वैसे तो हम रोजाना अच्छी और बुरी खबरों का सामना करते हैं लेकिन इन दिनों समाचारपत्रों पर नज़र डालें तो ऐसा लगता है कि खबरें आग उगल रही हैं, समाज में जो कुछ हो रहा है, वह भयानक तो है ही साथ ही चिन्ताजनक भी है। कानपुर के स्कूल में सातवीं कक्षा की छात्रा द्वारा पहली कक्षा के छात्र को टॉयलेट में चाकू मारना अपने आप में ऐसी भयानक घटना है जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। गुरुग्राम के स्कूल में अपराध करने वाला छात्र तो बालिग होने की दहलीज पर था लेकिन सातवीं कक्षा की छात्रा से ऐसे वहशीपन की तो उम्मीद ही नहीं की जा सकती। आज दादा-दादी से शिकायत करने पर मां अपने बेटे को मार डालती है। लखनऊ में एक महिला ने इसलिए आत्महत्या कर ली कि उसके पति ने उसे शा​पिंग कराने से इंकार कर दिया था। एक डाक्टर इसलिए आत्महत्या कर लेता है क्योंकि नॉनवेज खाने पर उसकी पत्नी ने काफी गुस्सा जताया था। इसके अलावा माता-पिता की डांट से क्षुब्ध होकर बच्चों के आत्महत्या करने की खबरें लगातार आती रहती हैं।

असंतोष, आक्रोश असहमति और उस पर प्रतिक्रिया मनुष्य का स्वभाव है लेकिन नाबालिग से लेकर बालिग तक और व्यावहारिक लोगों द्वारा दूसरों की जान लेना या खुद मौत को गले लगाने की सीमा तक पहुंच जाना समाज के लिए एक गंभीर चेतावनी है। तनाव बढ़ रहा है, ​जिंदगियां खत्म हो रही हैं। कानपुर में हुई घटना में छात्रा को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। स्कूल प्रबंधन से लेकर अभिभावकों के मन में यही सवाल उठ रहा है कि आखिर किस वजह से छात्रा ने ऐसा क्रूर कदम उठाने की हिम्मत जुटाई। केवल स्कूल में छुट्टी कराने के लिए छात्रा ने ऐसा किया हो पर बात भी गले नहीं उतर रही, क्योंकि स्कूलों में सर्दियों की वजह से पहले ही काफी छुट्टियां हो चुकी हैं। जांच में कई परतें खुल रही हैं कि आरोपी छात्रा पहले भी आत्महत्या का प्रयास कर चुकी है। उसने एक साल पहले बेवजह अपने हाथ की नस काट ली थी। अब चिकित्सक कह रहे हैं कि उसकी मानसिक स्थिति ठीक नहीं है, उसकी मैडिकल जांच कराई जाएगी। हाल ही में ब्लू व्हेल गेम के कारण खासतौर पर स्कूली बच्चे बहुत ही खतरनाक चीजों को अंजाम दे रहे थे। इससे आत्महत्या, खुद को नुक्सान पहुंचाना, दूसरों को मार देने जैसे तमाम टास्क थे। इसकी वजह से बच्चों को जान तक गंवानी पड़ी।

प्रगति और विकास के तमाम दावों के बीच बढ़ता तनाव आज के समाज में लम्बे समय से प्रमुख जगह बनाता जा रहा है। वजह आम भी होती है और खास भी होती है। जीवन तो संघर्ष है और संघर्ष करने की क्षमता अपने भीतर पैदा करना बहुत जरूरी है। न तो अभिभावक और न ही समाज बच्चों में ऐसी क्षमता पैदा करने के लिए प्रेरक बन रहा है। ऐसे में प्रश्न उठता है कि आखिर व्यक्तिगत और पारिवारिक संबंधों में भी असहनशीलता इतनी जगह कैसे बना रही है जिससे अपनी जान तो छोड़िए अपने परिवार तक के सदस्यों को भूल जाता है जबकि वे सभी आम दिनों में सुख-दुख के भागीदार होते हैं। एक-दूसरे के प्रति सहज भाव कम हो रहा है। इसके सीधे कारण क्या हैं, आखिर सहजता का अभाव क्यों हो रहा है। आज की भागदौड़ भरी जिन्दगी में तनाव काफी बढ़ गया है। महिलाएं तो स्वभाव से बड़ी संवेदनशील होती हैं अतः छोटी-छोटी बातों से प्रभावित हो जाती हैं। मां-बाप भी अपने बच्चों पर इतना दबाव डालते हैं तो बच्चों का मानसिक तनाव बढ़ जाता है। कुछ बच्चे तो तनाव झेल ही नहीं सकते।

किसी को घर की चिन्ता, किसी को नौकरी की, किसी को धन की, किसी को ऋण की, रोजमर्रा की जिन्दगी में ऐसी चिन्ताएं होना स्वाभाविक है लेकिन अगर इंसान इनसे विचलित होने लगे तो विद्रुपताएं आ ही जाती हैं। समाज में जिस तरह की घटनाएं सामने आ रही हैं यह किसी एक व्यक्ति के लिए नहीं है। इन घटनाओं का प्रभाव सम्पूर्ण समाज पर पड़ रहा है। इस तरह के घृणित अपराधों को सामूहिक संकट कहना गलत नहीं होगा। इन घटनाओं का प्रभाव सम्पूर्ण समाज पर पड़ रहा है। इस तरह के घृणित अपराधों को सामूहिक संकट कहना गलत नहीं होगा। रोजाना अपराध किसी न किसी रूप में घटित हो रहे हैं, सामूहिक बलात्कार, वहशियाना हरकतों, और हत्या की खबरों से समाचारपत्र भरे पड़े रहते हैं। अशिक्षित और शिक्षित भी एक ही पंक्ति में खड़े दिखाई देते हैं। अपराध की प्रवृत्ति बढ़ रही है। यह जरूरी है कि समाजशास्त्री इस दिशा में सोचें कि तनाव मुक्ति की अवधारणा को कैसे व्यापक रूप से प्रचारित किया जाए, कैसे समाज में तनाव घटाया जाए, लोग हंसने-हंसाने की आदत डालें, समाज सहनशील बनें ताकि दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं की रोकथाम हो सके।