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विधानसभा चुनावों की महत्ता

देश के पांच राज्यों में चुनाव का बिगुल बज चुका है जिनमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण चुनाव उत्तर प्रदेश के माने जा रहे हैं क्योंकि यह राज्य देश का सबसे बड़ा राज्य है और इसकी जनसंख्या दुनिया के देशों की तुलना में छठे नम्बर पर आती है परन्तु इसके बड़े होने का एकमात्र कारण यही नहीं है क्योंकि भारत के स्वतन्त्रता आन्दोलन में इस प्रदेश के लोगों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण रही है। यह राज्य स्वतन्त्रता प्राप्ति के पूर्व से लेकर भारत की राजनीति में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका इस तरह निभाता चला आ रहा है कि देश का प्रधानमन्त्री प्रायः इसी राज्य से चुनाव जाता है। इसी वजह से इस राज्य में आगामी 7 मार्च तक होने वाले चुनावों को 2024 के लोकसभा चुनावों का सेमीफाइनल कहा जा रहा है। वहीं दूसरी तरफ पंजाब ऐसा  राज्य है जो पाकिस्तान की सीमा से लगा हुआ है। तीसरी तरफ उत्तराखंड ऐसा  राज्य है जिसका क्षेत्र दुर्गम पहाड़ी इलाका माना जाता है और इसकी सीमाएं भी चीन से जाकर मिलती हैं। चौथा राज्य गोवा ऐसा  प्रदेश  है जो 1960 तक पुर्तगाल के शासन में रहा है और समुद्री तट पर स्थित है। पांचवां राज्य मणिपुर है जो भारत की विविधतापूर्ण संस्कृति का अनुपम उदाहरण है और पर्वतीय मनोरम छटाओं से भरा हुआ है। 

पूर्वोत्तर के इस राज्य की सीमाएं भी म्यांमार को छूती हैं। एक प्रकार से इन पांच राज्यों को हम भारत के विशाल स्वरूप का अंश प्रतिनिधि कह सकते हैं। अतः इन सभी राज्यों के चुनाव परिणामों का प्रभाव भारत की सकल राष्ट्रीय राजनीति पर पड़ना स्वाभाविक है। यदि हम इन सभी राज्यों की राजनीतिक बनावट को देखें तो यह विविध रूपों में दिखाई पड़ती है। उत्तर प्रदेश में चुनावी युद्ध की जो तस्वीर उभर रही है उसमें सत्ताधारी पार्टी भाजपा का मुकाबला एक क्षेत्रीय दल समाजवादी पार्टी से दिखाई पड़ रहा है और देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस तीसरे नम्बर पर नजर आ रही है। मगर पंजाब में सत्तारूढ़ पार्टी कांग्रेस का मुकाबला बहुकोणीय नजर आ रहा है। जबकि मणिपुर में क्षेत्रीय दलों के साथ कांग्रेस व भाजपा लड़ाई में नजर आ रही है। गोवा में सत्ताधारी भाजपा की लड़ाई कांग्रेस व तृणमूल कांग्रेस से होती हुई दिखाई पड़ रही है। जबकि उत्तराखंड में सीधी टक्कर भाजपा व कांग्रेस के बीच लग रही है। इसका अभिप्राय यह निकलता है कि इन पांचों राज्यों में असली टक्कर भाजपा व अन्य दलों के बीच है। अर्थात भाजपा इन चुनावों के केन्द्र में है। अतः इन चुनावों को यदि हम सम्पूर्णता में लोकसभा चुनावों का सेमीफाइनल भी कहें तो कोई गलत बात नहीं होगी क्योंकि राष्ट्रीय धरातल पर 2024 में भी यही राजनीतिक समीकरण बनने की संभावना है। विचार करने वाली बात यह है कि इन सभी राज्यों में विभिन्न राजनीतिक दलों के चुनावी एजैंडे क्या रहते हैं। ये चुनाव हर राज्य में नई सरकार बनाने के लिए हो रहे हैं अतः चुनावी मुद्दे भी राज्य स्तर के या क्षेत्रीय समस्याओं को लेकर ही होने चाहिए।

 लोकतन्त्र में हर पांच साल बाद आम जनता सत्तारूढ़ रहे दल से उसकी सरकार द्वारा किये गये काम का हिसाब मांगती है। इस मायने में उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड या गोवा अथवा मणिपुर या पंजाब की समस्याएं एक जैसी नहीं हो सकतीं। प्रत्येक राज्य में मतदाता वहां के प्रमुख राजनीतिक दलों की हैसियत या कूव्वत को देख कर अपने मत का प्रयोग करते हैं और प्रत्येक राजनीतिक दल अपने राज्य के लोगों के कल्याण के लिए अपना चुनाव घोषणापत्र तैयार करता है। जिस प्रकार भारत की संस्कृति विविधतापूर्ण है उसी प्रकार इसकी राजनीति भी विविधतापूर्ण है। यही वजह है कि राज्यों में सरकार अलग-अलग दलों की बनती रहती है परन्तु पिछले तीन दशकों से इसमें परिवर्तन आया है । देखने में आ रहा है कि क्षेत्रीय दल मतदाताओं को लुभाने के लिए वादा करने की हदें इस तरह पार कर जाते हैं जिनका तारतम्य जाकर भारत की संघीय व्यवस्था से नहीं जुड़ता। इस सम्बन्ध में क्षेत्रीय भावनाओं को उग्र तक बनाने के मुद्दे भी आ जाते हैं। साथ ही चुनावी वादा करते समय राजनीतिक दल अपने राज्य की वित्तीय व्यवस्था व संसाधनों की भी परवाह नहीं करते। अब तो इससे भी आगे मुफ्त सौगात तक बांटने के वादे होने लगे हैं। लोकतन्त्र में यह प्रवृत्ति बहुत घातक होती है क्योंकि इससे मतदाता को एक उपभोक्ता बना कर देखने की प्रवृत्ति को बल मिलता है। लोकतन्त्र में मतदाता याचक कभी नहीं होता बल्कि वह मालिक होता है। याचक की भूमिका में राजनीतिक दलों के नेता होते हैं अतः खैरात बांटने की प्रवृत्ति प्रभावी बना कर राजनीतिज्ञ इस समीकरण को उलटने की कोशिश करते हैं। इसकी वजह यह है कि जिस भी पार्टी की सरकार बनती है वह लोगों द्वारा दिये धन पर ही चलती है। इस फर्क को समझना बहुत जरूरी है। भारत ने स्वतन्त्रता के बाद जो लोकतान्त्रिक पद्धति अपनाई उसमें प्रत्येक नागरिक को मिला एक वोट का अधिकार सबसे बड़ा संवैधानिक किन्तु मूलभूत अधिकार है जिसका सौदा किसी कीमत पर नहीं किया जा सकता। यही सुनिश्चित करने के लिए तो हमारे संविधान निर्माताओं ने स्वतन्त्र चुनाव आयोग की स्थापना की और किसी भी सरकार के नियन्त्रण से मुक्त रखते हुए सीधे संविधान से शक्ति लेने के लिए प्राधिकृत किया। मगर एक वोट की ताकत की इस हकीकत को राजनीतिक दल अक्सर हाशिये पर फैंकने की कोशिश करते हैं। चुनाव मतदाता की ताकत का प्रदर्शन ही होते हैं, इसी वजह से चुनाव आयोग ज्यादा से ज्यादा मतदान करने की अपील करता है। विधानसभा चुनावों में मतदाताओं को बड़ी से बड़ी संख्या में भाग लेकर अपने नागरिक होने की अहमियत को जताना चाहिए और सत्ता में अपनी भागीदारी तय करनी चाहिए। इसी से चुनाव लोकतन्त्र का पर्व बनते हैं।