैल्थ बीमा दिया जाएगा। 23 वर्ष की आयु होने पर दस लाख रुपए भी दिए जाएंगे।

सुप्रीम कोर्ट ने एनसीपीसीआर से अनाथ बच्चों के आंकड़े मांगे थे लेकिन एनसीपीसीआर की संख्या भी पूरी तस्वीर बयान नहीं करती। होम आइसोलेशन में हुई मौतें या कोविड जनित किसी और कॉम्पिलकेशन से हुई मौतों को सरकार कोविड से हुई मौतों में नहीं गिन पा रही, ऐसे में सरकारी आंकड़ा और भी संदिग्ध हो जाता है। कुछ नि​जी अस्पतालों ने मौतों को कोरोना से हुई मौतों को रिकार्ड पर लिया ही नहीं और परिजन भी बगैर कागजी कार्रवाई के शवों को अस्पतालों से सीधे श्मशान लेकर अंत्येष्टि करने में लगे हुए थे। लोगों की मौत प्रशासन के लिए एक आंकड़ा होता है लेकिन उन परिवारों से पूछिये, उन बच्चों से पूछिये जिन्होंने अपनों को खोया है। अनुमान है कि अनाथ बच्चों का गैर आधिकारिक आंकड़ा तीन लाख तक पहुंच सकता है।

अनाथ बच्चों को संभ्रात नागरिक बनाना केवल सरकाराें की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि हमारा भी मानवीय दायित्व है। यह समस्या किसी एक के बूते नहीं सुलझ सकती। इसके​ लिए सामाजिक चेतना जनजागरण और जागरूकता की जरूरत होगी। अनाथ बच्चों में अनेक बच्चे ऐसे होंगे जो आर्थिक रूप से पिछड़े या गरीब परिवारों के होंगे। ऐसे में बाल श्रम की समस्या बढ़ सकती है। यद्यपि बाल श्रम अधिनियम 1986 के तहत ढाबों, घरों, होटलों में बाल श्रम करवाना दंडनीय अपराध है। इसके बावजूद लोग बच्चों को काम देते हैं क्योंकि कम मजदूरी देनी पड़ती है। पहले ही देश में बाल श्रम की समस्या बनी हुई है। सबसे बड़ी समस्या तो अनाथ हुए बच्चों को चिन्हित करने की है। अनाथ हुए बच्चों पर ह्यूमैन ट्रैफिकिंग का खतरा मंडरा रहा है। इसलिए जिला अधिकारियों को बच्चों को चिन्हित करने का काम जल्दी से जल्दी पूरा करना चाहिए लेकिन मृत्यु प्रमाण पत्रों पर माैत की वजह न लिखे जाने, ग्रामीण इलाकों में योजनाओं की जानकारी न होने से सरकारी योजनाएं जरूरतमंद बच्चों से दूर हो जाएंगी। इसलिए समाज को चाहिए कि वह आसपास के क्षेत्रों में निगरानी करें और कोई भी बच्चा जिन्होंने माता-पिता को खोया है उसकी जानकारी प्रशासन को दें। किसी भी बच्चे को अनाधिकृत रूप से गोद लेना कानूनी जुर्म है। अगर आप किसी बच्चे को गोद लेना चाहते हैं, यह सब कायदे कानून के तहत ही होना चाहिए। सरकार की योजनाओं का फायदा इनके असली हकदारों को मिलना चाहिए अन्यथा सरकारी नाव कागज वाली ही सिद्ध होगी। अनाथ बच्चे अक्सर अपराध की राह पर चल पड़ते हैं अथवा अपराधिक गिरोह इन बच्चों से भीख मंगवा सकते हैं। अनाथ बच्चों के पुनर्वास की जिम्मेदारी समाज की भी है। बच्चों का मन बहुत कोमल होता है। विपरीत परिस्थितियों की बुरी छाप उनके मन-मस्तिष्क पर न रहे इसके लिए काउंसलिंग की जरूरत होगी। धनाढ्य परिवारों को आगे बढ़कर इन बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी लेनी चाहिए। निसंतान दम्पत्ति कानूनी रूप से गोद लेकर बच्चों का भविष्य संवार सकते हैं। ऐसे बच्चों के लिए आवासीय विद्यालय बनाए जाने चाहिए। बाल गृहों की व्यवस्था को मजबूत बनाया जाना चाहिए। आइये हम सब मिलकर अनाथ बच्चों के सपनों को पंख दें ताकि वे अच्छे नागरिक बने।

आदित्य नारायण चोपड़ा

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