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काश ! प्रणवदा प्रधानमंत्री बनते

इसमें निश्चित तौर पर कोई दो राय नहीं हो सकती कि यदि पूर्व राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी देश के प्रधानमंत्री पद पर शोभायमान हुए होते तो आज के भारत और कांग्रेस पार्टी का इतिहास दूसरा होता। उन जैसे क्रियाशील व दूरदर्शी राजनीतिज्ञ को प्रधानमंत्री पद पर आसीन न करके स्वयं कांग्रेस पार्टी ने अपना कितना बड़ा नुकसान किया इसका आकलन इतिहासकार उचित समय पर अवश्य करेंगे मगर इतना दृढ़ विश्वास के साथ कहा जा सकता है कि समस्त भारतवासी एेसे ‘राजनेता’ के नेतृत्व से महरूम कर दिये गए जिसमें 21वीं सदी के भारत को इसके मिजाज के अनुरूप बुलन्दियों तक पहुंचाने की क्षमता थी। मनमोहन के दस वर्षीय शासन के दौरान एेसे कई अवसर आए जब कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी प्रणवदा के प्रशासनिक अनुभव से लेकर दूरदर्शितापूर्ण नीति निर्माण कला का लाभ उठा सकती थीं और भारत की राजनीति को बदलते समय की धारा के साथ प्रवाहित करते हुए नई पीढ़ी की आकांक्षाओं को नया आयाम देते हुए उन्हें हकीकत से जोड़ सकती थीं, क्योंकि प्रणवदा में ही वह दृष्टि थी जो अंतर्राष्ट्रीय जगत तक में भारत की उस प्रतिभा को पुनर्स्थापित कर सकती थी जो इंदिरा गांधी का शासन समाप्त होने के बाद धूमिल होने लगी थी परन्तु ऐसे कई अवसर गंवा दिये गए। उनमें पुराने शक्ति स्तम्भों को नवसृजित मानकों के साथ जोड़ते हुए उन्हें भारत मूलक बनाने की अद्भुत क्षमता थी और यह उन्होंने तब सिद्ध करके दिखाया था जब अमरीका के साथ ऐ​तिहासिक परमाणु करार किया गया। यह करार विश्व राजनीति की एेसी विलक्षण घटना थी जिसमें विश्व की महाशक्ति अमरीका को भारत की शर्तें मानने के लिए बाध्य होना पड़ा था और इसके लिए अपने संविधान तक में संशोधन करना पड़ा था।

केन्द्र में यूपीए की सांझा सरकार के चलते नवम्बर 2008 में इस प्रकार का साहस केवल वही राजनेता दिखा सकता था जिसका मौजूदा भारत के साथ-साथ आने वाली पीढि़यों का भविष्य सुरक्षित करना भी मुख्य लक्ष्य हो। श्री मुखर्जी ने अपनी आत्मकथा के तीसरे भाग ​‘दि कोअलिशन डेज-1996 टू 2012’ को प्रसारित करते हुए उस घटना का जिक्र भी किया है जिसमें उन्हें यह लगा था कि शायद श्रीमती गांधी उन्हें प्रधानमंत्री बनाने पर सोच- विचार रही हैं। पुस्तक में श्री मुखर्जी ने लिखा है कि 2 जून 2012 को जब नये राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी के बारे में कांग्रेस पार्टी के भीतर मंथन चल रहा था तो सोनिया गांधी ने उनसे कहा कि ‘प्रणव जी आप राष्ट्रपति पद के लिए सर्वथा उपयुक्त उम्मीदवार हैं मगर आप जिस तरह सरकार चलाने में अहम भूमिका अदा कर रहे हैं उसे देखते हुए क्या आप एेसा कोई दूसरा व्यक्ति बता सकते हैं जो आपकी जगह ले सके ?’’ प्रणवदा ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि इस बातचीत के बाद में लौट आया मगर मुझ में यह धारणा सी बनी कि संभवतः सोनिया जी प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह को राष्ट्रपति बनाना चाहती हैं, उस स्थिति में वह मुझे प्रधानमंत्री बना सकती हैं। एेसी अफवाह भी गर्म थी कि जब श्रीमती गांधी कौशाम्बी पर्वत पर्यटन स्थल पर छुट्टियां मनाने गई थीं तो उन्होंने इस समीकरण पर गौर किया था। इसके बाद संसद में एेसी घटना घटी जिसकी वजह से प्रणवदा को पुनः लगा कि संभवतः सोनिया गांधी उन्हें ही प्रधानमंत्री बना सकती हैं। अपनी पुस्तक में यह वाकया प्रणवदा ने लोकसभा का बताया है जब सदन में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज किसी मुद्दे पर अड़ गई थीं और उनसे जवाब मांग रही थीं। तब श्री मुखर्जी वित्तमंत्री थे। लोकसभा में विपक्षी सांसद हंगामे पर उतारू थे। प्रणवदा कह चुके थे कि वह विपक्ष के सवालों का जवाब जरूर देंगे और जब यह मामला सुलट गया तो श्रीमती गांधी ने उन्हें पुनः याद दिलाया कि ‘देखिये यही वजह है कि आप राष्ट्रपति नहीं बन सकते’ इसी कारण तब यह उ​क्त ​राजनीतिक क्षेत्रों में चल पड़ी थी कि-तेरी मर्जी, मेरी मर्जी बाकी जाने प्रणव मुखर्जी।

मगर जब 25 जून को कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में प्रणवदा का चयन भारत के राष्ट्रपति पद के लिए हो गया तो सोनिया जी ने कहा कि ‘‘मैं अब उन्हें पार्टी की एेसी बैठकों में नहीं देख सकूंगी मगर उनके चुटीले तन्तों से भी महरूम रहूंगी।’’ दरअसल प्रणवदा की यह पुस्तक कई और रहस्योद्घाटन भी करेगी और भारत में गठबंधन की साझा सरकारों के सत्य का बहुत करीब से खुलासा करेगी। इसके साथ यह भी सच है कि 2009 के लोकसभा चुनाव से पहले श्रीमती गांधी ने कांग्रेस की आजादी के बाद से चली आ रही उस परंपरा को क्यों तोड़ा था जो चुनावों के बाद नये प्रधानमंत्री के नाम की घोषणा करने के बारे में थी। कांग्रेस की परंपरा थी कि वह लोकसभा चुनावों से पहले नए होने वाले प्रधानमंत्री के नाम की घोषणा नहीं करती थी मगर 2009 में उसने यह परंपरा तोड़ते हुए पहले ही डा. मनमोहन सिंह को अगला प्रधानमंत्री तब घोषित कर दिया था जबकि वह इस सदन के लिए चुनाव लड़ने वालों की फेहरिस्त में शामिल भी नहीं थे ? प्रणव दा की यह पुस्तक भारतीय राजनीति के एेसे दौर की कहानी है जिसमें क्षेत्रीय दलों का प्रादुर्भाव राष्ट्रीय राजनीति के सिर चढ़कर बोल रहा था, इस समय में राष्ट्रीय हितों को समग्रता में लागू करना कोई सरल कार्य नहीं कहा जा सकता था क्योंकि सरकारों का दारोमदार इन्हीं दलों पर होता था। प्रणवदा ने पूरे हालात को किस नजरिये से देखा और परखा है यह तो पूरी पुस्तक पढ़कर ही ज्ञात हो सकता है मगर हमारे दौर के इस ‘राजनेता’ के अनुभवों का लाभ आज के नवोदित राजनीतिज्ञों को किस प्रकार मिल सकता है, इस बारे में भी गंभीरता के साथ विचार किया जाना चाहिए। क्योंकि भारत की विविधता को देखते हुए राजनीतिक स्तर पर सन्तुलन बनाए रखने की कला की मर्मज्ञता प्रणवदा के पास इस प्रकार है कि हर जाति व धर्म का व्यक्ति उन्हें श्रद्धा भाव से देखता है।