मोदी सरकार ने इसी वर्ष 2018 से हज यात्रा पर जाने वाले मुस्लिम नागरिकों को दी जाने वाली मदद समाप्त करने का फैसला किया है। यह निर्णय केन्द्र सरकार के उस फैसले की मंशा की अगली कड़ी है जिसे उसने 2012 में सर्वोच्च न्यायालय में जाहिर किया था। उस वक्त न्यायालय ने इस मदद को अगले दस सालों यानि 2022 तक पूरी तरह खत्म करने की ताईद भी की थी मगर हकीकत में यह एेसी मदद नहीं थी जिसे मजहबी तौर पर सीधी इमदाद कहा जा सके। यह सरकार का एेसा कदम था जिससे हज करने के लिए सऊदी अरब जाने वाले भारतीय मुसलमानों को लम्बे सफर में पेश आने वाली मुश्किलात से बचाते हुए बेहद जरूरी सुविधाएं मुहैया कराई जा सकें। 1973 तक हज की यात्रा पानी के जहाज से ही की जाती थी और सारी सुविधाएं इसी जरिये के सफर के लिए 1959 में ‘हज कानून’ के जरिये तय की गई थीं। यह हज कानून अंग्रेजी हुकूमत के दौरान 1932 में बनाए गए ब्रिटिश हज कानून का ही संशोधित रूप था।

अंग्रेजों ने अपनी हुकूमत के दौरान सऊदी अरब में हज करने के लिए जाने वाले अपनी हुकूमत में आने वाले दक्षिण एशियाई देशों के मुसलमानों के लिए मुम्बई और कोलकाता दो एेसे केन्द्र बनाये जहां से पानी के जहाज सऊदी अरब भेजे जा सकें मगर अंग्रेजों ने मुसलमान हज यात्रियों के लिए इंग्लैंड की कम्पनी ‘टमर मोरीसन’ के जहाजों को यह जिम्मा दिया और इसका नाम ‘मुगल शिपलाइन’ रखा। इन जहाजों के जरिये सफर को कम खर्चीला बनाने के लिए इंतजाम भी किए गए। आजाद भारत में यह दस्तूर जारी रहा और 1954 से भारतीय जहाजों के जरिये यह सफर पूरा कराया जाने लगा जिसके लिए 1959 में सरकार ने पुराने हज कानून में संशोधन किया मगर 1973 में पानी के जहाज से हज यात्रा पर जाते हुए एक जहाज की दुर्घटना हो गई जिसमें 39 यात्री मारे गए। इसके बाद हज यात्रा को हवाई सफर से पूरा करने का फैसला किया गया और 1959 के हज कानून में जरूरी संशोधन भी किया गया। तब केन्द्र की इंदिरा सरकार ने तय किया कि हाजियों को सऊदी अरब के जेद्दा शहर तक ले जाने का जिम्मा एयर इंडिया को दिया जाएगा और हर साल हज पर जाने वाले यात्रियों का कोटा सऊदी अरब की सरकार से बात करके पहले की तरह तय होता रहेगा।

बढ़े हुए हवाई टिकट की भरपाई सरकार इस तरह करेगी कि मुम्बई से जेद्दा तक हवाई जहाज को भर लेकर जाने वाली एयर लाइन को वापस मुम्बई खाली लौटने से जो नुक्सान होगा उसकी भरपाई हो सके और हवाई जहाज का किराया भी किफायती रहेगा। इसके साथ ही हज के लिए जाने वाले यात्रियों की मदद के लिए सरकार मुम्बई या दिल्ली जैसी खास जगहों पर थोड़े वक्त के लिए ठहरने व खाने–पीने के इंतजाम भी देखेगी जिससे हवाई जहाज पकड़ने तक उन्हें कोई दिक्कत न हो मगर हज मदद के नाम पर जो भी रकम सरकार देती थी उसमें से 96 फीसदी इंडियन एयर लाइन या एयर इंडिया को ही जाता था मगर 1984 से इस मामले में अंगुलियां उठनी शुरू हो गई थीं और बाद में कुछ मुस्लिम संगठनों तक ने मांग करनी शुरू कर दी थी कि हवाई किराये को जिस तरह बढ़ाकर सरकारी हज मदद दी जा रही है उससे बेहतर होगा कि सरकार हज यात्रियों को हवाई जहाज से ले जाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय टैंडर निकाले जिससे दुनिया की दूसरी एयर लाइनें अपने-अपने हवाई किरायों में प्रतियोगिता कर सकें। इस तरह जो भी हवाई यात्रा पर खर्चा आएगा उसे मुस्लिम नागरिक खुद पूरी तरह उठाकर हज पर जाने से गुरेज नहीं करेंगे। इसकी वजह उन्होंने यह बताई कि हज मदद के नाम पर भारत के हिन्दुओं में यह भ्रम फैलाया जा रहा है कि सरकार उन्हें अपनी धार्मिक यात्रा के लिए बहुत बड़ी मदद दे रही है जबकि हकीकत में एेसा नहीं है।

फिलहाल पिछले साल कुल 700 करोड़ रुपए केन्द्र ने हज मदद पर खर्च किए। तकरीबन डेढ़ लाख से ज्यादा लोग हज पर गए। इसमें से साठे छह सौ करोड़ रुपए से ज्यादा की मदद एयर इंडिया व सऊदी एयर लाइन को मिली (एयर इंडिया के साथ सऊदी एयर लाइन भी हज यात्रियों को लाने-ले जाने का काम करने में लग चुकी है।) असल में हज मदद का जितना शोर मचता रहा है उसे देखते हुए यह पूरा मामला केवल यात्रा सौजन्य का ही था, इससे ज्यादा कुछ नहीं। भारत से बाहर अपने धर्म के अनुसार यात्रा पर जाने वाला हर नागरिक भारतीय ही होता है और उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी से सरकार पल्ला नहीं झाड़ सकती। फिर भी किसी खास धर्म की यात्रा पर दी जाने वाली मदद से भारत की धर्मनिरपेक्ष सरकार को दूर ही रहना चाहिए जिससे उस पर किसी खास वर्ग के तुष्टीकरण का आरोप न लग सके और इस पर राजनीति न हो सके। क्योंकि धर्म भारत में किसी भी नागरिक का व्यक्तिगत मामला है मगर अपने नागरिकों की धार्मिक स्वतन्त्रता का सम्मान करना भी सरकार का काम होता है। इसी वजह से पाकिस्तान में जब सिख जत्थे विभिन्न गुरुद्वारों की यात्रा पर जाते हैं तो सरकार उनका नियमन करके जरूरी मदद देती है और कैलाश- मानसरोवर की यात्रा समेत विभिन्न हिन्दू तीर्थ स्थलों की यात्रा को भी वह सुगम बनाने का काम करती है। इन सभी कामों में विभिन्न सरकारी अमलों का प्रयोग भी किया जाता है।