गोल्फ क्लब : मध्ययुगीन मानसिकता


हम यूरोपीय और अन्य देशों में प्रवासी भारतीयों के साथ नस्ली भेदभाव पर चिन्ता व्यक्त करते हैं। जब किसी भारतीय के साथ बुरा व्यवहार होता है या उसे दोयम दर्जे के नागरिक की तरह अपमानित किया जाता है तो समूचे भारत में पीड़ा महसूस की जाती है। नस्लभेद की घटनाएं मानव समाज के लिए काफी दु:खद हैं लेकिन आजादी के 70 वर्ष बाद दिल्ली के गोल्फ क्लब में भारतीयों ने ही मेघालय की महिला ताइलिन लिंगदोह को इसलिए अपमानित किया कि वह परम्परागत पोशाक जैनसेम पहनकर वहां गई थी। वह अपनी पोशाक से नौकरानी जैसी लगती थी। जैनसेन पहनकर वह लन्दन, संयुक्त अरब अमीरात और कई देशों में घूम चुकी है लेकिन कहीं उसको अपमानित नहीं किया गया लेकिन राजधानी दिल्ली के अभिजात्य गोल्फ क्लब के मैनेजर ने उसे बाहर जाने को कह दिया। अंग्रेजों के शासनकाल में भारतीयों के साथ ऐसा व्यवहार किया जाता था।

गोल्फ क्लब प्रकरण यह दिखाता है कि हम अंग्रेजों की अभिजात्य मानसिकता से आजाद नहीं हो पाए हैं। ब्रिटेन में एक सिख दम्पति को ब्रिटिश बच्चे को गोद लेने की अर्जी दत्तक एजेंसी ने खारिज कर दी। इस पर हमें तकलीफ हुई लेकिन अपने देश में ही भारतीय महिला से दुव्र्यवहार अशोभनीय है। अंग्रेजों द्वारा भारत को आजाद किए जाने के बाद यहां की सामाजिक व्यवस्था में काफी बदलाव आया है। हम सब सामाजिक रूप से समान हो रहे हैं। बरसों से चले आ रहे पूर्वाग्रह समाप्त हो रहे हैं। सामाजिक व्यवस्था में समानता के लिए हमने लम्बा रास्ता तय किया है और अभी भी हमें बहुत सफर तय करना है। एक स्वतंत्र देश में मध्ययुगीन मानसिकता को कतई सहन नहीं किया जा सकता।

प्राइवेट क्लबों, निजी पार्टियों में ड्रैस कोड होते हैं जहां नियमों का पालन किया जा सकता है लेकिन किसी परम्परागत पोशाक पहने महिला को बाहर जाने को कहना असभ्यता है। इस देश की विडम्बना है कि ताइलिन लिंगदोह के साथ जो हुआ, वह भारत की सामाजिक व्यवस्था में कहीं न कहीं बैठा हुआ है। हम किसी के व्यक्तित्व का आकलन उसके रंग, उसकी हैसियत के आधार पर करते हैं। ताइलिन लिंगदोह को सोंधी दम्पति ने अपने बच्चे राघव की देखभाल के लिए नियुक्त किया था, खासी महिलाएं बच्चों के लालन-पालन में दक्ष मानी जाती हैं। ताइलिन ने कई बच्चों का लालन-पालन किया है जो अब काफी बड़े हो चुके हैं। उनके भी आगे बच्चे हो चुके हैं। सब उन्हें पूरा सम्मान देते हैं। सोंधी दम्पति ने भी पिछले 10 वर्षों से उन्हें अपने साथ परिवार के सदस्य के तौर पर रखा हुआ है। जब भी दम्पति विदेश जाता है तो ताइलिन भी उनके साथ जाती है।

इस प्रकरण का सुखद पहलु यह है कि ताइलिन लिंगदोह के अपमान की जानकारी उन्हें काम पर रखने वाली निवेदिता बरठाकुर सोंधी ने सोशल मीडिया पर दी। गोल्फ क्लब में उन्हें जिन लोगों ने आमंत्रित किया था, उन्होंने भी ताइलिन को परिवार का हिस्सा मानकर ही बुलाया था लेकिन गोल्फ क्लब को यह गवारा न हुआ कि एक नौकरानी अपनी मालकिन के साथ बैठकर एक मेज पर खाना खाए। निवेदिता को भी ताइलिन से किया गया व्यवहार अच्छा नहीं लगा तभी तो उसने सोशल मीडिया पर इसकी जानकारी दी। सोशल मीडिया पर जब तूफान उठा तो गोल्फ क्लब ने आनन-फानन में इस पर माफी मांग ली। जांच के लिए कमेटी बैठा दी लेकिन सवाल वहीं के वहीं खड़े हैं।

आखिर सभ्य समाज में ऐसी मानसिकता क्यों सामने आती है? कौन से ऐसे पूर्वाग्रह हैं जो सभ्य समाज में बाधक बन रहे हैं। कभी पूर्वोत्तर की महिलाओं पर अश्लील टिप्पणियां की जाती हैं, कभी उन्हें अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है, कभी मारपीट की जाती है। कभी दक्षिण अफ्रीकी देशों के छात्रों से मारपीट की जाती है, कभी उन्हें काला बन्दर कहकर पुकारा जाता है। भारत में हो रही ऐसी घटनाओं को सोशल मीडिया के जरिये दुनिया भर में शेयर किया जा रहा है, जिसका नुक्सान देश को उठाना पड़ सकता है। भारत के लोग अगर गुलामी के दौर की मानसिकता या मध्ययुगीन मानसिकता के साथ जीते रहेंगे तो सामाजिक व्यवस्था में बराबरी का हक कैसे मिलेगा? क्या किसी मेड को सार्वजनिक स्थल पर जाने से इसलिए रोका जा सकता है कि वह मेड है। ऐसी घटनाओं का विरोध किया ही जाना चाहिए।