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भारत में हिजाब की मानसिकता

इंटरमीडियेट या 12वीं  स्तर तक के विद्यालयों में मुस्लिम छात्राओं द्वारा हिजाब पहन कर जाने के कथित अधिकार के सन्दर्भ में दाखिल सभी पांच याचिकाओं को कर्नाटक उच्च न्यायालय ने खारिज करते हुए फैसला दिया है कि हिजाब न तो इस्लाम धर्म का अनिवार्य अंग है और न ही इसके न पहनने से किसी प्रकार के धार्मिक अधिकार का हनन होता है और न ही यह निजता या शिक्षा के मूल नागरिक अधिकार का हनन है। वास्तव में यह ऐसा एतिहासिक फैसला है जिसका समर्थन सबसे पहले मुस्लिम समाज के ही प्रगतिशील व आधुनिक विचारों के लोगों द्वारा किया जाना चाहिए और इसमें भी स्वयं मुस्लिम महिलाओं को आगे बढ़ कर अपने समाज की नई पीढ़ी की छात्राओं को रोशन खयाल बनाना चाहिए। हिजाब की रस्म को जिस तरह मजहबी चोला पहना कर इस्लाम के मुल्ला और फतवा ब्रिगेड के लोगों ने मुस्लिम महिलाओं पर नाजिल किया हुआ है वह केवल महिलाओं को पुरुषों से निचले पायदान पर रख कर देखने की ही एक साजिश के अलावा और कुछ नहीं है। महिलाओं में स्वयं को पुरुषों से कमतर समझने की जहनियत पैदा करने की गरज से ही यह रवायत शुरू की गई और इसे धार्मिक चोला पहना दिया गया। 

भारत में यह कार्य बहुत ही करीने से मुल्ला ब्रिगेड द्वारा मुसलमानों को अलग पहचान देने के लिए किया गया जिससे उनका धार्मिक शोषण किया जाता रहे और उनके दिमाग को संकीर्णता के दायरे में ही कैद किया जा सके। यह बहुत सामान्य और साधारण सा नियम है कि किसी भी देश में किसी भी व्यक्ति का खान-पान व उसकी वेशभूषा वहां की जलवायु पर ही निर्भर करती है और उसकी भाषा भी क्षेत्रीय संस्कृति से ही सुनिश्चित होती है। इसी वजह से हम देखते हैं कि दक्षिण के राज्यों के मुसलमानों की भाषा तमिलनाडु में तमिल, कर्नाटक में कन्नड़, केरल में मलायलम व आन्ध्र प्रदेश में तेलगू होती है। वेशभूषा के स्तर पर भी इन राज्यों के हिन्दू व मुसलमानों में 1857 तक कोई खास अन्तर नजर नहीं आता था परन्तु इसी वर्ष भारत में ईस्ट इंडिया कम्पनी के खिलाफ हुए विद्रोह (प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम) के बाद अंग्रेजों ने सर सैयद अहमद खां की इस नसीहत पर चलना शुरू किया कि वे अपनी फौज में हिन्दू व मुसलमानों की अलग-अलग रेजीमेंट बनायें और हिन्दू व मुसलमानों में दोस्ती होने से रोकें और इनकी विषमताओं का उपयोग अपनी हुकूमत को मजबूत बनाने में करें। यह एतिहासिक तथ्य है कि इसके बाद दक्षिणी राज्यों की तरफ उत्तर प्रदेश से कट्टरपंथी मुल्ला मौलवियों को भेजा गया जिससे दक्षिण के मुसलमानों में धार्मिक कट्टरता को बढ़ावा दिया जा सके। ये मुल्ला मौलवी दक्षिण जाकर मुस्लिम महिलाओं को बुर्के में रहने की हिदायतें देते थे मगर इन राज्यों की जलवायु के कारण इसे मान्यता नहीं मिल सकी मगर इतना जरूर हो गया कि मुस्लिम औरतों को उनके पुरुष परिवार वालों ने हिजाब पहनने के लिए बाध्य किया। मगर मुल्ला ब्रिगेड के विषवमन ने 1940 तक आते-आते दक्षिण के मुसलमानों को भी पाकिस्तान की मांग के समर्थन में खड़ा होने के लिए प्रेरित कर दिया था। 23 मार्च 1940 को लाहौर में मुहम्मद अली जिन्ना ने कथित पाकिस्तान के निर्माण के बारे में मुस्लिम लीग की तरफ से जो प्रस्ताव रखा था उसके समर्थन में दक्षिण भारत के राज्यों से भी कई मुस्लिम नेता आये थे और उन्होंने वहां अपनी तकरीरें दी थीं। खासतौर से मालाबार तटीय इलाके व तमिल क्षेत्र से। कहने का मतलब सिर्फ इतना सा है कि भारतीय मुसलमानों में सांस्कृतिक, भाषाई व वेशभूषा गत अलगाव पैदा करके इस्लामी मुल्ला ब्रिगेड और उलेमाओं ने पाकिस्तान के निर्माता मुहम्मद अली जिन्ना को वह ताकत बख्श दी जिससे 1947 में भारत का विभाजन केवल हिन्दू व मुसलमान के आधार पर ही हो गया। अतः हिजाब के मसले को अगर हम केवल वेशभूषा या पहनावे के अधिकार की दृष्टि से देखेंगे तो जबर्दस्त गलती करेंगे और स्वतन्त्र भारत में भी द्विराष्ट्रवाद की मानसिकता को ही पोषित करने का जुर्म करेंगे।

 हिजाब केवल कोई कपड़े का टुकड़ा नहीं है बल्कि एक मानसिकता है जो मुसलमानों को अन्य भारतीयों से अलग दिखाने का एेलान है। इस तर्क से वे कथित उदारवादी या धर्मनिरपेक्षता के कथित अलम्बरदार आंखें तरेरेंगे जो मानवीय अधिकारों के नाम पर आजकल तिरंगा झंडा लेकर चिल्लाने लगते हैं मगर इसके विपरीत सबसे पहले इन्हीं का दायित्व बनता है कि वे मुस्लिम समाज को मजहब के नाम पर दकियानूसी बनाये जाने की बेड़ियों को तोड़ें और इस समाज की महिलाओं के सशक्त बनने का रास्ता प्रशस्त करें। 

कर्नाटक उच्च न्यायालय की जिस तीन सदस्यीय पीठ ने फैसला दिया है उनमें एक न्यायाधीश स्वयं मुस्लिम महिला जैबुन्निसा मोइयुद्दीन काजी हैं। बहुत सामान्य सी बात है जो हर हिन्दू-मुसलमान की समझ में आसानी से आ जायेगी कि इंटरमीटियेट तक हर विद्यालय के छात्र के लिए वर्दी या यूनिफार्म इसीलिए रखी जाती है कि किशोरावस्था तक प्रत्येक विद्यार्थी बिना किसी धार्मिक या आर्थिक भेदभाव के एक जैसे वातावरण में तालीम हासिल कर सके। मगर मुस्लिम छात्राओं के लिए हिजाब क्यों जरूरी हो जबकि यह यूनिफार्म का हिस्सा न हो। क्या केवल इसलिए कि ये छात्राएं अलग से ही पहचानी जा सकें कि वे मुसलमान हैं। इससे छात्राओं में ही हम क्या सन्देश देंगे? क्या स्कूली स्तर पर ही उन्हें हिन्दू-मुसलमान में नहीं बांट दिया जायेगा। यह लोकतन्त्र की कैसी बराबरी है जो छात्राओं को ही हिन्दू-मुसलमान में विभक्त करके समूचे राष्ट्र की एकता का आह्वान करती है। हमारा संविधान व्यक्तिगत रूप से या निजी आधार पर धार्मिक स्वतन्त्रता की गारंटी देता है मगर भारत किस दरवाजे पर माथा फोड़े जब स्वतन्त्र भारत में ही हिन्दू-मुसलमानों के बीच फर्क को जाहिर करने के लिए मुसलमानों के लिए पृथक नागरिक आचार संहिता (पर्सनल लाॅ) को लागू करने की संवैधानिक व्यवस्था कर दी गई जिसकी वजह से इस समाज के लोगों खास कर महिलाओं के निजी मौलिक अधिकार गुलामी के ही पैरोकार बन कर रह गये। यही वजह है कि हिजाब जैसे मसले को मुस्लिम समाज के कट्टरपंथी अपना मजहबी हक मानने की गुस्ताखी कर रहे हैं और 21वीं सदी की भारतीय मुस्लिम किशोरियों की जहनियत को कट्टरपंथी रवायतों का गुलाम बना देना चाहते हैं। वरना अकबर इलाहाबादी ने तो अंग्रेजों के जमाने में ही लिख दिया था,

    ‘‘बेपर्दा नजर आईं जो चन्द बीवियां

     अकबर जमीं में गैरते कौमी से गड़ गया

     पूछा जो उनसे आपका पर्दा कहां गया 

    बोलीं कि ‘अक्ल पे मर्दों’ की पड़ गया।’’