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संपादकीय

दमन को लेकर नहीं बचेगा इमरान!

 aditya

आज की तारीख में पूरी दुनिया में सबको पता चल चुका है कि कश्मीर भारत का एक अभिन्न अंग है लेकिन हमारा ढीठ पड़ोसी पाकिस्तान है कि मानता ही नहीं। यह ऐसा पड़ोसी है जो जूते खाकर भी नहीं मानता। ये जूते हम नहीं मारते। अमेरिका में राष्ट्रपति ट्रंप से लेकर जेनेवा में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद तक हर कोई पाकिस्तान को नजरंदाज कर रहा है कि कश्मीर के मामले पर वह उनके पास कभी न आए इस मामले में जाकर अगर भारत से कोई मसला है तो उसके पीएम श्री मोदी से बात करके सुलझाओ। 

अंतर्राष्ट्रीय मंच पर पाकिस्तान ने चीखने-चिल्लाने के अलावा और कोई दूसरा काम नहीं किया। जुल्फीकार अली भुट्टो से लेकर परवेज मुशर्रफ तक और नवाज शरीफ से लेकर इमरान खान तक जो भी पाकिस्तान के हुक्मरान रहे हों सबने कश्मीर को अंतर्राष्ट्रीय मुद्दा बनाने की कोशिश की और हर बार पाकिस्तान को मुंह की खानी पड़ी। यहां तक कि बिल क्लिंटन, जॉर्ज बुश, बराक ओबामा या फिर ट्रंप तक जितने भी अमरीकी राष्ट्रपति हुए हैं वो डबल गेम खेलने के बावजूद कश्मीर को लेकर पाकिस्तान को उसका साथी होने का एहसास दिलाने के बावजूद खुद बेनकाब हो गए लेकिन उसका समर्थन नहीं कर पाए। 

दरअसल प्रधानमंत्री मोदी ने कश्मीर को एक साइड पर रखकर पाकिस्तान की कश्मीर की आड़ में आतंकी खुरापात को दुनिया के सामने उजागर किया। पाकिस्तान बेनकाब हो गया तो अब वह युद्ध हमारे साथ कर सकता नहीं तो धमकियां ही दे सकता है और यही काम अब इमरान खान कर रहे हैं। कश्मीर को लेकर पाकिस्तान का विधवा विलाप जारी था, जारी है और जारी रहेगा। जबकि उसके अपने देश में अल्पसंख्यकों चाहे वह सिख या हिंदू है यहां तक कि बलोचिस्तान और बाल्टीस्तान के लोग पाकिस्तान के खिलाफ अपनी आवाज उठाकर उसे बराबर एहसास करा रहे हैं कि वह अब अपना पीओके जिसे उसने कब्जा कर रखा है बचा नहीं पायेगा। 

यहां हम एक दूसरा गंभीर विषय ले रहे हैं जो पाकिस्तान के अल्पसंख्यकों की आरक्षित सीट पख्तुनख्वां से जुड़ा है और वहां के बलदेव कुमार विधायक हैं और वह पाकिस्तान छोड़कर दिल्ली पहुंच चुके हैं और उन्होंने यहां राजनीतिक शरण मांगी है। भारत पाकिस्तान बंटवारे के बाद ये लोग वहीं रह गये थे। हमारे सिख भाई भी वहीं रह गये। पिछले दिनों एक नाबालिग सिख लड़की का अपहरण कर लिया गया और उसका धर्म परिवर्तन कर दिया गया। इसके बाद उसका जबर्दस्ती निकाह करवा दिया गया। इस मामले में भारत ने आवाज उठाई है। पाकिस्तान अपनी आदत के मुताबिक खंडन ही करता रहेगा। 

आतंकवादियों के जितने भी डोजियर हमने भेजे वो उसने हर बार की तरह इंकार किये लेकिन पूरी दुनिया के दबाव के बावजूद उसे अपने आतंकियों अजहर मसूद, जाकिर उमा लकमी और जाकिर सईद को ग्लोबल टेरेरिस्ट घोषित करना ही पड़ा। अब यहां हम हैरान है कि पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न की संख्या बढ़ रही है। अभी ढाई साल पहले कई और राजनेताओं ने भारत में राजनीतिक शरण की मांग की थी। कभी 1948 में भारत-पाक बंटवारे के दौरान अल्पसंख्यकों की पाकिस्तान में संख्या 23 फीसदी थी जो अब ऑन दा रिकार्ड 3 फीसदी रह गई है।

मोहम्मद अली जिन्ना को याद करने वाले और इस पर चिंता जताने वाले ड्रामाकार नेताओं से मैं पूछना चाहता हूं कि मजहबी उन्माद का शोर मचाकर आखिरकार जिन्ना ने क्या हासिल कर लिया और अब इमरान खान क्या हासिल कर लेंगे। पाकिस्तान को समझ लेना चाहिए कि मजहबी उन्माद अब खत्म हो चुका है अब तो हमारे अपने देश के मुसलमान भी मानने लगे हैं कि हमारे लिए मजहब बाद में है अपना मुल्क हिंदुस्तान पहले है। राजनीति हो या फौज या फिर राष्ट्रपति तक हमारे यहां मुसलमान इस प्रतिष्ठित पद पर पहुंचे हैं। 

अदालतों में भी उन्हें बराबर तरजीह मिली है। दरअसल भारतीयता और राष्ट्रीयता पहले है। मजहब किसी का भी हो पर हकीकत यही है कि देश हित से बढ़कर कुछ नहीं। अब पाकिस्तान ताजा-ताजा केस में देख चुका है कि फ्रांस, ब्रिटेन, रूस के बाद अमरीका भी भारत का लोहा मान चुका है और अब चीन भी लाईन पर आ गया है। उसकी गीदड़ भभकियां खत्म हो गयी हैं तो उसने अब ये अल्पसंख्यकों के दमन को चलाते हुए सिखों का धर्म परिवर्तन करने की हिमाकत की है तो कितने ही नेता पाकिस्तान छोड़कर भारत में राजनीतिक शरण मांग रहे हैं। उसके दमन के कारण बलोचिस्तान और बाल्टिस्तान उसके हाथ से निकल सकते हैं। 

उसके लिए वह हमें जिम्मेवार नहीं ठहरा सकता। कश्मीर का शोर मचाकर वह कुछ हासिल नहीं करने वाला यह बात इमरान खान कब समझेंगे। इसका जवाब उन्हें खुद ढूंढना है। हमारे यहां तो फौज से लेकर पीएम मोदी तक से हर बार पाकिस्तान को करारा ही जवाब मिला है।