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​दिल्ली के ‘निर्माताओं’ की सरकार

भारत का जो लोकतांत्रिक ढांचा बाबा साहेब अम्बेडकर ने आजाद भारत के लोगों को सौंपा है वह केवल एक कानून की किताब नहीं है बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में बराबरी की हिस्सेदारी तय करने वाला ऐसा शाहकार है जिसमें आम आदमी स्वयं कह उठे कि उसका ही शासन उस पर लागू है। इसलिए संविधान को स्वीकार करने वाले कोई और नहीं बल्कि ‘हम भारत के लोग हैं।’ 

भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। लोकतंत्र जनता का जनता के लिए जनता द्वारा चुना गया शासन होता है। अगर जनता द्वारा चुनी गई सरकार जनता से​ विमुख हो जाती है तो उसका कोई अर्थ नहीं रह जाता। सरकारों का सीधा संबंध जन सरोकारों से होता है। सरकारों का दायित्व है कि वह जन कल्याण को सर्वोपरि मानें बल्कि राज्य के नागरिकों का सम्मान भी करें जो किसी न किसी तरह समाज के विकास और कल्याण में अपनी भूमिका निभा रहे हों। 

आप संयोजक अरविन्द केजरीवाल ने ​लगातार तीसरी बार दिल्ली के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। उनके साथ मंत्रियों ने भी शपथ ली। शपथ ग्रहण समारोह में दिल्ली शासन में योगदान करने वाले विभिन्न क्षेत्रों के 50 प्रतिनिधियों ने नए मंत्रिमंडल के साथ मंच सांझा किया, जिनमें डाक्टर, आटो चालक, फरिश्ते योजना के तहत सड़क दुर्घटना में लोगों की मदद करने वाले आम लोग, बस कंडक्टर, सफाई कर्मचारी, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता शामिल थे। 

शपथ ग्रहण समारोह में उन सभी लोगों को बुलाया गया जिन्होंने बेहतर दिल्ली का सपना देखा है। इन्हें दिल्ली के निर्माता का नाम दिया गया। सशस्त्र बल, अग्निशमन विभाग और दिल्ली पुलिस के शहीद हुए जवानों के परिजनों को भी शपथ ग्रहण समारोह में आमंत्रित किया गया था। आप पार्टी ने ​दिल्ली के निर्माताओं का सम्मान कर एक नई परम्परा की शुरूआत की है जो अपने आप में एक मिसाल है। प्रायः यह देखा जाता रहा है कि समाज के विभिन्न क्षेेत्रों में उल्लेखनीय भूमिका निभाने वालों को सम्मानित करने का काम सामाजिक और सांस्कृतिक संस्थाएं करती हैं लेकिन सम्मानित किए जाने के कार्यक्रमों में बहुत विसंगतियां आ चुकी हैं। 

समृद्ध लोग तो बड़ी आसानी से सम्मान पा लेते हैं लेकिन समाज में हाशिये पर खड़े लोग उल्लेखनीय सेवाएं देने के बावजूद सम्मान से वंचित रह जाते हैं। सामाजिक और सांस्कृतिक संगठन पहले से ही लोकप्रिय लोगों को प्राथमिकता देते हैं, जिनकी पहुंच मीडिया तक होती है। शपथ ग्रहण समारोह में मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल के साथ मंच सांझा करने वाले लोगों ने कभी कल्पना भी नहीं की होगी कि उन्हें कोई राज्य सरकार ऐसा सम्मान देगी।  आप सरकार ने ऐसा करके लोकतंत्र की परिभाषा को ही सार्थक किया है। 

कोई समय था जब ​ख्याति प्राप्त लोग ही पदम सम्मान प्राप्त कर लेते थे बल्कि सम्मान पाने के लिए कई तरह की सिफारिशें भी लगवाते थे। लेकिन केन्द्र की मोदी सरकार ने अब समाज के उन लोगों को पदम सम्मान देने की परम्परा की शुरूआत की है, जिन्होंने ​मीडिया की नजरों से दूर रहकर भी समाज के उत्थान के लिए अहम भूमिका निभाई है। शपथ ग्रहण समारोह में सरकारी स्कूलों के शिक्षकों को बुलाने का आदेश दिए जाने पर विवाद हो जाने पर आम आदमी पार्टी ने अपना फरमान वापस ले ​लिया था। 

फरमान वापस लेना भी सही फैसला था क्योंकि इससे समारोह में अनावश्यक ग्रहण न लगे। अरविन्द केजरीवाल ने शपथ ग्रहण समारोह में दूसरे राज्यों के मुख्यमंत्रियों या पार्टी नेताओं को न्यौता ही नहीं दिया। याद कीजिये बेंगलुरु की उस फोटो को, जब कुमारस्वामी के शपथ ग्रहण समारोह के दौरान सोनिया गांधी, मायावती, ममता बनर्जी, अखिलेश यादव, केजरीवाल और वामपंथी नेता एक मंच पर हाथ थामे खड़े थे। इससे पहले पटना की तस्वीर भी दिखाई दी थी, जब नीतीश कुमार के शपथ ग्रहण समारोह में कांग्रेस समेत विपक्षी नेताओं को बुलाया गया था। 

मंच पर लालू यादव के ठीक बगल में अरविन्द केजरीवाल भी अनमने तरीके से खड़े थे। अरविन्द केजरीवाल को अहसास हुआ कि फोटो खिंचवाने में कोई लाभ नहीं होने वाला। इसलिए उन्होंने पुराने दोस्तों से किनारा कर जनता को प्राथमिकता दी। उन्होंने विपक्षी एकता से किनारा कर काम की राजनीति का फार्मूला पकड़ लिया। जिसका फायदा आप पार्टी को मिला। 

लोकतंत्र में वही राजनीतिक दल सफल होते हैं जिनको जनता सहारा देती है। जो राजनीतिक दल जनता का सम्मान नहीं करते, उनकी भावनाओं से खिलवाड़ करते हैं, उनका हश्र बहुत बुरा होता है। जनाधार का विकास वही पार्टी करती है जो जनता को प्यार दे और उसके बदले में जनता भी उसे प्यार दे। इसमें कोई संदेह नहीं कि अरविन्द केजरीवाल ने दिल्ली का बेटा बन सियासत की है। दिल्ली के लोगों को लग रहा है कि राजधानी की सरकार उनकी अपनी सरकार है। संविधान का पालन करते हुए हम जो भी विजय प्राप्त करेंगे वही लोगों की विजयी होती है।

आदित्य नारायण चोपड़ा