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मथुरा-काशी का हिन्दू महत्व

भारत के हिन्दू व बौद्ध धर्म स्थलों के महाविनाश का दौर निश्चित रूप से शुरू हुआ जब इस देश में मुस्लिम आक्रान्ताओं का आना शुरू हुआ । यदि हम मध्यकालीन इतिहास का वैज्ञानिक दृष्टि से पूर्णतः वस्तुनिष्ठ होकर विश्लेषण करें तो 711 ईसवीं से शुरू होकर 1770 तक भारत का इतिहास केवल सांस्कृतिक विनाश का काल ही नहीं रहा बल्कि पूरी सभ्यता के विनाश का दौर भी रहा और यह सभ्यता हिन्दू सभ्यता ही थी। हालांकि यह भ्रम फैलाने की कोशिश की गई है कि 16वीं सदी के शुरू से मुगल काल शुरू होने के बाद भारत में विनाश का स्थान सृजन ने लिया परन्तु यह भी आंशिक रूप से ही अर्ध सत्य है क्योंकि इस दौरान भी विध्वंस को पूरी तरह नहीं रोका जा सका था (केवल अकबर के शासन को छोड़ कर)। मुसलमान सुल्तानों और शासकों ने तो भारत की प्राचीन हिन्दू या बौद्ध सभ्यता के चिन्हों व प्रतीकों को मिटाने के लिए बाकायदा जेहाद छेड़कर इस धरती से बुत परस्ती (मूर्ति पूजा) को जड़ से खत्म करने के ऐसे इन्तजाम बांधे कि लोग संस्कृति शब्द का अर्थ ही भूल जायें और सभ्यता के उस चरण में प्रवेश कर जायें जिसमें ईश्वर की साकार कल्पना के साथ उपजी सभी कलाएं स्वतः नष्ट हो जायें। इनमें गीत-संगीत से लेकर कला-नृत्य, स्थापत्य से लेकर मूर्तिकला और शिल्पकारी तक शामिल थी। अतः मुस्लिम काल के दौरान सबसे ज्यादा धर्मान्तरण इन्हीं कलाओं के जानने वाले लोगों का कराया गया जिससे हिन्दू सभ्यता के प्रवाह को रोका जा सके। यदि कोई यह कहता है कि ओडिशा के कोणार्क सूर्य मन्दिर का विनाश करने वाले और भारत भर के शास्त्रीय शिल्पकला से भरी मूर्तियों के मन्दिरों को तोड़ने वाले मुसलमान शासकों ने भारत को ‘ताजमहल’ का तोहफा देकर बहुत बड़ा एहसान किया तो वह अपनी महान विरासत को ही नकारने का काम करता है।

 दक्षिण के विजयनगर साम्राज्य की राजधानी ‘हम्पी’ में आज भी खड़ी इमारतों के खंडहर गवाही दे रहे हैं कि भारतीय स्थापत्यकला और शिल्पकला किस कदर ऊंचाइयों पर थी। जरा अक्ल से सोचने वाली बात है कि जब भारत में 711 ई. में एक तरफ इसके उत्तर-पश्चिम क्षेत्र में मुसलमानों का आक्रमण हो रहा था तो ठीक उसी दौर के आसपास भारत के पूर्वी क्षेत्र के महाराजाधिराज यशोवर्मन का शासन कम्बोडिया में अंगकोट के भव्य और कलात्मक मन्दिरों का निर्माण करा रहा था जिनका मुकाबला आज भी दुनिया के किसी दूसरे वास्तु देव भवनों से नहीं किया जा सकता। बेशक भारत की सम्पत्ति और बेतहाशा धन को लूटने का उद्देश्य तो मुसलमान आक्रान्ताओं का था ही मगर इसके साथ उनका लक्ष्य भारत में जेहाद करना भी था जिससे वे अपनी इस्लामी मान्यताओं के अनुसार इस धरती से ‘शिर्क’ खत्म कर डालें जिसकी वजह से हिन्दू मन्दिरों की कलात्मक मूर्तियों को विद्रूप किया गया और उनके हाथ-पैरों को तोड़ा गया और यहां तक किया गया कि उन्हें मन्दिरों से हटा कर मस्जिदों के निर्माण में उपयोग किया गया। यदि ऐसा न होता तो दिल्ली की कुतुबमीनार इमारत के अहाते में ‘उल्टा गणेश’  मूर्ति कहां से आती। 

भारत के कथित उदारवादी व कम्युनिस्ट विचारधारा के इतिहासकारों ने मुगलों को महान बनाने की मुहीम इसी वजह से छेड़ी जिससे हिन्दुओं में अपनी संस्कृति के विनाश और सभ्यता के विध्वंस के भाव को दबाया जा सके। वरना मुसलमान शासकों को तो यह शुरू से ही पता था कि वे उस धरती पर खड़े हैं जहां के लोग केवल मूर्तियों को ही नहीं बल्कि पेड़-पौधों, पहाड़ों व नदियों तक को पूजते हैं।  जिन लोगों ने इतिहास का बेबाकी से अध्ययन किया है वे भली-भांति जानते हैं कि जब भरतपुर की जाट रियासत के राजा सूरजमल ने तब के मुगल बादशाह को हरा कर आगरा को लूटने के बाद उससे सन्धि की तो उसकी शर्तों में एक शर्त यह भी थी कि मुगल सैनिक न तो गायों की हत्या करेंगे और न ही पीपल के पेड़ों को काटेंगे। अतः आजादी के 74 साल बीतने पर  मुसलमानों के लिए अलग देश पाकिस्तान बन जाने के बाद अगर भारत के हिन्दू आज यह मांग कर रहे हैं कि उनके वे सभी धार्मिक स्थल उन्हें वापस किये जायें जिन्हें मुस्लिम शासन के दौरान जबर्दस्ती कब्जाया गया था अथवा उन्हें इस्लामी धर्मस्थलों में परिवर्तित कर दिया गया था तो प्राकृतिक न्याय की दृष्टि से यह पूर्ण रूप से उचित कहा जायेगा। 

 भारत की धरती के हर हिस्से और भाग में हिन्दू संस्कृति के पद चिन्ह व्याप्त हैं। हर शहर या ग्राम के आसपास इसकी मान्यताओं के अनुसार देव स्थान हैं अतः वाराणसी या काशी जैसी नगरी के शिवधाम को किस प्रकार इस्लामी इमारतों के साये से जोड़ा जा सकता है। जाहिर है कि यह कार्य मुस्लिम शासकों द्वारा अपनी सत्ता का रूआब गालिब करने की गर्ज से ही किया गया होगा। अतः काशी विश्वनाथ धाम के निकट सटा कर खड़ी की गई मस्जिद सिर्फ औरंगजेब ने अपने इस्लामी जेहाद के नशे में की थी। इसी के साथ मथुरा में श्री कृष्ण जन्म स्थान के आधे किले को जिस तरह मस्जिद में परिवर्तित किया गया है वह भी तर्क से परे हैं और स्पष्ट बताता है कि ऐसा केवल भारत की हिन्दू जनता की भावनाओं को आहत करने की गरज से ही किया गया होगा। इतिहास तो यह है कि 1761 में जब अफगान सुल्तान अहमद शाब अब्दाली ने पानीपत की तीसरी लड़ाई जीत कर मुगल बादशाह को हराया तो उसने दिल्ली के आसपास के इलाकों में तूफानी विध्वंस किया और मथुरा व वृन्दावन जैसे हिन्दू धार्मिक स्थलों को मानव मृत शरीरों में बदल डाला और विशाल मन्दिरों को तोड़ डाला। अतः भारत के मुसलमानों का ही यह कर्तव्य बनता है कि वे काशी और मथुरा के हिन्दुओं की तीर्थ स्थलों को स्वयं हिन्दुओं को सौंपने की पहल करें और अपने सच्चे भारतीय होने का परिचय दें क्योंकि मूलतः उनके पूर्वज भी उसी संस्कृति को मानने वाले थे जिसे भारतीय या हिन्दू संस्कृति कहते हैं।  मथुरा-काशी का हिन्दू महत्व 

भारत के हिन्दू व बौद्ध धर्म स्थलों के महाविनाश का दौर निश्चित रूप से शुरू हुआ जब इस देश में मुस्लिम आक्रान्ताओं का आना शुरू हुआ । यदि हम मध्यकालीन इतिहास का वैज्ञानिक दृष्टि से पूर्णतः वस्तुनिष्ठ होकर विश्लेषण करें तो 711 ईसवीं से शुरू होकर 1770 तक भारत का इतिहास केवल सांस्कृतिक विनाश का काल ही नहीं रहा बल्कि पूरी सभ्यता के विनाश का दौर भी रहा और यह सभ्यता हिन्दू सभ्यता ही थी। हालांकि यह भ्रम फैलाने की कोशिश की गई है कि 16वीं सदी के शुरू से मुगल काल शुरू होने के बाद भारत में विनाश का स्थान सृजन ने लिया परन्तु यह भी आंशिक रूप से ही अर्ध सत्य है क्योंकि इस दौरान भी विध्वंस को पूरी तरह नहीं रोका जा सका था (केवल अकबर के शासन को छोड़ कर)। मुसलमान सुल्तानों और शासकों ने तो भारत की प्राचीन हिन्दू या बौद्ध सभ्यता के चिन्हों व प्रतीकों को मिटाने के लिए बाकायदा जेहाद छेड़कर इस धरती से बुत परस्ती (मूर्ति पूजा) को जड़ से खत्म करने के ऐसे इन्तजाम बांधे कि लोग संस्कृति शब्द का अर्थ ही भूल जायें और सभ्यता के उस चरण में प्रवेश कर जायें जिसमें ईश्वर की साकार कल्पना के साथ उपजी सभी कलाएं स्वतः नष्ट हो जायें। इनमें गीत-संगीत से लेकर कला-नृत्य, स्थापत्य से लेकर मूर्तिकला और शिल्पकारी तक शामिल थी। अतः मुस्लिम काल के दौरान सबसे ज्यादा धर्मान्तरण इन्हीं कलाओं के जानने वाले लोगों का कराया गया जिससे हिन्दू सभ्यता के प्रवाह को रोका जा सके। यदि कोई यह कहता है कि ओडिशा के कोणार्क सूर्य मन्दिर का विनाश करने वाले और भारत भर के शास्त्रीय शिल्पकला से भरी मूर्तियों के मन्दिरों को तोड़ने वाले मुसलमान शासकों ने भारत को ‘ताजमहल’ का तोहफा देकर बहुत बड़ा एहसान किया तो वह अपनी महान विरासत को ही नकारने का काम करता है।

 दक्षिण के विजयनगर साम्राज्य की राजधानी ‘हम्पी’ में आज भी खड़ी इमारतों के खंडहर गवाही दे रहे हैं कि भारतीय स्थापत्यकला और शिल्पकला किस कदर ऊंचाइयों पर थी। जरा अक्ल से सोचने वाली बात है कि जब भारत में 711 ई. में एक तरफ इसके उत्तर-पश्चिम क्षेत्र में मुसलमानों का आक्रमण हो रहा था तो ठीक उसी दौर के आसपास भारत के पूर्वी क्षेत्र के महाराजाधिराज यशोवर्मन का शासन कम्बोडिया में अंगकोट के भव्य और कलात्मक मन्दिरों का निर्माण करा रहा था जिनका मुकाबला आज भी दुनिया के किसी दूसरे वास्तु देव भवनों से नहीं किया जा सकता। बेशक भारत की सम्पत्ति और बेतहाशा धन को लूटने का उद्देश्य तो मुसलमान आक्रान्ताओं का था ही मगर इसके साथ उनका लक्ष्य भारत में जेहाद करना भी था जिससे वे अपनी इस्लामी मान्यताओं के अनुसार इस धरती से ‘शिर्क’ खत्म कर डालें जिसकी वजह से हिन्दू मन्दिरों की कलात्मक मूर्तियों को विद्रूप किया गया और उनके हाथ-पैरों को तोड़ा गया और यहां तक किया गया कि उन्हें मन्दिरों से हटा कर मस्जिदों के निर्माण में उपयोग किया गया। यदि एेसा न होता तो दिल्ली की कुतुबमीनार इमारत के अहाते में ‘उल्टा गणेश’  मूर्ति कहां से आती। 

भारत के कथित उदारवादी व कम्युनिस्ट विचारधारा के इतिहासकारों ने मुगलों को महान बनाने की मुहीम इसी वजह से छेड़ी जिससे हिन्दुओं में अपनी संस्कृति के विनाश और सभ्यता के विध्वंस के भाव को दबाया जा सके। वरना मुसलमान शासकों को तो यह शुरू से ही पता था कि वे उस धरती पर खड़े हैं जहां के लोग केवल मूर्तियों को ही नहीं बल्कि पेड़-पौधों, पहाड़ों व नदियों तक को पूजते हैं।  जिन लोगों ने इतिहास का बेबाकी से अध्ययन किया है वे भली-भांति जानते हैं कि जब भरतपुर की जाट रियासत के राजा सूरजमल ने तब के मुगल बादशाह को हरा कर आगरा को लूटने के बाद उससे सन्धि की तो उसकी शर्तों में एक शर्त यह भी थी कि मुगल सैनिक न तो गायों की हत्या करेंगे और न ही पीपल के पेड़ों को काटेंगे। अतः आजादी के 74 साल बीतने पर  मुसलमानों के लिए अलग देश पाकिस्तान बन जाने के बाद अगर भारत के हिन्दू आज यह मांग कर रहे हैं कि उनके वे सभी धार्मिक स्थल उन्हें वापस किये जायें जिन्हें मुस्लिम शासन के दौरान जबर्दस्ती कब्जाया गया था अथवा उन्हें इस्लामी धर्मस्थलों में परिवर्तित कर दिया गया था तो प्राकृतिक न्याय की दृष्टि से यह पूर्ण रूप से उचित कहा जायेगा। 

 भारत की धरती के हर हिस्से और भाग में हिन्दू संस्कृति के पद चिन्ह व्याप्त हैं। हर शहर या ग्राम के आसपास इसकी मान्यताओं के अनुसार देव स्थान हैं अतः वाराणसी या काशी जैसी नगरी के शिवधाम को किस प्रकार इस्लामी इमारतों के साये से जोड़ा जा सकता है। जाहिर है कि यह कार्य मुस्लिम शासकों द्वारा अपनी सत्ता का रूआब गालिब करने की गर्ज से ही किया गया होगा। अतः काशी विश्वनाथ धाम के निकट सटा कर खड़ी की गई मस्जिद सिर्फ औरंगजेब ने अपने इस्लामी जेहाद के नशे में की थी। इसी के साथ मथुरा में श्री कृष्ण जन्म स्थान के आधे किले को जिस तरह मस्जिद में परिवर्तित किया गया है वह भी तर्क से परे हैं और स्पष्ट बताता है कि ऐसा केवल भारत की हिन्दू जनता की भावनाओं को आहत करने की गरज से ही किया गया होगा। इतिहास तो यह है कि 1761 में जब अफगान सुल्तान अहमद शाब अब्दाली ने पानीपत की तीसरी लड़ाई जीत कर मुगल बादशाह को हराया तो उसने दिल्ली के आसपास के इलाकों में तूफानी विध्वंस किया और मथुरा व वृन्दावन जैसे हिन्दू धार्मिक स्थलों को मानव मृत शरीरों में बदल डाला और विशाल मन्दिरों को तोड़ डाला। अतः भारत के मुसलमानों का ही यह कर्तव्य बनता है कि वे काशी और मथुरा के हिन्दुओं की तीर्थ स्थलों को स्वयं हिन्दुओं को सौंपने की पहल करें और अपने सच्चे भारतीय होने का परिचय दें क्योंकि मूलतः उनके पूर्वज भी उसी संस्कृति को मानने वाले थे जिसे भारतीय या हिन्दू संस्कृति कहते हैं।