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सोने का कारोबार और बजट

वित्तमन्त्री श्रीमती निर्मला सीतारमन ने अपने बजट में वैसे तो कई चौंकाने वाले फैसलों का खुलासा किया है मगर सोने पर आयात शुल्क घटा कर उन्होंने सर्राफा व्यापारियों को आश्चर्य में डाल दिया। इसके साथ ही उन्होंने देश में ‘हाजिर स्वर्ण एक्सचेंज’ अर्थात ‘वायदा बाजार’ का गठन करने की योजना का भी इरादा जता कर साफ कर दिया कि इस बहुमूल्य धातु की तस्करी के रास्ते भविष्य में इस तरह बन्द कर दिये जायेंगे कि घरेलू बाजार मे सोने की कीमत अन्तर्राष्ट्रीय बाजार के भावों के ही करीब रहे (आयात शुल्क व अन्य करों के अलावा) भारत पूरे विश्व में सोने का सर्वाधिक आयात करने वाला देश है। यह लगभग प्रतिवर्ष 900 टन सोना आयात करता है, मगर कोरोना काल में अप्रैल से अक्तूबर महीने तक इसमें 47 प्रतिशत की कमी दर्ज हुई थी। हालांकि इसके भाव इस दौरान लगातार तेजी पर रहे। इसकी वजह मानी जा रही थी कि सोने की तस्करी आवक में वृद्धि होती गई जबकि डालर के मुकाबले रुपये की कीमत 70 से 75 रुपए प्रति के बीच घूमती रही। 

वित्तमन्त्री ने स्वर्ण धातु पर आयात शुल्क 12.5 प्रतिशत से घटा कर 7.5 प्रतिशत कर दिया मगर इस पर ढाई प्रतिशत कृषि शुल्क या अधिभार भी लागू कर दिया। यह अधिभार सोने की आयातित कीमत को प्रभावित नहीं करेगा क्योंकि यह अधिशुल्क भारत के स्वर्ण व्यापारियों को सरकार को देना होगा, वस्तुतः सोने की कीमत डालर के भाव से जुड़ी रहती हैं क्योंकि इसका आयात विदेशी मुद्रा में ही किया जाता है, अतः डालर का भाव बढ़ने पर सोना तेज हो जाता है और इसके भाव गिरने पर नरम पड़ जाता है, परन्तु इस पर तट कर या आयात शुल्क की दर अधिक होने से इसकी तस्करी को बढ़ावा मिलता था जिससे सरकार को भारी राजस्व हानि होती थी। कोरोना काल ‘अप्रैल से लेकर अक्तूबर’ महीने तक यह भी आश्चर्य रहा कि भारत में सोने की मांग घटी मगर इसके दाम बढ़े। ये विरोधाभासी तेवर तब रहे इस दौरान शेयर बाजार भी लगातार चहकता रहा और इसका सूचकांक ऊपर चढ़ता रहा। यह एक प्रकार से खुले बाजार की अनियमितता को ही दिखाता है क्योंकि एक सरल नियम यह होता है कि जब शेयर बाजार ऊपर चढ़ता है तो स्वर्ण बाजार ढीला पड़ने लगता है। इसकी वजह निवेश होता है जो कि अधिक व तुरत मुनाफा कमाने की गरज से किया जाता है। तेज होते शेयर बाजार में अक्सर बड़े निवेशक सोना बेच कर शेयर बाजार में निवेश कर देते हैं।

 भारत में चांदी का हाजिर कारोबार तो किया जाता है मगर सोने का ऐसा व्यापार नहीं होता। हाजिर सोना वायदा बाजार की जरूरत भारत की अर्थव्यवस्था के बाजार मूलक चक्र में प्रवेश करने के बाद से ही की जा रही थी जिसका सम्बन्ध मुद्रा परिवर्तनीयता से भी जा कर जुड़ता है। अभी तक रुपया चालू खाते में ही  परिवर्तनीय है। बाजार मूलक अर्थव्यवस्था वैश्विक अर्थव्यवस्था का अभिन्न अंग बन जाती है जिसकी वजह से सम्बन्धित देश की मुद्रा का अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा के बदले पूर्ण परिवर्तनीय बनाने का तर्क दिया जाता है। भारत में भी इसकी आवश्यकता डा. मनमोहन सिंह के वित्तमन्त्री रहते ही 1994-95 में महसूस की गई थी और तब उन्होंने एक विशेषज्ञ समिति का गठन भी किया था जिसने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि रुपये को पूर्ण परिवर्तनीय ( पूंजीगत खाते- कैपिटल अकाऊंट में )बनाने से पहले भारत में लन्दन स्वर्ण एक्सचेंज की तर्ज पर वायदा बाजार खोलने की जरूरत पड़ेगी। इस समिति की रिपोर्ट के बारे तफ्सील से लिखना यहां संभव नहीं है मगर ‘सार’ यह है कि ‘डालर- सोना व रुपया’ तीनों का गहरा अन्तरंग संबंध ही रुपए के पूर्ण परिवर्तनीय बनाने मे निर्णायक भूमिका निभा सकते है।  इस वास्तविकता को ध्यान में रखते हुए यहा जा सकता है कि भारत में हाजिर सोना वायादा बाजारों के गठन का इरादा जता कर श्रीमती निर्मला सीतारमन ने दूर की कौड़ी फैंकी है। इससे भारत में सोने के भाव सीधे अन्तर्राष्ट्रीय बाजार के भावों से तो जुड़ेंगे ही बल्कि कुछ मायनों में उसके भावों को भी प्रभावित करने की हैसियत में आ सकते हैं। रुपये की पूर्ण परिवर्तनीयता का विचार भी भारत मे सोने के प्रति दीवानगी को देखते हुए ही रखा गया था क्योंकि इस धातु में किया गया निवेश मृत निवेश माना जाता है जिसका गतिशील उत्पादन चक्र से कोई लेना-देना नहीं होता।

 भारत प्रति वर्ष 14 अरब से 15 अरब डालर का स्वर्ण आयात करता है। यह विदेशी मुद्रा परोक्ष रूप से सरकार को ही मुहैया करानी पड़ती है। जबकि रुपये के पूर्ण परिवर्तनीय होने पर यह जिम्मेदारी समाप्त हो जायेगी। दूसरी तरफ शेयर बाजार में किया गया निवेश अर्थव्यवस्था के गतिमान चक्र में तुरन्त प्रवेश करके सकल विकास वृद्धि दर मेंय योगदान देता है। इसीलिए शेयर बाजर के भाव और सोने के भाव विलोमानुपाती नजरिये से देखे जाते हैं। वित्तमन्त्री के बजट का अब आर्थिक पंडित विश्लेषण कर रहे हैं और इसकी समालोचना भी कर रहे हैं। यहां तक कि कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पूर्व वित्तमन्त्री श्री पी. चिदम्बरम ने भी यह स्वीकार किया है कि इस बजट के बनाने में ‘दिमाग का इस्तेमाल  किया गया है मगर दिल का नहीं’ यह टिप्पणी स्वयं में बजट को तर्कशील बताती है। बेशक बजट के कई नकातारात्मक पक्ष भी हो सकते हैं मगर जहां तक अर्थव्यवस्था को गतिमान बनाने के नियामकों का सवाल है वे समय की कसौटी पर खरे उतरते दिख रहे हैं।