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गुरुदासपुर का 'गुरुमंत्र'

पंजाब के गुरुदासपुर लोकसभा चुनाव क्षेत्र में कांग्रेस प्रत्याशी श्री सुनील जाखड़ की शानदार जीत से इतना तो तय हो गया है कि केन्द्र में सत्तारूढ़ भाजपा की सरकार के खिलाफ आम पंजाबियों में सुगबुगाहट का माहौल है मगर लोकतन्त्र में जो पार्टी या राजनीतिक नेतृत्व आम लोगों की बुद्धिमत्ता को कम करके आंकने की कोशिश करता है वह अंत में पछताता है। बेशक गुरुदासपुर में भाजपा सांसद श्री विनोद खन्ना की मृत्यु से खाली हुए स्थान को भरने के लिए उपचुनाव हुआ मगर यह सीट भाजपा की ऐसी पक्की सीट मानी जाती थी जहां से उसे परास्त करना लोहे के चने चबाने के समान समझा जाता था। दीपावली से पूर्व सत्तारूढ़ दल के लिए यह शुभ संकेत किसी भी कीमत पर नहीं माना जा सकता परन्तु इससे इतना सन्देश जरूर जाता है कि लोकतन्त्र एक पक्षीय वार्तालाप का नाम नहीं है। इसमें दोनों तरफ से बातचीत खुली रहनी चाहिए अर्थात आम जनता की प्रतिक्रिया और उसका मन भी सरकारी नीतियों के बारे में बीच-बीच में जरूर लिया जाता रहना चाहिए। इसके साथ ही केरल में विधानसभा की एक सीट पर भी कांग्रेस समर्थित संयुक्त मोर्चे के प्रत्याशी की जीत से साफ है कि इस राज्य में भाजपा व माक्र्सवादियों के बीच जो संघर्ष का माहौल है उससे आम नागरिक जरा भी प्रभावित नहीं है और वह इस लड़ाई का आकलन अपनी नजर से ही कर रहे हैं।

गुरुदासपुर का चुनाव परिणाम इसलिए बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण है कि यह राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा व कांग्रेस की स्थिति का विश्लेषण करता है। यह कहा जा सकता है कि भाजपा का कांग्रेसमुक्त भारत का सपना केवल नारा ही रह सकता है क्योंकि आम जनता अभी भी कांग्रेस को ही भाजपा के ठोस विकल्प के रूप में देखने से गुरेज नहीं कर रही है। इसके साथ ही क्षेत्रीय दलों के मुकाबले कांग्रेस की स्थिति इस वजह से भी मजबूत हो रही है कि पिछले लोकसभा के आम चुनावों में स्वयं भाजपा ने क्षेत्रीय दलों को अप्रासांगिक बताकर राष्ट्रीय राजनीति में इनकी भूमिका किसी व्यापारी की तरह निरुपित करने में हिचकिचाहट नहीं दिखाई थी।

अत: इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है कि आम आदमी पार्टी को गुरुदासपुर के लोगों ने पूरी तरह खारिज कर दिया हालांकि उपचुनावों को राष्ट्रीय स्तर पर आम जनता के रुख का प्रतीक नहीं माना जा सकता मगर संकेत जरूर कहा जा सकता है। यह संकेत इसलिए और भी महत्व रखता है कि केवल डेढ़ महीने बाद ही दो राज्यों हिमाचल प्रदेश व गुजरात विधानसभा के चुनाव होने हैं। इन दोनों राज्यों में कांग्रेस व भाजपा की एक-एक में सरकारें हैं। इससे यह प्रतिफल जरूर निकाला जा सकता है कि दोनों ही राज्यों में कांटे की टक्कर होगी और भाजपा अब इस भ्रम में नहीं रह सकती कि प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता के सहारे वह वैतरणी पार करती जायेगी। हालांकि लोकसभा उपचुनावों में राष्ट्रीय नेताओं के चुनाव दौरा करने की परंपरा नहीं रही है मगर सभी पार्टियां अपने राष्ट्रीय नेताओं की लोकप्रियता को भुनाने का कोई अवसर नहीं छोडऩा चाहतीं और उनके नाम पर ही चुनाव प्रचार की गाड़ी खींचती हैं लेकिन सबसे ऊपर जो माहौल देश के राजनीतिक धरातल पर अब बनता दिखाई पड़ रहा है उसमें असली टक्कर में कांग्रेस व भाजपा ही रहती दिखाई पड़ रही हैं। लोकतन्त्र के लिए यह शुभ संकेत इसलिये कहा जा सकता है कि क्षेत्रीय दल राष्ट्रीय फलक के व्यापक दृष्टिकोण को संकीर्ण बनाने से गुरेज नहीं करते हैं। पंजाब में अकाली दल की भूमिका को भी इससे अलग करके नहीं देखा जा सकता है।