लोकतंत्र में जातिगत हिंसा कब तक?


Sonu Ji

भले ही भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र हो, भले ही इस लोकतंत्र में धर्मनिरपेक्षता और समान नागरिक अधिकारों की बातचीत की जाती रही हो परंतु यह भी सच है कि इस लोकतंत्र में जाति-पाति और मजहब ने इतनी गहरी जड़ें जमा ली हैं जो किसी अनिष्ट की ओर बढ़ रही हैं। पिछले दिनों महाराष्ट्र के पुणे में कोरेगांव भीमा में हिंसा हुई, उसने सिद्ध कर दिया है कि दलितों और अन्य राजनीतिक दलों के बीच खाई और चौड़ी हो गई है। जिस तरह से हिंसा का नंगा नाच वहां हुआ है वह मौजूदा सरकार के लिए एक खतरे की घंटी है, जिसे सुनकर अलर्ट होने का समय आ गया है। हम राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप की बात नहीं करते बल्कि घटना की उस जड़ तक ले जाना चाहते हैं जो हिंसा से जुड़ी है। दरअसल, सन् 1818 में फूट डालो और राज करो के दम पर काम कर रही ईस्ट इंडिया कंपनी की जिस फौज ने पेशवा बाजीराव द्वितीय की भारी-भरकम फौज को हराया था तो अंग्रेजों की इस फौज में ज्यादातर दलित लोग थे। ये वो दलित थे जो दो सौ साल पहले कोरेगांव भीमा से जुड़े थे। इस जीत के बाद कोरेगांव भीमा के जो दलित महारों से जुड़े थे, का रुतबा बहुत बढ़ गया।

ये दलित हर साल पेशवा बाजीराव पर जीत का जश्न मनाते हैं और कभी कोई लफड़ा नहीं हुआ, क्योंकि इस बार इस युद्ध के दो सौ साल पूरे हो रहे थे तो रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया ने एक विशेष जश्नी कार्यक्रम आयोजित कराया, जिसमें महाराष्ट्र के कई मंत्री शामिल हुए। आपको बता दें कि यह रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया एनडीए में शामिल है और रामदास अठावले आज की तारीख में केंद्रीय मंत्री भी हैं। उन्होंने खुद इस प्रोग्राम को बढ़-चढ़कर मनाने का आह्वन किया तो दो लाख से ज्यादा दलित लोग भारतीय लोकतंत्र में अपनी ताकत दिखाने के लिए इकठ्ठा हो गए। लिहाजा शिवसेना भला इस चुनौती को क्यों न कबूल करती। एक तरफ दलित और एक तरफ शिवसेना इस समारोह को लेकर आमने-सामने डट गए। पहले टकराव, फिर हिंसा और उसके बाद आरोप-प्रत्यारोप। लगभग पांच सौ लोग घायल हुए और एक व्यक्ति की मौत भी हो गई। आनन-फानन में प्रशासनिक अमला वही करता है, जो इस देश में परंपरा है।

हिंसा की जांच के आदेश के बाद अब स्थिति सामान्य हो चुकी है, लेकिन हमारा मानना यह है कि दलितों और गैर दलितों के बीच या फिर मराठाओं और दलितों के बीच महाराष्ट्र में जो बिसात बिछी है, वह भाजपा के लिए अच्छी नहीं कही जा सकती। जाति-पाति और मजहब के नाम पर हिंसा इस देश में पहले भी होती रही है। हिन्दू-मुसलमान का मुद्दा हर राजनीतिक पार्टी को भुनाना होता है, परंतु अब दलितों के नाम पर हर राज्य में जिस तरह से संगठन खड़े हो रहे हैं यह सब लोकतंत्र का एक वह जरूरी हिस्सा बन गया है, जो भीड़तंत्र की मार्फत किसी भी मौके पर खड़ा होकर अपनी ताकत दिखाता है तो इसे वोटतंत्र कहते हैं। आज की सियासत इसी के नाम पर चल रही है। लिहाजा जो दल सत्ता में होता है उसे चुनावों में इस तरह की हिंसा का नुकसान झेलना पड़ता है। नफरत की यह राजनीति अब राजनीतिक दल भले ही पर्दे के पीछे कर रहे हों, परंतु दिक्कत यह है कि जो कुछ वह कर रहे हैं उसकी तस्वीर राजनीतिक दर्पण पर साफ तौर पर देखी जा सकती है। सब जानते हैं कि पुलिस सरकारी तंत्र के साथ चलती है। मौके पर पुलिस कोई कार्यवाही नहीं करती और दिखावा करती है। जब इस हिंसा के प्रति खुफिया सूत्र पहले से पुलिस को आगाह कर देते हैं लेकिन तब कुछ नहीं किया जाता तो इसमें सियासत नजर आती है।

सोशल साइट्स पर लोग इस हिंसा के लिए सरकार को जिम्मेवार मानते हैं। आज की तारीख में यह बात सरकार के पक्ष में नहीं जाती। सवाल पुणे या मुंबई को बंद करते हुए अपना रोष दिखाने का नहीं लेकिन पथराव, आगजनी और हिंसा होने की आशंका के बावजूद सब कुछ हो जाए तो राजनीतिक लाभ किसी को नहीं मिल सकता। इसे एक मुद्दा बनाकर सत्ता से बाहर लोग तो भुनाएंगे ही, लेकिन सरकार को जरूर संभल जाना चाहिए। सहानुभूति बटोरने की कोशिशों में राजनीतिक दल लगे हुए हैं। जहां सरकार सड़क पर नहीं उतर सकती है, वहीं विपक्ष जनता के बीच में जाकर अपनी बात मुखर तरीके से रखता है। अगर आप दोषियों को नहीं ढूंढते और अपनी गिद्ध नजर वोट बैंक पर रखते हो तो सभ्य वर्ग सरकार से नाराज होता है। इसी चीज को लेकर सरकार दलित हिंसा में नहीं पडऩा चाहती और उधर मराठों से भी बिगाडऩा नहीं चाहती।

लिहाजा दलित और गैर दलितों के बीच की खाई गहरी होती जा रही है। वक्त आ गया है कि समझ जाना चाहिए कि राजनीतिक रोटियां सेंकने की कोशिश सरकारी तंत्र के लिए घातक सिद्ध हो सकता है, क्योंकि मराठा लोग और विशेष रूप से शिवसेना पहले ही महाराष्ट्र में सरकार के खिलाफ आक्रामक तेवर लिए हुए है। वहीं कांग्रेस या अन्य दलित दल चाहे वह बसपा हो या मराठों से जुड़े संगठन हों, वे भी राजनीतिक रोटियां सेंकने में पीछे नहीं हैं। जहां इस राजनीति में कई सत्तारूढ़ दल के नेता बेनकाब हुए तो वहीं मराठा नेता संभाजी जैसे उभर भी गए। सब अपना-अपना गेम खेल रहे हैं। आम राजनीतिक कार्यकर्ता तो एक मोहरा बन कर रह गए हैं। एक बात समझ लेनी चाहिए कि कोरेगांव हिंसा एक ट्रायल है और इसका प्रभाव भावी राजनीति पर जब पड़ेगा तो बहुतों का वोट बैंक प्रभावित होगा। समय रहते अगर ऐसी हिंसा और ऐसे ट्रायल न रोके गए तो राजनीतिक दल विशेष रूप से सत्तारूढ़ दल इस जाति आधारित लोकतंत्र में अपना नुकसान कर लेगा। राजनीतिक विश्लेषक इस मामले में अपनी चेतावनी सोशल साइट्स पर दे चुके हैं।