अलविदा लालबत्ती का हूटर

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भारत में लालबत्ती संस्कृति राजनीतिक धौंस का पर्याय बनती जा रही थी और इसकी आड़ में छुटभैये राजनीतिज्ञ समाज में आतंक जैसा माहौल कायम करने में भी कभी-कभी सफल हो जाते थे। लालबत्ती की गाड़ी लेने में विभिन्न राज्यों के राजनीतिक लोगों में भागमभाग लगी रहती थी और इसके लिए वे कोई भी रास्ता अख्तियार करने तक के लिए तैयार रहते थे। शासन के रौब-दाब का प्रतीक बनी लालबत्ती लगी मोटर कार आम जनता में उसमें सवार व्यक्ति के लिए सम्मान की जगह दहशत का भाव जगाने लगी थी परन्तु ऐसा नहीं है कि देश के सर्वोच्च संवैधानिक पदों पर आसीन अति विशिष्ट व्यक्तियों की गाडिय़ों पर लगी लालबत्ती से आम जनता को कोई परेशानी होती हो या उनके प्रति असम्मान का भाव जागृत होता हो। राष्ट्रपति, प्रधानमन्त्री या मुख्य न्यायाधीश की गाडिय़ों पर लालबत्ती लगे होने से आम जनता को कोई शिकायत नहीं रही मगर राज्यों में जिस प्रकार राजनीतिक दलों ने अपनी सत्ता में आने पर लालबत्ती की गाड़ी को विशेषाधिकार सम्पन्नता का प्रतीक बनाया उससे आम जनता को भारी परेशानी भी होती थी और गुस्सा भी आता था। इसकी मुख्य वजह लालबत्ती की गाड़ी का राजनीतिकरण होना था। राज्यों में सरकार बदलने पर जिस तरह लालबत्ती की गाडिय़ों की संख्या मेंं बढ़ौत्तरी होती थी उससे आम जनता को हैरानी भी होती थी और परेशानी भी। अत: केन्द्रीय परिवहन मन्त्री नितिन गडकरी ने जिस मोटर वाहन नियम में संशोधन करके लालबत्ती को विशिष्ट व्यक्तियों की गाडिय़ों से गायब करने की व्यवस्था की है उसका कठोरता से अनुपालन राज्यों में सबसे पहले किये जाने की जरूरत है। यह केन्द्रीय नियम है अत: राज्यों में लागू करने पर इसमें दिक्कत नहीं आयेगी किन्तु बिहार जैसे गैर-भाजपा शासित राज्यों के मन्त्रियों ने इस नियम के विरुद्ध आवाज उठाई है और कहा है कि राज्यों को अपने मोटर-वाहन नियम बनाने का अधिकार होना चाहिए। यह पूरी तरह गलत और गैर-संवैधानिक है। सबसे पहले यह समझा जाना चाहिए कि भारत कोई संघीय राज्य नहीं है जिसमें राज्यों को अपना अलग-अलग संविधान बनाने की इजाजत है बल्कि यह राज्यों का संघ है जिसमें केन्द्र की सत्ता प्रमुख है। हमारे संविधान में केन्द्रीय सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची इसीलिए बनाई गई है जिससे प्रत्येक राज्य की विशिष्ट आवश्यकताओं के मुताबिक शासन चलाते हुए नागरिकों को मूल सुविधाएं प्रदान की जायें। ये सूचियां नागरिकों को अधिकार सम्पन्न बनाने के लिए हैं न कि राजनीतिज्ञों को। हमारे संविधान में केन्द्र अपने अधिकारों को राज्यों को देकर उन्हें सशक्त करता है जिससे आम जनता का जीवन सुधर सके। अत: राज्यों को यह गलतफहमी नहीं पालनी चाहिए कि संशोधित मोटर वाहन नियम से उन्हें निजात मिल सकती है। नये नियम में तो राष्ट्रपति, प्रधानमन्त्री और मुख्य न्यायाधीश तक को दायरे में लेकर साफ सन्देश दे दिया गया है कि चाहे कोई मुख्यमन्त्री हो या केन्द्रीय कैबिनेट का मन्त्री, सभी को अपनी गाडिय़ों से आगामी 1 मई से लालबत्ती हटानी पड़ेगी। यह फैसला प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी की पहल पर लिया गया है जिन्होंने पिछले दिनों ही भारत यात्रा पर आयीं बंगलादेश की प्रधानमन्त्री शेख हसीना वाजेद का दिल्ली हवाई अड्डे पर बिना किसी तामझाम के पहुंच कर स्वागत किया था। उससे यह सन्देश तो चला गया था कि प्रधानमन्त्री की गाड़ी भी बिना लालबत्ती के दिल्ली की सड़कों पर यातायात के नियमों का पालन करते हुए निकल सकती है। अत: किसी भी राज्य के मुख्यमन्त्री को फिर डर किस बात का हो सकता है मगर असली मुद्दा ऐसे अति विशिष्ट बने व्यक्तियों का है जो जोड़-तोड़ करके लालबत्ती की गाडिय़ां लेते थे और फिर समाज व पुलिस में अपना रौब गांठते फिरते थे। ऐसे लोग तो सड़कों पर अराजकता का माहौल तक बनाने से बाज नहीं आते थे। इसकी आड़ में असामाजिक तत्व भी ऐसे कारनामे कर जाते थे जिनसे कानून-व्यवस्था की रखवाली पुलिस तक को बाद में दांतों के नीचे अंगुली दबानी पड़ती थी। हूटर बजाते हुए लालबत्ती लगी गाडिय़ां सारे नियम-कानून तोड़ कर आम जनता में दहशत फैलाने का काम करती थीं। जो लोग वास्तव में विशिष्ट व्यक्ति हैं उन्हें लाल बत्ती की जरूरत थी ही नहीं क्योंकि उनका रुतबा किसी प्रकार के दिखावे की मांग नहीं करता है। अंग्रेजों द्वारा अपनी अलग पहचान बनाये रखने की गरज से ऐसी व्यवस्था लागू की गई थी जिसका आंखें मूंदकर हम स्वतन्त्र भारत में पालन किये जा रहे थे। 2013 में सर्वोच्च न्यायालय ने लालबत्ती संस्कृति पर अंकुश लगाने की जरूरत बताई थी मगर राजनीतिक दल इसे दरकिनार किये जा रहे थे।

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