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भारत के लोकतन्त्र की जय

जो लोग हाल ही में घटित अमेरिका के डोनाल्ड ट्रम्प प्रायोजित उग्र व हिंसक प्रदर्शन की घटनाओं की भारत में समानताएं तलाशने की कोशिश कर रहे हैं वे मूल रूप से घनघोर निराशावादी लोग हैं जिन्हें इस देश के लोकतन्त्र की अन्तर्निहित अपार और सुगठित तेजोमय शक्ति का आभास नहीं है। भारत इसलिए गुलाम नहीं रहा कि इसके लोग कमजोर थे बल्कि इसलिए गुलाम रहा कि छोटी-छोटी रियासतों में बंटे इसके सामन्ती शासक एक-दूसरे  को अपना जानी दुश्मन मानते थे और अपनी रियाया के साथ गुलामों जैसा व्यवहार करते थे, अंग्रेजों ने इस खामी का लाभ उठाते हुए ही भारत के लोगों पर दो सौ साल तक शासन किया इसमें आम लोगों की कोई गलती नहीं थी परन्तु अंग्रेजों की दासता से मुक्ति के लिए महात्मा गांधी ने जो ऐतिहासिक व क्रान्तिकारी कार्य किया वह आम लोगों में स्वाभिमान व आत्मसम्मान की रक्षा का भाव जगाने का किया जो लोकतन्त्र का ‘स्थायी भाव’ होता है। अतः अमेरिका में जो विगत 6 जनवरी को हुआ उसकी प्रतिध्वनी भारत में कभी नहीं सुनी जा सकती क्योंकि स्वयं अमेरिका ने ही अपने संस्थापक ‘जार्ज वाशिंगगटन’ की दिखाई राह पकड़ कर फैसला दिया कि उनके देश का राष्ट्रपति भी संविधान से ऊपर नहीं है और केवल संविधान ही किसी भी व्यक्ति के शासन में वास्तविक शासनकर्ता है।

 अमेरिका की पहचान ट्रम्प समर्थक चन्द हुड़दंगबाज हिंसक आन्दोलकारियों से नहीं बल्कि उपराष्ट्रपति ‘माइक पेंस’ के प्रदर्शनों के चलते इस बयान से होगी कि वह राष्ट्रपति ट्रम्प के गुलाम नहीं हैं बल्कि उस संविधान के प्रति  निष्ठावान हैं जिसे सुरक्षित व संरक्षित रखने की उन्होंने शपथ ली हुई है। जहां तक भारत का सन्दर्भ है तो हम इसके लोकतन्त्र की अजीम ताकत का एहसास 1977 में तभी कर चुके हैं जब देश पर इमरजेंसी लागू करने वाली स्व. प्रधानमन्त्री ने इसे समाप्त कर स्वयं ही देश में चुनाव कराने का आदेश दिया था। इन चुनावों में करारी हार के बाद ही इंदिरा गांधी को आभास हुआ था ​िक सत्ता के गरूर में वह कितनी बड़ी गलती कर गई थीं अतः उन्होंने पुनः लोकतान्त्रिक व अहिंसक रास्ते से जनता के बीच अपने विचारों को फैला कर 1980 में विजय पाई थी। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इसी अमेरिका में राष्ट्रपति पद पर विजयी हुए चुने राष्ट्रपति जो बाइडेन ने अपने प्रशासन के लिए अभी तक चार भारतीय मूल के अमेरिकी विशेषज्ञों का चयन किया है जबकि उपराष्ट्रपति श्रीमती कमला हैरिस स्वयं इसी वर्ग से आती हैं। यह कुछ और नहीं बल्कि भारत की धरती की लोकतन्त्र की खुशबू है जो अमेरिका तक में अपनी सुगन्ध फैला रही है।

भारत का लोकतन्त्र और इस देश के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी एेसे प्रतिमान हैं जिनके समक्ष पूरी दुनिया आज झुकती नजर आ रही है मगर यह कार्य विदेशों में बसे भारतीयों ने ही अपने पुरुषार्थ से किया है। अतः यह पुरुषार्थ भारत में कभी विफल नहीं हो सकता। प्रवासी भारतीयों के सम्मेलन में प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी ने इसी सिद्धांत का उद्घोष किया है जिसकी वजह से लोगों में राजनीतिक व्यवस्था के प्रति आस्था मजबूत हो रही है। एक तथ्य और ध्यान देने योग्य है कि स्थायी लोकतन्त्र में केवल जनता की इच्छा ही किसी भी पार्टी के शासन को स्थायी भाव देती है। इसी वजह से कहा जाता है कि इस प्रणाली में जनता ही लोकतन्त्र की मालिक होती है। अमेरिका में डोनाल्ड ट्रम्प गलती कर बैठे और उन्होंने जनता की इच्छा के विपरीत शासन पर कब्जा जमाने की असफल कोशिश की परन्तु लोकतन्त्र के विभिन्न स्थायी स्तम्भों और संस्थानों ने इस तरह प्रयास किया जैसे सभ्य समाज में किसी निर्वस्त्र (नंगे) व्यक्ति को पकड़ लिया जाता है।

 विश्व पटल पर देखें तो जिस देश में भी भारतीय मूल के लोग बहुतायत में हैं वहीं उन्होंने लोकतन्त्र को फलने-फूलने में मदद दी। चाहे फिजी हो या मारीशस सभी में भारतीय मूल के लोगों ने लोकतन्त्र को मजबूत करने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है। हकीकत तो यह भी है कि पाकिस्तान जैसे इस्लामी देश में भी अन्ततः लोकतान्त्र को तरजीह दी गई हालांकि यहां का लोकतन्त्र पूरी तरह आधा-अधूरा है और धर्म परक है। इसके साथ इंडोनेशिया भी इस्लामी मुल्क है मगर इसकी आजादी से लेकर लोकतन्त्र स्थापना में भी भारतीय मूल के लोगों की अहम भूमिका रही। अतः भारत में  लोकतन्त्र की जय निर्विवाद रूप से होती रहेगी विवादों के होते रहने से इस पर कोई फर्क नहीं पड़ता है।