जिस अन्दाज से कर्नाटक में कांग्रेस जेडीएस गठबंधन की जीत हुई है उसके लिए देश के सर्वोच्च न्यायालय को सबसे पहले बधाई दी जानी चाहिए जिसमें बैठे न्यायमूर्तियों ने यह एेलान किया कि भारत मे सिर्फ संविधान का राज ही चलेगा और इसके आगे हुकूमत के हर इरादे को सिर झुकाना होगा। पिछले तीन दिनों से सियासत को जिस तरह तोल–मोल और खरीद – फरोख्त की मंडी में तब्दील करने की नापाक कोशिशें हो रही थीं उसे रोकने मे सर्वोच्च न्यायालय ने बहुत अहम रोल अदा किया है। अगर खुदा न ख्वास्ता बी.एस. येदियुरप्पा जैसे सियासतदां को विधानसभा मे अपना बहुमत साबित करने का 15 दिन का वक्त मिल जाता तो वह पूरे कर्नाटक को एक बार फिर से बेल्लारी के खनन माफिया रेड्डी बन्धुओं के रहमो–करम पर छोड़ देते। मगर क्या सितम हुआ कि पिछले तीन दिनों में ही कर्नाटक को एसी शिकारगाह में बदल दिया गया कि कांग्रेस व जनता दल(एस) को अपने नये चुने हुए विधायकों को लेकर पड़ोस के राज्यों में जाकर खुद को महफूज रखना पड़ा। उधर भाजपा को भी अपने विधायकों को एकजुट रखने के लिए अनथक प्रयास करने पड़े। आग दोनों ही तरफ लगी हुई थी।

अगर जनता द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों को ही लोकतन्त्र सुरक्षा देकर उन्हें बिना किसी खौफ या लालच या डर के अपनी बात विधानसभा के भीतर रखने की इजाजत नहीं देता है तो हम किस जनता की सरकार की बात कर सकते हैं? हमने जो संसदीय प्रणाली अपनाई है उसमें सरकारों का गठन मत प्रतिशत के आधार पर नहीं बल्कि जीते हुए प्रत्याशियों की संख्या के आधार पर होता है। बहुदलीय राजनैतिक प्रणाली में केवल बहुमत के आंकड़े के आधार पर सरकारें बनती और बिगड़ती हैं। यदि एेसा न होता तो 1967 में नौ राज्यों में पहली बार गैर कांग्रेसी सरकारें गठित न होतीं और 1996 से लेकर 2014 तक केन्द्र में साझा सरकारों का दौर न चला होता? किसी भी सदन मे कोई भी पार्टी सबसे बड़ा दल हो सकती है मगर मूल सवाल उसके नेता द्वारा जायज तरीके से जुटाये गये बहुमत का होता है। वह कई दलों के सदस्यों की संख्या को मिला कर भी बन सकता है। मगर कर्नाटक की किस्मत देखिये कि इसमें नये चुनाव होने के बाद राज्यपाल ने श्री येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बिठा कर कहा कि जाओ और 15 दिन के भीतर अगर कांग्रेस और जनता दल(एस) के सदस्यों को तोड़ कर अपना बहुमत साबित कर सकते हो तो कर लो। जबकि उनके दफ्तर में फेहरिस्त रखी हुई थी कि 222 सदस्यों में से भाजपा के 104 हैं, कांग्रेस के 78 हैं और जनता दस (एस) के 38 हैं और निर्दलीय दो हैं। लोकतन्त्र लोकलज्जा से इसीलिए चलता है जिससे लोगों को यह विश्वास रहे कि उसके एक वोट के अधिकार से चुनी गई सरकार कोई भी एसा काम नहीं करेगी जिससे बाद मे उसे शर्मिन्दगी उठानी पड़े।

लोकतन्त्र में किसी भी सरकार की मालिक जनता होती है और उसके द्वारा चुने गये प्रतिनिधी उसके सेवक या नौकर होते हैं। जब इनकी खरीद – फऱोख्त करने की कोई भी कोशिश करता है या इन्हें डराने – धमकाने के लिए कोई दूसरा रास्ता अख्तियार करता है तो वह हमला सीधे उन लोगों पर ही होता है जिन्होंने उसे चुन कर भेजा है। सवाल यह नहीं है कि अब कर्नाटक में उन दो दलों की सरकार बनेगी जो चुनाव में एक – दूसरे के खिलाफ मिल कर लड़े थे बल्कि असली सवाल पहले भी यही था और आज भी यही है कि सरकार वही बनेगी जिसे विधानसभा मे बहुमत प्राप्त होगा। भाजपा को नतीजे आने के बाद से ही बहुमत नहीं था और कांग्रेस व भाजपा को मिल कर पहले दिन से ही बहुमत था तो किस आधार पर येदियुरप्पा बहुमत जुटाने की बात कर रहे थे?

इस राज्य ने भारत को एक प्रधानमंत्री श्री एच. डी. देवगौड़ा के रूप में भी दिया है। उनकी सादगी, ईमानदारी और साफगोई पर यह राज्य बेशक नाज कर सकता है। श्री येदियुरप्पा के सामने बहुत अच्छा अवसर आया था कि वह अपनी पार्टी और अपनी खुद की छवि को जनता की सेवक की बना सकते थे मगर उन्होने इसके बजाय सत्ता की सेवक की छवि उभारना बेहतर समझा और पिछले तीन दिनो मे वे सब कारनामें कर डाले जो ‘शिकारगाह’ में बैठ कर लाव – लश्कर की तैयारी में शिकारी करते हैं! उन्हें उम्मीद थी कि इस बार भी 2008 की तरह वह कामयाब हो जाएंगे। लेकिन वह भूल गये थे कि इस बार उनका पाला कुछ एसे लोगों से पड़ गया है जो शिकारी की हर चाल के छोड़े हुए निशानों की पैमाइश पहले दिन से ही कर रहे थे। यदि एेसा न होता तो क्यों श्री सिद्धारमैया चुनाव नतीजों के आने पर अपनी पार्टी के हार जाने पर जनता दल(एस) के साथ मिल कर सरकार बनाने की चिट्ठी राज्यपाल को अपना इस्तीफा सौंपते वक्त ही दे देते। दीवार पर लिखी हुई इबारत को भी येदियुरप्पा अपने सत्ता के लालच मे नहीं पढ़ पाये तो उसका नतीजा उन्हीं के इस्तीफे में होने ही था। ढाई दिन का सुल्तान बनने से उन्हें क्या हांसिल हुआ? यदि वह सर्वोच्च न्यायालय द्वारा रात भर राज्यपाल के फैसले खिलाफ सुनी गई अर्जी के बाद भी इस्तीफा दे देते तो उनकी कुछ इज्जत बची भी रह सकती थी? सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर 48 घंटे के भीतर ही बहुमत सिद्ध करने की कवायद से पहले जिस तरह उन्होंने विधानसभा में भाषण देकर शहीद बनने का नाटक किया है उससे तो जगजाहिर हो गया है कि
न गुले नग्म हूं, न पर्दा-ए- साज
मैं हूं अपनी शिकस्त की आवाज